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डॉ. लोकेंद्र बोले:एक्सीडेंट के बाद चंद सेकेंड की बेहोशी या एक उल्टी आना है जानलेवा, ये हैं पांच रेड फ्लैग साइन

Tue, 23 Apr 2024 06:32 PM IST
रोहित मिश्र अमर उजाला टीम डिजिटल, लखनऊ
अमर उजाला टीम डिजिटल, लखनऊ Published by: रोहित मिश्र Updated Tue, 23 Apr 2024 06:32 PM IST
सार

लखनऊ के मेंदाता अस्पताल में इमरजेंसी और ट्रामा के हेड डा. लोकेंद्र गुप्ता कहते हैं कि चोट लगने के बाद बॉडी पांच तरीके के लक्षण देती हैं यदि इनमें से कोई एक लक्षण मरीज के शरीर में है तो यह घातक होता है।

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Dr. Lokendra said: Fainting for a few seconds or vomiting after an accident is fatal, these are five red flag
Dr. Lokendra gupta medanta hoshpital - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

रोड एक्सीडेंट के बाद कई बार ऐसा होता है कि हम नॉर्मल दिखते हैं। बस कुछ सेकेंड की बेहोशी आती है और फिर हम बिना डॉक्टर को दिखाए घर चले जाते हैं। यह जानलेवा हो सकती है। ऐसे बहुत मामले सामने आते हैं जब व्यक्ति घर पहुंचता है और सो जाता है। फिर नींद में ही उसकी मौत हो जाती है या फिर उसके उल्टियां या सिर तेज दर्द होता है। यह बहुत ही घातक स्टेज हो जाती है। लखनऊ के मेंदाता अस्पताल में इमरजेंसी और ट्रामा के हेड डा. लोकेंद्र गुप्ता कहते हैं कि चोट लगने के बाद बॉडी पांच तरीके के लक्षण देती हैं यदि इनमें से कोई एक लक्षण मरीज के शरीर में है तो यह घातक होता है। मेडिकल की भाषा में इसे फाइव रेड फ्लैग साइन कहते हैं। हादसे के बाद इन लक्षणों पर गहरी नजर रखनी चाहिए।  

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क्या हैं ये रेड फ्लैग साइन
नींद, बेहोशी, सिर में बहुत तेज दर्द, उल्टी और शरीर का एक हिस्सा काम ना करना ये साइन ब्रेन इंजरी के हैं। कई बार एक छोटी सी उल्टी होती है या 30 सेकेंड की बेहोशी आती है। इसके बाद मरीज को सब ठीक लगने लगता है और वह घर चला जाता है। ऐसा नहीं करना चाहिए। उल्टी या बेहोशी जानलेवा है। कई बार रोड एक्सीडेंट में आपको तेज शॉक लगता है, और मरीज को छ से आठ घंटे के बाद उल्टी आती है और तब तक सिर के अंदर काफी ब्लेडिंग हो चुकी होती है। 
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सिर की चोट के अलावा और क्या खतरनाक? 
इस सवाल के जवाब में डॉक्टर गुप्ता कहते हैं कि मृत्यु सिर्फ सिर की चोट लगने से नहीं होती। शरीर के कई ऐसे हिस्से हैं जहां पर चोट लगने से मृत्यु का खतरा रहता है। सिर के नीचे गर्दन होती है। गले में सी1, सी2 महत्वपूर्ण हड्डियां होती हैं। इनके टूटने पर स्पाइनल कॉर्ड डैमेज होती है। यह चोट पर निर्भर करता है कि इन हड्डियों के टूटने के बाद मरीज कोमा में जाता हैं या उसकी तुरंत मृत्यु हो जाती है। फांसी की क्रिया में भी मौत गले की इन हड्डी टूटने के चलते ही होती है। इससे रिस्पेरटरी सिस्टम बंद हो जाता है और आपकी सांस लेने की क्रिया रुक जाती है। 
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कई बार चेहरे की इंजरी जानलेवा होती हैं। नाक और मुंह में इतनी गहरी चोट होती कि सांस लेने के दरवाजे ही ब्लॉक हो जाते हैं। इस केस में शरीर के किसी और हिस्से में चोट ना लगने के बावजूद मौत हो जाती है। कई बार फेफड़े के अंदर इतनी ब्लीडिंग हो जाती है कि वह मौत की वजह बनती है। यही हार्ट के साथ होता है। यदि हार्ट का बड़ा हिस्सा चोटग्रस्त हो गया तो यह मौत की वजह बनता है। लीवर जो खून का स्टोरेज करता है यदि सीधे चोट वहां लगी है और अधिक मात्रा में ब्लीडिंग हो गई तो भी यह जानलेवा होता है। कई बार सीट बेल्ट इंजरी से मौत हो जाती है। इसमें सीने की हड्डी और लंग्स में गहरी चोट मौत की वजह बनती है। 

साथ में जो आदमी है वह क्या करे
डॉक्टर लोकेंद्र गुप्ता सैक्टम नाम की संस्था को संचालित कर रहे हैं। यह संस्था चोट लगने के बाद आप क्या करें इस विषय में जागरुकता फैलाने का काम करती है। डॉक्टर कहते हैं कि आपके फोन में ऐसा नंबर हमेशा होना चाहिए जो इमरजेंसी में एंबुलेंस को बुला सके। चोट लगने के बाद का वह समय बहुत कीमती होता है उस समय कन्फ्यूजन की स्थिति में नहीं होना चाहिए। यदि चोटग्रस्त आदमी के किसी हिस्से से खून बह रहा है तो उसे कसकर बांध दें। यदि पेशेंट जगा हुआ तो जान जाने के खतरे कम हैं। गर्दन यदि टेढ़ी-मेढ़ी हो गई है तो उसे किसी पट्टे या कपड़े सहारे सपोर्ट दे दें लेकिन उसे ठीक करने की कोशिश खुद न करें। ऐसा करने से इंटरनल एंजरी हो सकती है। पेशेंट को बहुत मूव नहीं करना चाहिए। यदि उसके हाथ या पैर टूट गए हैं तो उन्हें सीधा करने की कोशिश ना करें। यह काम डॉक्टर का है। हां, यदि एक्सीडेंट के शिकार व्यक्ति के मुंह से खून आ रहा है तो उसे करवट दिला दें ताकि खून फेफड़ों के अंदर ना जा सके। क्योंकि मरीज उस समय खून को थूकने की हालत में नहीं होता है। 

पहला एक घंटा है सबसे कीमती 
एक्सीडेंट के बाद के एक घंटे को मेडिकल भाषा में गोल्डर ऑवर कहते हैं। यह हादसों की दशा में बहुत महत्वपूर्ण होता है। आप यदि इस एक घंटे में मरीज को अस्पताल लाने में सफल रहे तो उसके बचने के चांस कई गुना बढ़ जाते हैं। यहां ये भी मैटर करता है कि आप पेशेंट को किस तरह के अस्पताल में ले जा रहे हैं। वहां उस तरह की मेडिकल सुविधाएं हैं या नहीं। अस्पतालों में मेडिकल फैसल्टी होने से ज्यादा यह महत्वपूर्ण है कि उसको यूज करने वाले डॉक्टर और सपोर्टिंग कैसा है। स्टाफ का वेलट्रेंड होना बहुत जरुरी है। किसी भी डिस्ट्रिक हॉस्पिटल में मरीज के साथ इतना जरूर कर दिया जाना चाहिए कि वह बड़े शहरों के अस्तपालों तक ट्रेवल कर सके। मरीज को इतना स्टेबल कर दिया जाए कि वह दो से तीन घंटे एबुंलेंस में बिता सके। 

हर जिले में एक मिनी ट्रामा सेंटर होना चाहिए
मेडिकल की सुविधाएं सिर्फ राजधानी तक केंद्रित ना हों। हर जिले में एक मिनी ट्रामा सेंटर होना चाहिए। हम वहां ज्यादा तो नहीं कर सकते लेकिन एक सर्जन, एक हेड सर्जन और आर्थौपैडिक सर्जन हमेशा होना चाहिए। यहां 24 घंटे सर्जरी की सुविधा हो। इन सेंटर में इतनी मेडिकल फैसल्टी हों कि वह शरीर के किसी भी हिस्से में हो रही इंटरनल ब्लीडिंग को रोक सकें। इसके अलावा पूरे प्रदेश में यदि 20 बड़े ट्रामा सेंटर हो जाएं तो पूरा लोड अकेले एक ही जगह पर ना पड़े। साथ ही दुर्घटना होने पर ट्रेवल टाइम भी घट जाए। एक्सीडेंट होने पर पेशेंट को अधिक से अधिक सौ से डेढ़ सौ किमी का सफर ही तय करना पड़े। इसके हादसों में मरने वालों की संख्या में तेजी से कमी आएगी। 

डॉक्टर सबसे पहले क्या करें
डॉक्टर लोकेंद्र गुप्ता कहते हैं कि इस बारे में डॉक्टरों को स्पष्ट गाइड लाइन होती हैं। हम सबसे पहले उसका एयरवे चेक करते हैं कि वह सांस ठीक से ले पा रहा है या नहीं। यदि सांस नहीं ले पा रहा है तो उसे वेंटीलेंट पर डालते हैं। इसके बाद हम फेफड़ों को चेक करते हैं। यदि वह अंदर से ब्लीड कर रहा है तो उसका ट्रीटमेंट करते हैं। इसके बाद डॉक्टर को ब्लड सर्कुलेशन चेक करना चाहिए। इसके बाद हम यह देखते हैं कि पेट कहीं से फूला तो नहीं हैं। दबाने पर दर्द तो नहीं हो रहा है। 

आंखों की पुतलियां, ब्लड शुगर भी हम चेक करते हैं। यदि मरीज का एयरवे पूरी तरह से क्लीयर नहीं है तो पेशेंट को तुरंत ओटी रेफर करते हैं। जब चेहरे पर बहुत ज्यादा इंजरी होती है इतनी कि हम वेंटीलेटर के लिए ट्यूब भी नहीं डाल पा रहे हैं तब तुरंत ओटी में लेकर गले में छेद करके एयरवे शुरू करने की कोशिश करते हैं। कई बार फेफड़े के अंदर इतनी ब्लीडिंग हो रही होती है कि उसे पूरा खोलकर खून निकलने की जगह को बंद करनी होती है। लीवर और ब्रेन में बहुत बड़ी इंजरी हो जाने पर भी तुरंत ऑपरेशन करना होता है। 

जान कम से कम जाए इसके लिए क्या कर सकते हैं?
हमें कुछ मामलों में यूके से सीखने की जरूरत है। वहां एक्सीडेंट डिपार्टमेंट होता है। एंबुलेंस के लिए एक अलग लेन होती है। एंबुलेंस उस लेन में 150 किमी की स्पीड से चलकर टाइम से पहुंचती हैं। यहां भी एंबुलेंस के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाने की जरूरत है। साथ ही एंबुलेंस में एक ट्रेंड डॉक्टर हो जो तबियत बिगड़ने पर चीजों को संभाल सके। एंबुलेंस में जरूरी मेडिकल उपकरण हों। 


डॉक्टर लोकेंद्र कहते हैं कि इसके लिए सरकार अकेले पूरा बोझ नहीं उठा सकती। एक नेटवर्क बनाने की जरुरत है। डॉक्टरों को इसके लिए आगे आना चाहिए। एक जागरुकता समाज में जाए इसके लिए  कार्यशालाएं, ट्रेनिंग प्रोग्राम होने चाहिए। हमने सैक्टम(SACTEM) फाउंडेशन के तहत देशभर के उन डॉक्टरों को जोड़ा है जो ट्रामा और इमरजेंसी सेवाएं में अच्छी योग्यता रखते हैं। हम उसमें सरकार के साथ मिलकर कई सारी ट्रेनिंग कंडेक्ट कराने का प्लान कर रहे हैं। हम सार्वजनिक स्थानों, कॉलेजों, गांव-गांव जाकर दुर्घटना होने पर क्या-क्या कर सकते हैं यह बता सकते हैं। इमरजेंसी में क्या करना चाहिए इसको लेकर लिखित में डाक्यूमेंटस तैयार किए जा सकते हैं। इनको फ्री में उपलब्ध कराया जा सकता है। डॉक्टरों को अधिक से अधिक सक्रिय होने की जरूरत है। अकेले सरकार पूरी चीजें नहीं संभाल सकती। हम बस हादसों पर तो नहीं है लेकिन हादसा हो जाने के बाद ट्रीटमेंट जरूर हमारे हाथ में है। 

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