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गांधी के रौद्र रूप से लोहिया पाते थे हिम्मत
टीम डिजिटल/लखनऊ
Updated Thu, 24 Oct 2013 11:10 AM IST
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समाजवादी विचारक डॉ. राम मनोहर लोहिया का चिंतन महात्मा गांधी से भी प्रेरित रहा। बरेली सेंट्रल जेल में सजा काटने के दौरान 30 अप्रैल 1941 को बापू को लिखे पत्र में इसका उल्लेख मिलता है।
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पत्र की पहली ही पंक्ति ‘महात्मा आपका रुद्र रूप देखकर मुझे शांति मिली, हिम्मत हुई है...’ सब कुछ साफ करती है।
ऐसे एक-दो नहीं बल्कि 200 हस्तलिखित पत्र, गोपनीय दस्तावेज और तस्वीरों की प्रदर्शनी बुधवार को महानगर स्थित राजकीय अभिलेखागार में लगी।
प्रदर्शनी में ‘समाजवादी आंदोलन 1934 से आज तक’ के विषय को समेटा गया है। दो दिवसीय आयोजन के पहले सत्र
में संगोष्ठी में विचारकों ने अपनी बातें रखी।
समारोह के मुख्य अतिथि संस्कृति सचिव एमपी अग्रवाल रहे। दयानंद इंटर कॉलेज के छात्रों ने गान से कार्यक्रम की शुरुआत की।
मुख्य वक्ता डिब्रूगढ़ विवि के पूर्व उपकुलपति प्रो. सत्यमित्र दुबे ने समाजवाद के यूरोपियन और भारतीय दृष्टिकोण के अलावा महिला, शिक्षा अल्पसंख्यक आदि सामाजिक बिन्दुओं पर जोर दिया।
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अध्यक्षता कर रहे हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष उदय प्रताप सिंह ने समाजवाद को एक जीवनशैली और विचारधारा कहा। उन्होंने मुद्दा उठाया कि समाजवादी सोच से संविधान भी प्रभावित हुआ है, इसका जिक्र हमें प्रस्तावना में ही मिलता है।
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पहले सत्र में बीएचयू के विभागाध्यक्ष डॉ. एसआर यादव के शोध पत्र को प्रस्तुत किया गया।
संगोष्ठी में मंगलोर विवि के समाज शास्त्री डॉ. राजाराम तोलपडी, कान्यकुब्ज कॉलेज के प्राध्यापक डॉ. विनोद चंद्रा ने लोहिया और गांधी के वैचारिक सामिप्य पर जोर दिया।
दूसरे सत्र में प्रो. रमेश दीक्षित ने लोहिया के समाजवादी सिद्धांतों पर चर्चा की। काशी विद्यापीठ से आए प्रो. महेश विक्रम ने अपने शोधपत्र को सुनाया। दीपक मिश्र ने लोहिया को कालजयी बताया।
आजमगढ़ से आए शफीउज्जमा के बाद यहां डॉ. राम मनोहर लोहिया विवि की असिस्टेंट प्रो. वंदना सिंह ने लोहिया के नारीवादी सिद्धांतों की बात की। वरिष्ठ पत्रकार के. विक्रम राव ने लोहिया और जयप्रकाश नारायण के निधन के बाद समाजवादी आंदोलन से भारतीय राजनीति पर पड़े प्रभावों का उल्लेख किया।
नेहरू भी थे लोहिया के चिंतन के कायल
अभिलेखागार में सजी प्रदर्शनी के एक पत्र में पंडित नेहरू ने अपनी दूसरी किताब को डॉ. लोहिया द्वारा पढे़ जाने को लेकर लिखा है। पत्र में नेहरू लिखते हैं, किताब न उनके पास बची है और न ही प्रकाशक के पास फिर भी आपको कहीं से व्यवस्था कर भिजवाता हूं। उसे पढ़े। पत्र 17 अप्रैल 1949 को लिखा गया था।