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अकेली बसपा को सोशल इंजीनियरिंग का सहारा

Sun, 20 Apr 2014 01:53 PM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 20 Apr 2014 01:53 PM IST
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election campaign of mayawati

कभी सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले के साथ यूपी की सत्ता में आने वाली मायावती, इसी को केंद्र में लागू करने का सपना देख रही हैं, पर क्या इस बार ये फॉर्मूला काम करेगा।

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भाजपा और कांग्रेस में एक-एक सीट को फतह करने के लिए स्टार प्रचारकों की फौज उतारने की होड़ मची है।

भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी एक दिन में कई-कई राज्यों में तीन से पांच जनसभाएं कर रहे हैं तो भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह का भी औसत तीन से चार तक पहुंच जाता है।
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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी रोज दो से तीन कार्यक्रम कर रहे हैं। सपा मुखिया मुलायम सिंह और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सूबे के चुनावी क्षेत्रों को मथ कर रख दिया है, लेकिन बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती सारी पार्टियों से अकेले ही लोहा ले रही हैं।

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फिर सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला

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बसपा न सिर्फ यूपी की सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही है बल्कि महाराष्ट्र, पंजाब, मध्यप्रदेश, दिल्ली, झारखंड, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, बिहार, असम, छत्तीसगढ़ और जम्मू-कश्मीर में भी अपने प्रत्याशी उतारे हैं।

मायावती ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग को धार देने के लिए रणनीति के लिहाज से पार्टी में मुस्लिम, ब्राह्मण और पिछड़ा चेहरा के रूप में कई नेताओं को पहचान दिलाई है।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी मुस्लिम चेहरा हैं तो सतीशचंद्र मिश्र ब्राह्मण। स्वामी प्रसाद मौर्य व रामअचल राजभर पिछड़ा वर्ग के नेता के तौर पर आगे किए गए हैं, पर इन नेताओं के कार्यक्रम के बावजूद पार्टी के हर प्रत्याशी को मायावती के कार्यक्रम की दरकार है।

बेकरारी नहीं सधा हुआ अंदाज

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मायावती बिल्कुल सधे अंदाज में अपनी रणनीति पर आगे बढ़ रही हैं। वे केंद्र की सत्ता में बैलेंस ऑफ पावर की बात तो करती हैं लेकिन इसके लिए बेकरारी नहीं दिखातीं।

वे दूसरे नेताओं की तरह प्रदेश में रोज चार-पांच जनसभाएं करने के बजाय सिर्फ दो जनसभाएं करके लोगों को अच्छे से यह समझाती हैं कि उनके लिए बसपा ही क्यों जरूरी है?

वे चार बार की अपनी सरकार के कामों की झलक दिखाती हैं तो दूसरी पार्टियों की नीतियों पर कड़े शब्दों में हमलावर नजर आती हैं। जहां जरूरी समझती हैं, मोदी का भय दिखाती हैं।

जहां समीकरण देखती हैं, मुजफ्फरनगर दंगे के बहाने सपा सरकार की बखिया उधेड़ती हैं तो कानून-व्यवस्था को लेकर अपने शासनकाल की जरूर याद दिलाती हैं।

सीधे हमलावर नहीं मायावती

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छोटी-छोटी बातों पर प्रतिक्रिया देने से बचने वाली बसपा सुप्रीमो इस बात को लेकर बेहद सतर्क नजर आती हैं कि उनके समीकरण पर कहीं कोई फर्क तो नहीं पड़ रहा है।

ऐसा मौका आते ही वे तत्काल पलटवार करती हैं। डॉ. अंबेडकर को भारत रत्न देने का मामला रहा हो या अमित शाह व आजम खां पर चुनाव आयोग के प्रतिबंध का, वे सामने आकर प्रतिक्रिया दे चुकी हैं।

मायावती ने बसपा के चुनावी अभियान की शुरुआत 22 मार्च को झारखंड में रांची की जनसभा से की थी। वे करीब 13 राज्यों में एक या इससे ज्यादा राज्यस्तरीय जनसभाएं कर चुकी हैं। प्रदेश में चुनावी सभाओं की शुरुआत उन्होंने तीन अप्रैल को बिजनौर से की थी।

वे अलीगढ़, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बुलंदशहर, गाजियाबाद, मेरठ, बागपत, शामली, लखीमपुर, खीरी, हरदोई, बरेली, शाहजहांपुर, मुरादाबाद, अमरोहा, कानपुर, औरैया, फीरोजाबाद, मथुरा होते हुए आगरा के आगे बढ़ चुकी हैं।

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