UP: अवसरवादियों का गढ़ बनी भाजपा, कार्यकर्ता सहमें!
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दारा सिंह चौहान ने बसपा से राजनीति शुरू की। समीकरण बिगड़े तो सपा में चले गए। सपा से राज्यसभा गए और लोकसभा चुनाव भी लड़े। समीकरण गड़बड़ाए तो फिर बसपा में आ गए। इस बार का लोकसभा चुनाव बसपा से लड़े लेकिन हार गए। उनका दिल भाजपा में शामिल होने को मचल पड़ा।
भाजपा भी पीछे नहीं रही, उसने दो कदम आगे बढ़कर दारा सिंह को गले लगा लिया। इस हड़बड़ी में भाजपा को यह याद नहीं रहा कि उन्होंने लोकसभा चुनाव में भाजपा व नरेन्द्र मोदी को न जाने क्या-क्या कहा था। साफ-सुथरी राजनीति का दावा करने वाली भाजपा ने बलबा, डकैती, लूट, जान से मारने की कोशिश, सरकारी कर्मचारियों से अभद्रता जैसे मुकदमों के आरोपी चौहान को झट से गले लगा लिया।
अवसरवादियों की बात करें तो अवतार सिंह भड़ाना का चेहरा भी दारा सिंह से बहुत अलग नहीं है। वह कांग्रेस में रहे और लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस छोड़ हरियाणा के इंडियन नेशनल लोकदल का दामन थामा। लोकसभा चुनाव हारे तो अब भाजपा में आ गए।
अवसरवादियों व दागियों को गले लगाने में कई उदाहरण सामने रख चुकी भाजपा अब दलबदल की नई परिभाषा गढ़ रही है। बसपा के राज्यसभा सदस्य जुगुल किशोर व लोकतांत्रिक कांग्रेस के फतेह बहादुर जैसों के परिवार वालों की भाजपा में एंट्री इसी का प्रमाण है।
भाजपाइयों के दिल की धड़कने बढ़ीं
खुद भाजपा के लोगों को पार्टी नेतृत्व के ये फैसले डराने लगे हैं। उनके दिल की धड़कने बढ़ रही हैं। एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि लोकसभा चुनाव की जीत की खुमारी में पार्टी के लोग पुरानी गलतियों से मिले सबक को भूल गए हैं। सब कुछ भुलाकर अवसरवादियों के सहारे सत्ता पाने का सपना देखा जा रहा है।
बाबू सिंह कुशवाहा प्रकरण से हुआ नुकसान ही नहीं, 2002 में पार्टी में हुई बगावत भी भूल गए। याद नहीं रहा कि सत्ता में रहते पार्टी में आए चेहरे दिन खराब होते ही कई पुरानों को भी अपने साथ लेकर चले गए थे। उस झटके से भाजपा लोकसभा चुनाव में उबर पाई थी कि उसके नेता फिर पुरानी राहों पर चल पड़े।
विधान परिषद चुनाव में जोड़तोड़ की राजनीति का खामियाजा भारी फजीहत के रूप में मिल चुका है। पर, पार्टी के लोग सबक लेते नहीं दिखते। ब्याज के लालच में मूलधन भूलते जा रहे हैं।
अपने ही दावों को भूल गए नेता
दारा सिंह से भाजपा को कितना फायदा होगा, यह तो रणनीतिकार जानें। पर, इस स्थिति ने प्रधानमंत्री मोदी सहित पार्टी के बड़े नेताओं के उन दावों पर जरूर सवाल खड़े कर दिए हैं जो यह कहते नहीं थकते थे कि उनके पास कार्यकर्ताओं की लंबी फौज है। नेतृत्व करने वाले नेताओं की लंबी लाइन है।
लोकसभा चुनाव के दौरान खुद मोदी मंचों पर कहते थे कि उनका सौभाग्य है कि वह भाजपा में हैं। इसमें उनके जैसे कार्यकर्ता को भी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया। यहां कोई भी कार्यकर्ता पार्टी के शीर्ष पद पर पहुंच सकता है।
मगर दारा सिंह, अवतार सिंह भड़ाना, जुगुल किशोर और फतेह बहादुर के परिवार वालों को भाजपा में शामिल करने से यही साबित होता है कि पार्टी के पास 2017 में विधानसभा चुनाव लड़ने वाले मजबूत चेहरों का अकाल है। लोकसभा चुनाव में भारी जीत के बावजूद भाजपा का आत्मविश्वास डगमगाया हुआ है।
अवसरवाद की नई परिभाषा, नई परंपरा
भाजपा के ही एक पुराने नेता तंज कसते हैं कि पार्टी कभी दलबदल कानून की घोर विरोधी मानी जाती थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने दलबदल कराने के बजाय त्यागपत्र देना पसंद किया था। पर, आज जो कुछ हो रहा है उससे भविष्य में भाजपा दलबदल विरोधी कानून को सख्त स्वरूप दिलवाने के लिए नहीं बल्कि अवसरवाद व दलबदल की नई परिभाषा गढ़ने व परिवार के सहारे पार्टी बदलने की परंपरा शुरू करने के लिए पहचानी जाएगी।
लोकसभा चुनाव में बृजभूषण शरण सिंह के पुत्र प्रतीक भूषण को पार्टी में लेकर पार्टी ने दलबदल की नई परिभाषा गढ़ी थी कि सदन की सदस्यता बचाए रखते हुए भाजपा में आ जाओ। बृजभूषण तब सपा के सांसद थे।
भाजपा ने उनके पुत्र प्रतीक भूषण को पार्टी में लेकर यह संदेश दिया कि बृजभूषण भले ही सपा में हो लेकिन वह अब भाजपा के हो गए हैं। अब जुगुल किशोर व फतेह बहादुर के परिवारों को शामिल करके भाजपा ने इस परिभाषा को परंपरा में बदलने का संदेश दिया है।
पराजित चेहरों से क्या लाभ होगा : दारा सिंह हों या अवतार सिंह, दोनों लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। हराने वाली भाजपा ही है। इसीलिए यह बात किसी के भी समझ से परे है कि चुनाव हार चुके दारा सिंह व अवतार सिंह को पार्टी में शामिल करने से भाजपा को क्या लाभ होगा। उन कार्यकर्ताओं का क्या होगा, जो इनके खिलाफ चुनाव में जुटे थे।