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अयोध्या में मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन लेने पर सुन्नी वक्फ बोर्ड में मतभेद

Wed, 20 Nov 2019 02:05 AM IST
दुष्यंत शर्मा मोहम्मद इरफान, लखनऊ
मोहम्मद इरफान, लखनऊ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 20 Nov 2019 02:05 AM IST
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Differences in Sunni Waqf Board over taking five acres of land for mosque in Ayodhya
सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील एस रिजवी - फोटो : ANI

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार अयोध्या में मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन लेने के मुद्दे पर सुन्नी वक्फ बोर्ड में मतभेद सामने आ गया है। बोर्ड के दो सदस्य इमरान माबूद खान और अब्दुल रज्जाक खान जमीन लेने के पक्ष में नहीं हैं। वहीं अन्य सदस्यों की मंशा अभी सामने नहीं आई है।  

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सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में दिए फैसले में विवादित भूमि हिंदू पक्षकारों को देने के साथ ही सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ जमीन देने की बात कही है। सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन जुफर फारूकी सुप्रीम कोर्ट फैसले के खिलाफ रिव्यू दाखिल करने से मना कर चुके हैं। 
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पांच एकड़ जमीन स्वीकार करने की मंशा जाहिर करते हुए इस पर मुहर लगाने के लिए उन्होंने 26 नवंबर को बोर्ड की बैठक बुलाई है। लेकिन बैठक से पहले ही बोर्ड के दो सदस्यों इमरान माबूद खान और अब्दुल रज्जाक खान ने अध्यक्ष के निर्णय के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दोनों ही सदस्य उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के पूर्व चेयरमैन रह चुके हैं, जबकि वर्तमान में बार काउंसिल के सदस्य हैं। 
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फैसले की खामियों से ध्यान हटाने के लिए जमीन देने का प्रावधान : इमरान माबूद
वक्फ बोर्ड के सदस्य इमरान माबूद खान का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद स्वीकार किया है कि बाबरी मस्जिद का निर्माण बाबर के कमांडर मीर बाकी ने 1528 में कराया था। 1857 से 1949 तक बाबरी मस्जिद का तीन गुंबद वाला भवन तथा मस्जिद का अंदरूनी सहन मुसलमानों के कब्जे व प्रयोग में रहा है।

कोर्ट ने बाबरी मस्जिद में 1857 से 1949 तक मुसलमानों का कब्जा तथा नमाज पढ़ा जाना भी मानते हुए 22/23 दिसंबर 1949 की रात में रामचंद्रजी की तथा अन्य मूर्तियों का बलपूर्वक रखा जाना अवैधानिक बताया। इसके बावजूद कोर्ट ने मस्जिद की जमीन हिंदू पक्षकारों को दे दी।

मस्जिद की जमीन के बदले में दूसरी जगह पांच एकड़ जमीन देने की बात रिश्वत जैसी है, ताकि लोगों का ध्यान फैसले की खामियों से हटाया जा सके। उन्होंने कहा कि न्यायालय के फैसले ही नजीर बनते हैं। कोर्ट के इस फैसले को आधार को बनाकर नए विवाद खड़े करने की संभावना है। उन्होंने बोर्ड अध्यक्ष की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए बैठक में शामिल न होने का निर्णय किया है।

रिव्यू से फायदा नहीं, राफेल जैसा होगा हाल

इमरान माबूद फैसले के खिलाफ रिव्यू दाखिल करने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि अयोध्या मामले में रिव्यू का हाल राफेल जैसा होने की ज्यादा उम्मीद है। राफेल मामले की रिव्यू कोर्ट ने इस आधार पर स्वीकार की थी कि सरकार ने गलत तथ्य रखे हैं, लेकिन फैसले में यह कहकर खारिज कर दी कि मेरिट नहीं है।  

सीबीआई जांच से खुद को बचाने का प्रयास कर रहे फारूकी: अब्दुल रज्जाक
बोर्ड के दूसरे सदस्य अब्दुल रज्जाक खान भी मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन न लेने के पक्ष में हैं। उन्होंने बोर्ड अध्यक्ष जुफर फारूकी के रिव्यू दाखिल न करने के निर्णय का भी विरोध किया।

अब्दुल रज्जाक ने कहा कि फैसले के खिलाफ रिव्यू दाखिल करना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने जुफर फारूकी के कार्यों पर सवाल उठाते हुए कहा कि वक्फ बोर्ड की सीबीआई जांच की संस्तुति हो चुकी है।

ऐसे में सरकार को खुश कर खुद को जांच से बचाने के लिए फारूकी इस तरह का निर्णय ले रहे हैं। अब्दुल रज्जाक ने कहा कि अपना विरोध जताने के लिए वह बैठक में शामिल हो सकते हैं।

बोर्ड में अध्यक्ष समेत हैं ये 8 सदस्य
सुन्नी वक्फ बोर्ड में अध्यक्ष जुफर फारूकी समेत कुल आठ सदस्य हैं। इनमें से दो सदस्य इमरान माबूद खान और अब्दुल रज्जाक खान बार काउंसिल से हैं। एक सदस्य मोहम्मद जुनीद सिद्दीकी सरकार की ओर से मनोनीत हैं। विधायक अबरार अहमद के अलावा अदनान फर्रूख शाह, जुनैद सिद्दीकी, सैयद अहमद अली बोर्ड में शामिल हैं।

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