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कहीं डॉक्टर नहीं आए तो कहीं इलाज ही कर दिया बंद, गई तीन मरीजों की जान

Fri, 13 Sep 2019 05:10 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: Amulya Rastogi Updated Fri, 13 Sep 2019 05:10 PM IST
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doctors stop treatment in few hospitals of lucknow 3 patient died
kgmu - फोटो : amar ujala
राजधानी में संजय गांधी पीजीआई और केजीएमयू जैसे चिकित्सा संस्थानों से लेकर अस्पतालों तक का बुरा हाल है। डॉक्टर गोल्डन ऑवर यानी वक्त रहते इलाज देने की जरूरत तो बताते हैं लेकिन इन्हीं सरकारी अस्पतालों में मरीजों की मौत सिर्फ समय पर इलाज न मिलने से ही हो जाती है। इन हालात से रोजाना ही तीमारदारों को दो-चार होना पड़ता है।
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बुधवार रात से बृहस्पतिवार शाम तक तीन आैर मरीजों की मौत का मामला सामने आया है। तीमारदारों ने आरोप लगाया है कि अस्पताल प्रशासन आैर डॉक्टरों की लापरवाही के चलते गंभीर मरीजों को इलाज देने के िलए घंटों इंतजार कराया गया। न डॉक्टर सुनते हैं और नहीं कर्मचारी। डॉक्टरों से गुहार लगाने के बाद भी जब इलाज नहीं मिला तो मरीजों की मौत हो गई। 
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इलाज के इंतजार में उखड़ गईं बुजुर्ग की सांसें 

केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में इलाज के इंतजार में बृहस्पतिवार को बुजुर्ग की मौत हो गई। बुखार से पीड़ित बुजुर्ग को रायबरेली के जिला अस्पताल ने ट्रॉमा रेफर किया था। ऑक्सीजन सपोर्ट पर ट्रॉमा आई मरीज को डॉक्टर कैजुअल्टी से मेडिसिन विभाग की दौड़ लगाते रहे। समय पर इलाज शुरू न होने से बुजुर्ग ने दम तोड़ दिया।

रायबरेली जगतपुर निवासी शिवपति देवी (70) को कई दिन से बुखार था। बृहस्पतिवार सुबह जिला चिकित्सालय ने मरीज को ट्रॉमा भेज दिया। सुबह करीब 11 बजे कैजुअल्टी में प्राथमिक उपचार के बाद ऑक्सीजन सिलेंडर लगाकर मरीज को मेडिसिन विभाग में भेजा गया। आरोप है कि यहां पर डॉक्टरों ने करीब एक घंटे बाद मरीज को देखा। मेडिसिन विभाग में बेड खाली न होने का हवाला देकर वापस कैजुअल्टी भेज दिया। कैजुअल्टी में मरीज को दोबारा ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया। मेडिसिन विभाग में बेड खाली होने का तीमारदार इंतजार करते रहे। इस दौरान करीब चार घंटे बीत गए। इलाज के अभाव में बुजुर्ग महिला मरीज की मौत हो गई। 

नाती अभय प्रताप सिंह का आरोप है कि डॉक्टरों की लापरवाही से उसकी नानी की मौत हो गई। डॉक्टर सिर्फ एक से दूसरे विभाग दौड़ाते रहे। समय पर इलाज न शुरू होने से उनकी मौत हो गई। नाती ने सीएम पोर्टल पर शिकायत की बात कही है।

वार्ड ब्वॉय ने एक घंटे कराया इंतजार
अभय का आरोप है कि कैजुअल्टी से मेडिसिन विभाग में शिफ्ट कराने के लिए वार्ड ब्वॉय ने एक घंटे इंतजार कराया। आरोप है कि उस दौरान शिफ्ट बदल रही थी। लिहाजा वार्ड ब्वॉय ने मरीज को दूसरी शिफ्ट में आने वाले वार्ड ब्वॉय के जरिये मेडिसिन विभाग में ले जाने की बात कही। इस दौरान दो बजे के बाद आने वाले वार्ड ब्वॉय ने ऑक्सीजन सपोर्ट पर मरीज को वहां पहुंचाया। वहां से मरीज वापस किए जाने पर फिर से कैजुअल्टी भेज दिया गया। 

तीमारदारों के आरोप गलत हैं। ट्रॉमा आने वाले हर मरीज को प्राथमिकता से इलाज दिया जाता है। शिकायत मिलेगी तो जांच कराई जाएगी। -डॉ. संदीप तिवारी, प्रवक्ता, केजीएमयू  

बुलाने पर भी नहीं आए डॉक्टर, मरीज ने तोड़ा दम

बलरामपुर अस्पताल में भर्ती कन्नौज निवासी ओम प्रकाश दुबे (58) की बृहस्पतिवार शाम मौत हो गई। तीमारदारों ने डॉक्टर और स्टाफ पर लापरवाही का आरोप लगाकर हंगामा शुरू कर दिया। आरोप है कि बृहस्पतिवार शाम को मरीज की हालत बिगड़ी तो तीमारदार डॉक्टर को बुलाने की गुहार लगाते रहे, मगर सुनवाई नहीं हुई। इलाज के अभाव में मरीज की मौत हो गई।

मरीज आठ दिन पहले सांस लेने में तकलीफ होने पर इमरजेंसी में भर्ती कराया गया था। वहां से मरीज को वार्ड नंबर दो में शिफ्ट कर दिया गया था। पत्नी सुशीला का आरोप है कि कोई भी डॉक्टर मरीज का हाल लेने नहीं आता था। नर्स ही मनमर्जी से उपचार करती थी। बेटे राजा राम का कहना है कि शाम करीब चार बजे मरीज की अचानक हालत गंभीर हो गई थी। नर्स से डॉक्टर को बुलाने के लिए कहते रहे मगर कोई सुनवाई न हुई। इलाज न मिलने से मरीज की मौत हो गई। आरोप लगाया कि डॉक्टर भी बीमारी नहीं पकड़ पाए थे। 

विवादित रहा है वार्ड नंबर-2
बलरामपुर अस्पताल का वार्ड नंबर-2 विवादित रहा है। करीब डेढ़ साल पहले नर्स ने कई मरीजों को इंजेक्शन लगाया गया था। कुछ ही देर बाद मरीजों की हालत बिगड़नी शुरू हो गई थी। इसमें एक मरीज को आईसीयू में शिफ्ट कराना पड़ा था। इसे लेकर तीमारदारों ने खूब हंगामा किया था। निदेशक मामले में कार्रवाई की बजाए मामले को दबाने में जुटे थे। यहां पर आए दिन मरीज की मौत बाद तीमारदार डॉक्टर के न आने की बात कहते हैं।

गलत हैं आरोप 
तीमारदारों के आरोप गलत है। ऐसा संभव नहीं है कि डॉक्टर वार्ड में राउंड पर न जाएं।
डॉ. राजीव लोचन, निदेशक, बलरामपुर अस्पताल  
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असाध्य कार्ड में रुपये खत्म, इलाज बंद, बच्ची की मौत

पीजीआई में असाध्य कार्ड में रुपये खत्म होने और इलाज बंद होने से बुधवार देर रात मासूम बच्ची की मौत का मामला सामने आया है। तीमारदारों का कहना है कि बच्ची को वार्ड से डिस्चार्ज न करने की गुहार लगाते रहे, लेकिन डॉक्टर नहीं पसीजे। वार्ड से बाहर होने के घंटेभर के अंदर ही बच्ची ने दम तोड़ दिया। तीमारदारों का कहना था असाध्य कार्ड में रुपये न होने पर डॉक्टरों ने इलाज रोक दिया था। आधी रात को ही उसे बाहर कर दिया गया, जिससे उसकी मौत हो गई।

बलिया की मुस्कान (13) प्लास्टिक एनीमिया से ग्रसित थी। पीजीआई के हिमेटोलॉजी विभाग से असाध्य कार्ड से इलाज चल रहा था। तीमारदार रोहित ने बताया कि डॉक्टरों ने बोन मेरो ट्रांसप्लांट में करीब 11 लाख रुपये खर्च बताया था।

असाध्य रोग से बजट जारी होने बाद भी ट्रांसप्लांट नहीं हुआ। डॉक्टर दवाएं देते रहे। मंगलवार को असाध्य कार्ड में पैसा खत्म हो गया। तीमारदार कार्ड में पैसा डलवाने वेलफेयर सोसाइटी गया। कर्मचारियों ने असाध्य रोग बजट खत्म होने की बात कहकर वापस कर दिया। कार्ड में पैसा न होने पर डॉक्टरों ने भी इलाज से मना कर दिया।

बुधवार देर रात मरीज को डिस्चार्ज कर दिया गया। बच्ची को विभाग से बाहर कर दिया गया। करीब एक घंटे बाद ही उसकी मौत हो गई। नाराज तीमारदारों ने पीजीआई प्रशासन को बच्ची की मौत का जिम्मेदार ठहराया। मामले की शिकायत सीएम योगी आदित्यनाथ व पीजीआई निदेशक से की।

असाध्य रोग का बजट खत्म
पीजीआई में असाध्य रोग का बजट खत्म होने से कई तीमारदार अपने पैसे से उपचार करा रहे हैं तो कई मरीजों को डिस्चार्ज कर दिया गया। डॉक्टरों ने मरीजों को असाध्य बजट आने पर दोबारा इलाज शुरू करने की बात कही है। अफसरों का कहना है कि बजट की मांग शासन को भेजी गई है। गौरतलब है कि पीजीआई में असाध्य, आरोग्य, बीपीएल मरीजों को मुफ्त इलाज मुहैया कराया जाता है। इसके लिए शासन ने हर साल करीब तीन से चार करोड़ रुपये बजट भी मिलता है। 

पीजीआई सीएमएस डॉ. अमित अग्रवाल ने बताया कि संस्थान में असाध्य, आरोग्य, बीपीएल व आयुष्मान मरीजों को मुफ्त इलाज मुहैया कराया जाता है। इसमें 35 हजार से कम इनकम वाले मरीजों को इस श्रेणी में रखकर उनका उपचार किया जाता है। 

तीमारदार ने खुद कराया था डिस्चार्ज
असाध्य कार्ड में पैसा खत्म होने पर तीमारदार ने खुद मरीज को डिस्चार्ज कराया था। बजट की मांग शासन से की गई है। तीमारदारों के आरोप गलत हैं। संस्थान में गरीब मरीजों को मुफ्त इलाज के साथ ट्रांसप्लांट किया जा रहा है।
डॉ. अमित अग्रवाल, सीएमएस, पीजीआई  
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