फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Fake degrees availability in Avadh University.

अपने रिस्क पर 15 से 60 हजार में बनवाइए फर्जी डिग्री

Sat, 13 Jun 2015 11:55 AM IST
धीरेंद्र सिंह/अमर उजाला, फैजाबाद
धीरेंद्र सिंह/अमर उजाला, फैजाबाद Updated Sat, 13 Jun 2015 11:55 AM IST
विज्ञापन
Fake degrees availability in Avadh University.

केजरीवाल सरकार के पूर्व कानून मंत्री जितेंद्र सिंह अकेले फर्जी डिग्रीधारी नहीं हैं, उनके जैसे अनेक शातिर खिलाड़ी डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय की शान में गुस्ताखी कर चुके हैं। ऐसे लोगों को बगैर कॉलेज का मुंह देखे मार्कशीट से लेकर उपाधियां मुहैया कराने वाले रैकेट में कुछ पूर्व छात्र नेताओं और बाबुओं की भागीदारी जगजाहिर है।

विज्ञापन


यहां के कॉलेजों में आई आरटीआई और सत्यापन रिपोर्ट में सबसे अधिक बीएड की फर्जी डिग्रियां मिली हैं। इनके बूते राजस्थान, हरियाणा और मध्यप्रदेश में तमाम लोग शिक्षक बने। यूपीएसआईडीसी के असरदार चीफ इंजीनियर अरुण कुमार मिश्र जिस बीटेक डिग्री से नौकरी कर रहे हैं, उसे हाईकोर्ट ने भी अवैध माना।
विज्ञापन


अवध विश्वविद्यालय में फर्जी डिग्री बनाने व बेचने का धंधा 1994-95 से शुरू हुआ। तब वर्तमान व पूर्व छात्रनेताओं समेत कॉलेज व विवि के बाबुओं का एक मजबूत गिरोह इसे अंजाम देता था। आज भी साकेत से चंद कदम दूर तपेश्वर मंदिर पर पुराने लोग हकीकत बयां करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


साकेत पीजी कॉलेज के चीफ प्रॉक्टर डॉ. एसपी सिंह कहते हैं कि जब नए-नए जॉइन किए तब तपेश्वर मंदिर फर्जी सर्टिफिकेट बनाने का अघोषित दफ्तर हुआ करता था। छात्र नेताओं संग कॉलेज के बाबू से लेकर विवि के गोपनीय विभाग से जुड़े बाबू वहां जरूर दिख जाते थे। बकायदा मोल-भाव होते थे, लेकिन रैकेट पर कार्रवाई कभी नहीं हुई।

सबसे ज्यादा बनीं फर्जी बीएड की डिग्रियां

Fake degrees availability in Avadh University.

कहते हैं बाद के वर्षों में जब वाईआर त्रिपाठी प्रिंसिपल थे, तब शायद ही कोई महीना गुजरता, जब बीएड मार्कशीट के सत्यापन के दस केस फर्जी न मिलते रहे हों। यह सभी ज्यादातर राजस्थान के मामले होते थे। अब भी ऐसे केस आते हैं, मगर पहले जैसे नहीं। अवध विवि के पूर्व प्राक्टर व विभिन्न समितियों से जुड़े रहे प्रो. डॉ अजय प्रताप कहते हैं कि विवि में आज भी रैकेटियर घूमते दिख जाते हैं।

हमने ऑनलाइन सर्टिफिकेट, रिजल्ट शीट, अंकपत्र आदि करने के सुझाव दिया, लेकिन अभी तक सिर्फ रिजल्ट की ऑनलाइन हो पाया है। जबकि हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के फैसले की ऑनलाइन व्यवस्था की तरह छात्रों का सबकुछ ऑनलाइन हो सकता है, जिसे कोई भी कहीं से देख सकता है।

साकेत कॉलेज का एक रिटायर बाबू जिससे दिल्ली पुलिस ने भी जितेंद्र तोमर मामले में पूछताछ की है, का कहना है कि फर्जी डिग्री का धंधा 2003-04 तक चला। मगर सबसे अधिक 1994 से 1996 का दौर था। उस समय बीएड की बहुत मांग थी, मैनुअली फर्जी मार्कशीट बनती थी, जिसके आधार पर विवि से उपाधि बनाने वाले परीक्षा विभाग के लोग ही थे। रेट 15 हजार से 60 हजार तक था।

अवध विवि में बड़े पद के अधिकारी कहते हैं कि भाई रैकेट तो चलता है, इसे देखना-समझना है तो कहीं जाने की जरूरत नहीं, बस पता करिए कि जो एक-दो पुराने छात्रनेता आज भी गोपनीय विभाग में गलबहियां करते दिखते हैं, वे यहां आते क्यों हैं।

कहते हैं कि किसी भी कॉलेज का कोई वर्तमान छात्रनेता विवि परिसर में नहीं दिखता, मगर पुराने चंद लोग रोज अड्डा जमाते हैं। यहीं लोग हैं, जो तोमर जैसों को डिग्री ही नहीं बेचते, बल्कि जरूरत पड़ने सत्यापन का भी जुगाड़ फिट करते हैं।

अवध विवि से फर्जी डिग्री के दो तरीके

Fake degrees availability in Avadh University.

- जानकार कहते हैं कि अब तो फर्जी डिग्री पर खासी दिक्कतें है, मगर पहले खुलेआम धंधा चलता था। एक उन लोगों को डिग्री मिल जाती थी, जो कभी कालेज नहीं देखे। सिर्फ उनका पैसा जमा हुआ और डिग्री बन गई। रैकेटियर इसे कॉलेज व विवि में इंद्राज नहीं कराते थे, ऐसे ही जितेंद्र तोमर हैं।

दूसरे वे थे जिन्हें कॉलेज से लेकर विवि में इनरोलमेंट, रोल नंबर आदि सही दर्ज कराते हुए डिग्री बन जाती थी। नंबर बढ़ाना तो खुला धंधा था, जो आज भी क्रॉस लिस्ट की जांच करें तो उसमें कट-पिट के निशान से साफ अंदाजा लग सकता है। कई क्रॉस लिस्ट पर कुलपति से लेकर कुलसचिव आदि के दस्तखत आज भी नहीं मिलेंगे।

चीफ इंजीनियर ने बनवाई फर्जी बीटेक डिग्री
-यूपी स्टेट इंडस्ट्रियल डिवेलपमेंट लिमिटेड (यूपीएसआईडीसी) के मुख्य अभियंता अरुण कुमार मिश्रा को फर्जी बीटेक डिग्री में बर्खास्त होना पड़ा था। यह कार्रवाई अनिल कुमार वर्मा की 24 जनवरी 2014 को एक अपील की सुनवाई करते हुई कोर्ट ने दी थी। अनिल की दलील थी कि अरुण ने हाईस्कूल से लेकर सिविल इंजीनियरिंग का जो डॉक्यूमेंट लगाया है, वह फर्जी है।

आरोप था कि 1986 में फर्जी मार्कशीट के बल पर सहायक अभियंता के पद पर एडहॉक ज्वाइन करने वाले अरुण मिश्रा को साल 1998 में प्रमोशन देकर अधिशासी अभियंता बना दिया गया। उसके बाद प्रमोशन होता रहा वह साल इतना ही नहीं साल 2008 में अरुण मिश्रा को मुख्य अभियंता के साथ आर्किटेक्ट कम टाउन प्लानर की जिम्मेदारी शासन ने दे दी। अरूण कुमार मिश्रा की फर्जी बीटेक डिग्री अवध विवि से संबंद्ध कमलानेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी सुल्तानपुर से थी। मगर बाद में सुप्रीम कोर्ट से स्टे के बाद फिर वे पद पर कायम हैं।

इस तरह फर्जी अंक पत्र में बढ़ा दिए नंबर

Fake degrees availability in Avadh University.

राजामोहन गर्ल्स पीजी कॉलेज प्राचार्य शशि मिश्रा को एमए अंग्रेजी पूर्वार्द्ध वर्ष 1978, रोल नं.3942 में अंक 52, 39, 47, 41 मिले थे, जिसे विवि से फर्जी अंकपत्र में 52, 64, 47, 62 कर दिया गया।

लेकिन संबधित बाबू की पहचान के बाद भी विवि ने कोई कार्रवाई नहीं की। जबकि उच्चतर सेवा आयोग ने प्राचार्य की सेवाएं समाप्त कर दी।

विवि की एक और लापरवाही
आशा सिंह सफरीवाला, सीताराम बालिका इंटर कॉलेज साहबगंज में सहायक अध्यापिका हैं, उनकी दो डिग्री एलएलबी व एमए एक ही सत्र की पाई गई। मामला विवि तक पहुंचा, जांच के बाद प्रकरण को 28 जनवरी 2014 को विवि कोर्ट सभा में रखा गया। तय हुआ कि एक माह के भीतर अगली बैठक में कार्रवाई होगी, मगर मामला आजतक लटका हुआ है।

यह कहते हैं विश्वविद्यालय के अधिकारी

Fake degrees availability in Avadh University.

मामले पर अवध विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक एएम अंसारी का कहना है‌ कि फर्जी डिग्री के मामले में विवि से जितनी पूछताछ या सत्यापन के मामले आते हैं, उसका समुचित उत्तर दिया जाता है। आप विधायक अखिलेश पति त्रिपाठी के मामले में दिल्ली के पूर्व विधायक राजेश गर्ग की आरटीआई आई है। मगर उसमें उनकी ओर से कोई सर्टिफिकेट नहीं दी गई है। ऐसे में किस बात का सत्यापन करके जवाब भेजें। आरटीआई वापस की जा रही है।

वहीं, एसपी सिटी आरएस गौतम का कहना है कि फर्जी सर्टिफिकेट मामले में कॉलेज या विवि मामले को अपने कैंपस तक ही रखना चाहता है। आरटीआई के जरिए या सत्यापन में मिली गड़बड़ी को कभी भी पुलिस तक नहीं देता। यदि प्राचार्य या कुलसचिव मामले में पुलिस को कंप्लेन करें,तो तत्काल विधिक कार्रवाई होगी।

विश्वविद्यालय के सामान्य सभा के सदस्य ओमप्रकाश सिंह का कहना है कि फर्जी डिग्री रैकेट हो या अंक बढ़ाने के मामले, सब में विवि स्तर से ढिलाई बरती जा रही है। गोपनीय विभाग की तमाम खामियों पर कभी कार्रवाई नहीं हुई। यदि दस्तावेजों में हुए हेर-फेर की जांच कराई जाए तो बड़ा मामला सामने आ सकता है। तमाम लोग फर्जी सर्टिफिकेट से नौकरी कर रहे हैं, कई रिटायर हो गए।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed