Election Analysis 2024 : पंजाब में जुबां पर किसान... फिजा में भगवान, दिलचस्प होगा घमासान
सियासी नजरिये से अहम पंजाब में किसान आंदोलन का असर दिख सकता है। इसी आंदोलन ने अकाली दल और भाजपा को अलग होने पर मजबूर कर दिया। हालांकि राममंदिर की भी खूब चर्चा है। देखना दिलचस्प होगा कि 13 लोकसभा सीटों वाले राज्य में वोटर का भरोसा कौन जीतता है।
विस्तार
अमरनाथ एक्सप्रेस से जब लखनऊ से लुधियाना रवाना हुए, ट्रेन अगले दिन सुबह बिल्कुल सही वक्त पौने पांच बजे अंबाला पहुंच गई। पर, यहां पता चला कि शंभू रेलवे स्टेशन (पंजाब-हरियाणा बॉर्डर) के ट्रैक पर किसानों का कब्जा है। ट्रेन डायवर्ट होकर चंडीगढ़ वाया लुधियाना जाएगी। ट्रेन में सवार लोगों को इसकी जानकारी नहीं थी। इससे होने वाली देरी का तो कोई अंदाज ही नहीं था।
पास में बैठे वैशाली (बिहार) के निर्मल प्रसाद की बातों ने पंजाब को लेकर कई सवालों के जवाब दे दिए। बतौर कंटेंट एनालाइजर 2019 से ही निर्मल पंजाब में सियासी सर्वे कर रहे हैं। वे बोले, यहां के जमींदार किसानों ने रोज-रोज सड़क और रेल की नाकेबंदी कर पंजाब के भविष्य को ही डायवर्ट कर दिया है। चुनाव के बीच धरना-प्रदर्शन कभी नहीं सुना था। भाई! सरकार से नाराजगी है, तो वोट से उखाड़ फेंको।
निर्मल ने पंजाब में भाजपा के कांग्रेसीकरण के किस्से सुनाए, तो यह भी बताया कि बड़े-बड़े नेताओं को लाकर टिकट देने से भाजपा अचानक 6-7 सीटों पर चर्चा में आ गई है। भाजपा-शिरोमणि अकाली दल (बादल) का गठबंधन नहीं होने से कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की संभावनाएं बेहतर नजर आने लगी हैं। यहां मुद्दों के केंद्र में किसान हैं, तो फिजा में भगवान राम हैं। चर्चा में सीएम भगवंत मान हैं, तो राजा (कैप्टन अमरिंदर सिंह), रानी (परनीत कौर) के साथ दलबदलू दूसरे नेता भी। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के मिट्टी में मिलाने और फातिहा पढ़ाने वाले बयान चर्चा में हैं, तो राम मंदिर की बातें भी खूब हो रही हैं। पर, ये बातें सियासत पर कितना फर्क डालेंगी, इसका आकलन तो चुनाव में ही होगा।
पंजाब में तीन बड़े फैक्टर
किसान भाजपा छोड़ सबके साथ
लंबे समय से आंदोलन करने वाले किसान किसी एक पार्टी के साथ नहीं हैं। अलग-अलग सीटों पर अलग-अलग कारणों से आप, कांग्रेस व अकाली दल में वे बंट रहे हैं। आप के लिए निराशा की बात यह है कि राज्य में एमएसपी का वादा पूरा न कर पाने से बड़ा तबका कांग्रेस व अकाली में बंटता दिख रहा है। हालांकि, फ्री बिजली के चलते एक तबका साथ है।
राममंदिर ने बढ़ाईं भाजपा की उम्मीदें
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. केहर सिंह कहते हैं, यहां सभी 13 सीटों पर चतुष्कोणीय मुकाबला होगा। अलग-अलग फैक्टर की वजह से आप, अकाली दल, कांग्रेस और भाजपा सभी सीटों पर लड़ते दिखेंगे। पहले शहरी हिंदू कांग्रेस के साथ थे। राममंदिर बन जाने से यह तबका भाजपा में जाता दिख रहा है।
दलितों व सिखों में भी भाजपा की सेंध
दलित मतदाता पहले कांग्रेस और अकाली दल में बंटे रहते थे। इस बार रुझान भाजपा की ओर भी दिख रहा है। सिख मतदाता मुख्य रूप से कांग्रेस और अकाली दल में बंटते नजर आ रहे हैं। कई बड़े सिख नेताओं को लाने से सिख मतदाताओं में भी भाजपा सेंधमारी की उम्मीद कर रही है।
प्रवासी फैक्टर, कई सीटों पर भूमिका
पंजाब में किसानी से लेकर मंडियों तक में यूपी, बिहार, के प्रवासी भरे पड़े हैं। राजस्थान, झारखंड व हिमाचल के प्रवासी सर्विस सेक्टर में मिल जाते हैं। कई तो यहीं के बाशिंदे हो गए हैं। लुधियाना, जालंधर और अमृतसर की फैक्टरियों में प्रवासी बड़ी तादाद में हैं। यहां गेंहू की मड़ाई के लिए देवरिया से आए रमेश यादव कहते हैं कि विधायक व प्रधानी के चुनाव में बुलावा आता है। इस बार किसी का फोन तक नहीं आया। तो अपना काम कर रहे हैं।
- राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर प्रवासी बड़ा फर्क डाल देते हैं, लेकिन लोकसभा क्षेत्र का दायरा बड़ा होने से वह बात नहीं है। 2022 में तत्कालीन सीएम व कांग्रेस नेता चरणजीत सिंह चन्नी ने प्रवासियों के खिलाफ बोल दिया था। तब प्रवासियों ने आप का साथ दे दिया था। इस बार प्रवासी राम-राम भज रहे हैं।
असली जंग पंजाब में, एक चरण में मतदान
पंजाब में आखिरी चरण में एक जून को वोट डाले जाएंगे। अभी यहां प्रत्याशियों का एलान चल रहा है। आप और अकालीदल (ब) ने सभी 13 सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। भाजपा व बसपा 9-9 और कांग्रेस ने अभी 12 उम्मीदवार उतारे हैं।
- चौथे चरण के मतदान के बाद यहां सभी दलों के नेताओं का एकसाथ फोकस बढ़ने की उम्मीद है। असली रंग तभी चढ़ेगा। दशकों बाद बिना किसी गठबंधन लोकसभा चुनाव की असली जंग यहीं चार मुख्य दलों के बीच नजर आएगी।
इस तरह समझिए पार्टियों की रणनीति
भाजपा : हिंदू-शहरी पार्टी की छवि से बाहर आने की कवायद
सियासी पंडित बताते हैं कि ढाई दशक तक शिअद के साथ गठबंधन में रहकर 1 से 3 सीट जीतने वाली भाजपा बखूबी समझ गई है कि अगर उसे आगे जाना है, तो नए रास्ते खोजने होंगे। जब तीन कृषि कानूनों में एमएसपी के मुद्दे पर अकाली दल गठबंधन से बाहर हुई, तो भाजपा को जैसे मौका मिल गया।
- कांग्रेस के पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह, उनकी पत्नी और पूर्व विदेश राज्यमंत्री परनीत कौर, कांग्रेस के पंजाब प्रधान सुनील जाखड़ भाजपा में शामिल हो चुके हैं। आप सांसद सुशील कुमार रिंकू, कांग्रेस के पूर्व सांसद संतोख चौधरी की पत्नी करमजीत कौर, पूर्व सीएम बेअंत सिंह के पोते और लुधियाना से कांग्रेसी सांसद रवनीत सिंह बिट्टू, हिमाचल कांग्रेस के सह प्रभारी तजिंदर सिंह बिट्टू व कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल जैसे चेहरे भाजपा में आ चुके हैं। कई को टिकट भी मिला है।
भाजपा पर हिंदू पंजाबियों की सियासत करने का ठप्पा रहा है। यह शहरी पार्टी मानी जाती है। पटियाला के राजपुरा में मिले गुरजंट सिंह कहते हैं, अमरिंदर, रवनीत और तजिंदर जैसे सिख नेताओं को लाकर भाजपा हिंदू पार्टी की छवि से बाहर आने की कोशिश कर रही है। रिंकू व करमजीत को लाकर दलितों और जाखड़ के जरिये जाटों में सेंधमारी की कोिशश की है। जाखड़ को तो प्रदेश प्रधान ही बना दिया।
कांग्रेस : कई जगह अपनों से ही लड़ाई
2019 के आम चुनाव में अमरिंदर सिंह सीएम थे। तब कांग्रेस ने 13 सीटों में से 8 पर जीत दर्ज की थी। बाद में प्रदेश प्रधान बनाए गए नवजोत सिंह सिद्धू ने अमरिंदर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 2021 में चरणजीत सिंह चन्नी सीएम बनाए गए। दलित सीएम के प्रयोग से भी कांग्रेस 2022 में सत्ता नहीं बचा पाई। इसके बाद दिग्गजों के दलबदल का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अबतक जारी है। चुनौतियों के बीच प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग पर कांग्रेस को सफलता दिलाने की बड़ी जिम्मेदारी है।
शिरोमणि अकाली दल : कम नहीं चुनौतियां
अकाली दल के संस्थापक प्रकाश सिंह बादल के निधन और अकाली-भाजपा गठबंधन टूटने के बाद यह पहला आम चुनाव है। अकाली दल की गांवों में ठीक पैठ मानी जाती है। अकाली ने किसानों के नाम पर गठबंधन तोड़ा, लेकिन 2022 में इसका कोई फायदा नहीं दिखा। विधानसभा चुनाव में बसपा से हाथ मिलाने के बावजूद 117 विस सीटों में सिर्फ तीन जीत पाई। यह चुनाव सुखबीर बादल की सबसे बड़ी परीक्षा है।
बसपा : उत्तर प्रदेश की तरह कमजोर होती पकड़
दलितों के बड़े चेहरे कांशीराम ने यूपी में जाकर चार बार बसपा की सरकार बनवाई। पंजाब में करीब 32% आबादी दलितों की है। इनमें 60% सिख और 40% हिंदू हैं। तमाम प्रयासों के बावजूद कांशीराम इन्हें एकजुट नहीं कर पाए। दलितों का बड़ा समूह कांग्रेस व अकाली दल में बंटता रहा है। यूपी की तरह बसपा यहां भी अकेले लड़ रही है।
चुनावी गणित... ये भी बड़े मुद्दे
नशाखोरी : संगरूर के शेखा गांव (बरनाला) में मिले सुखदेव सिंह कहते हैं, कैप्टन ने गुरुग्रंथ साहिब पर हाथ रखकर कसम खाई थी कि पंजाब को नशामुक्त कर देंगे। पर, कुछ न हुआ। सत्ता से चले गए। अकाली दल भी इस मुद्दे पर कुछ नहीं कर पाई थी। नशामुक्ति का वादा सीएम मान ने भी किया, लेकिन स्थिति जस की तस है।
घटता जलस्तर : पंजाब यूनिवर्सिटी पटियाला के प्रो. जसविंदर बराड़ कहते हैं, तेजी से गिरता भूजल स्तर बड़ा मुद्दा है। साल में पानी का स्तर करीब एक मीटर नीचे जा रहा है। वजह, धान और गेहूं का यह सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। एक किग्रा धान तैयार करने में 5 हजार लीटर पानी खर्च होता है। यहां 14 लाख ट्यूबवेल हैं।
आर्थिक चुनौतियां : फसलों के नुकसान के एवज में किसानों को मुआवजा नहीं मिल पा रहा है। गारंटी के बावजूद महिलाओं को एक हजार रुपये महीने नहीं दे पाए। कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाल नहीं की जा सकी। 12% महंगाई भत्ता भी बकाया है। स्थिति यह है कि आज जो कर्ज ले रहे हैं, उसका 97 प्रतिशत हिस्सा पिछले कर्ज का ब्याज चुकाने में देना पड़ रहा है।
आप : 2022 जैसा प्रदर्शन दोहराने की चुनौती
कांग्रेस की कलह और किसानों के बड़े समर्थन की बदौलत आप 2022 में विधानसभा की 117 में से 92 सीटें फतह कर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई थी।
- शहीद भगत सिंह के स्मारक खटकड़कलां में सीएम पद की शपथ लेते हुए भगवंत मान ने गारंटियों को पूरा करने का वादा किया था। फ्री बिजली को छोड़कर ज्यादातर आकर्षक वादे अधूरे हैं।
- आप ने 2019 में केवल एक सीट संगरूर जीती थी। मान यहां से सांसद थे। सीएम बने तो उपचुनाव हुआ। इसके बावजूद मान संगरूर में आप को नहीं जिता पाए।
- कांग्रेस सांसद संतोख चौधरी के निधन के बाद जालंधर में उपचुनाव हुआ। संगरूर की हार की भरपाई के लिए आप कांग्रेस से सुशील रिंकू को ले आई। रिंकू जीते व पार्टी ने 2024 में भी टिकट दिया। लेकिन, रिंकू आप छोड़ भाजपा में चले गए।
- आप ने 2022 में राघव चड्ढा, डॉ. संदीप पाठक सहित सात को राज्यसभा सदस्य बनाया। संगरूर में 2013 से आप का झंडा उठा रहे पूर्व फौजी गुरजंट सिंह कहते हैं कि दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के जेल जाने के बाद से संदीप पाठक को छोड़ इनमें से ज्यादातर सक्रिय नहीं दिख रहे हैं।
- पार्टी ने पांच पर मान सरकार के मंत्रियों को उतार दिया है। इनकी हार-जीत सीधे मान से जोड़कर देखी जाएगी।