घर में ही तैयार करते थे मिलावटी खून, पैकिंग ऐसी की अस्पताल कर्मी भी खा जाएं धोखा
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राजधानी में मिलावटी खून का धंधा करने वाले पांचों शातिर काली कमाई के चक्कर में छह महीने से मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहे थे। एसटीएफ एसएसपी अभिषेक सिंह ने बताया कि गिरोह घर में ही मिलावटी खून तैयार करता था।
सबसे ज्यादा खून गिरोह के सरगना नसीम के यहां बनता था। मड़ियांव स्थित बीएनके ब्लड बैंक व मेडिसिन ब्लड बैंक के लैब टेक्नीशियन राघवेंद्र सिंह व लैब असिस्टेंट पंकज त्रिपाठी भी घर में ही खून में मिलावट करते थे।
सभी के घर से मिलावटी खून तैयार करने की सामग्री, ब्लड बैग, उस पर चस्पा होने वाली स्लिप व अन्य उपकरण बरामद किए गए। एसटीएफ एसएसपी ने बताया कि डिप्टी एसपी अमित कुमार नागर व उनकी टीम ने एक महीने से गिरोह पर नजर रखने के बाद कार्रवाई की।
दो सदस्य लाते थे डोनर
गिरोह के दो शातिरों सआदतगंज निवासी राशिद अली व निशातगंज निवासी हनी निगम डोनर की व्यवस्था करते थे। जबकि हनी ब्लड बैग पर चस्पा होने वाली मेडिकल स्लिप व स्टिकर आदि की व्यवस्था भी करता था। राशिद और हनी विभिन्न सरकारी व निजी अस्पतालों में बाहर से आए लोगों, खासकर ग्रामीण इलाके के लोगों को निशाना बनाते थे। उन्हें दो से तीन हजार रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से मिलावटी खून बेच देते थे।
अस्पताल के कर्मचारी भी खा जाते थे धोखा
ये शातिर खून के बैग पर मेडिकल स्लिप चस्ता करते थे जिसमें ब्लड ग्रुप व अन्य जरूरी जानकारी फर्जी तरीके से दर्ज की जाती थी। इसे देखकर खरीदने वाले के साथ ही विभिन्न अस्पतालों के कर्मचारी भी धोखा खा जाते थे।
यह हुआ बरामद
35 ब्लड बैग, जिसमें पांच ट्रिपल बैग सिस्टम के नौ पैकेट (कुल 175 अदद और हर अदद में पांच पीस)। 11 सीपीपी प्लेटलेट बैग, 30 एचाईवी किट, छह मलेरिया किट, नौ एनआईवी किट, चार एचबीएस एजी किट, सात एचसीवी, पांच एचवीएस एजी किट, एक एचसीवी किट, दो मलेरिया एसडी, सात पैकेट ब्लड बैग, 70 सिंगल ब्लड बैग, 14 खुले ब्लड बैग, तीन बोतल नार्मल स्लाइन।
ब्लड ग्रुप के अलावा कोई और जांच नहीं
एसटीएफ के मुताबिक गिरोह के तीन सदस्यों को डोनर का खून निकाल कर उसे ब्लड बैग में डालना आता था। ब्लड बैंकों के दोनों शातिर सिर्फ ब्लड ग्रुप की जांच कर पाते थे। बाकी कोई जांच नहीं होती थी। वे खून में स्लाइन वाटर मिला कर एक यूनिट के दो यूनिट खून बनाते थे। कई बार खून के छोटे बैग में पीआरबीसी ( पैक्ड रेड ब्लड सेल) दर्ज कर उसे बेच देते थे।