फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   critical delivery in sgpgi lucknow

एक ही दिल से जुड़े थे दो भ्रूण, एसजीपीजीआई में डॉक्टरों ने जान बचाकर किया चमत्कार

Fri, 31 Aug 2018 08:17 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 31 Aug 2018 08:17 AM IST
विज्ञापन
critical delivery in sgpgi lucknow
पैदा हुआ नवजात

कोख में पल रहे दो भ्रूण पर दिल एक ही। दिल पर खून की सप्लाई का दबाव बढ़ने से वह फेल होने की कगार पर पहुंच गया। पर, मुश्किल यह था कि दूसरे भ्रूण को काट कर निकालना जच्चा-बच्चा दोनों की जिंदगी पर भारी पड़ सकता था।

विज्ञापन


बेहद चुनौती वाले इस मामले में एसजीपीजीआई के मातृत्व व प्रजनन स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टरों ने ऐसी प्रक्रिया अपनाने का फैसला किया जिससे बिना दिल वाले भ्रूण को मिल रही खून की सप्लाई बंद की जा सके।
विज्ञापन


बेहद जटिल मामले में यह प्रक्रिया कामयाब रही और 29 अगस्त को सामान्य प्रसव हुआ। फिलहाल मां और नवजात दोनों पूरी तरह से ठीक हैं। इसके लिए रेडियो फ्रिक्वेंसी एब्लेशन (आरएफए) नामक आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जो प्रदेश में पहली बार है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


डॉक्टरों ने बताया था ट्यूमर
अंबेडकरनगर के निशांत पांडेय की पत्नी अंकिता साढ़े पांच माह की गर्भवती थीं। यह उनका दूसरा गर्भ था। स्थानीय अस्पताल में नियमित जांच व इलाज चल रहा था। अल्ट्रासाउंड जांच रिपोर्ट आई तो पता चला कि भ्रूण के साथ कुछ और भी असामान्य है। डॉक्टरों ने उसे ट्यूमर बताकर गर्भवती को एसजीपीजीआई के लिए रेफर कर दिया। दो जून को अंकिता को लेकर निशांत एसजीपीजीआई आए। यहां डॉ. मंदाकिनी प्रधान के नेतृत्व में उनका इलाज शुरू हुआ। अल्ट्रासाउंड जांच में डॉ. प्रधान ने पाया कि गर्भ में दो भ्रूण हैं, लेकिन दूसरा भ्रूण पूरी तरह विकसित नहीं है। 

दूसरा भ्रूण बगैर दिल का था, दिमाग व ऊपरी अंग विकसित नहीं हुए थे

अत्याधुनिक तकनीक से सर्जरी करने वाली टीम की प्रमुख व विभागाध्यक्ष डॉ. मंदाकिनी प्रधान बताती हैं कि जांच से पता चला कि एक भ्रूण अकार्डियक यानी बगैर हृदय का है। दोनों भ्रूण एक ही गर्भनाल से जुड़े थे। एक भ्रूण के हृदय से ही दोनों में रक्त की सप्लाई हो रही थी। एक भ्रूण पूरी तरह विकसित था, लेकिन दूसरे भ्रूण में केवल निचले हिस्से में ही ब्लड सप्लाई हो पाने से सिर्फ निचला हिस्सा विकसित हो सका था। ब्रेन व हाथ सहित ऊपरी अंग विकसित नहीं हो पाया था। दो भ्रूण में ब्लड सप्लाई करने से दिल पर अधिक दबाव पड़ रहा था। जांच करने पर हृदय घात की आशंका पाई गई। 

दोनों भ्रूण को अलग करना संभव नहीं था

डॉ. प्रधान बताती हैं कि गर्भावस्था के दौरान किसी भी तरह से दोनों भ्रूण को अलग करना संभव नहीं था। न इन्हें काट कर अलग किया जा सकता था और न ही केमिकल का इस्तेमाल किया जा सकता था। ऐसा करने पर स्वस्थ भ्रूण के जीवन पर भी संकट आ सकता था। 

एक ही रास्ता था बिना हृदय वाले भ्रूण की खून की सप्लाई रोकना
एक ही रास्ता था कि किसी तरह असामान्य भ्रूण को खून की सप्लाई रोकना ताकि हृदय पर दबाव कम किया जा सके। सर्जरी नहीं की जा सकती थी इसलिए यह काम आरएफए तकनीक से ही किया जा सकता था। 2 जून को इस तकनीक के जरिये टीम ने असामान्य भ्रूण को रक्त पहुंचाने वाली वाहिका द्वारा हो रही रक्त की सप्लाई रोक दी। 

चुनौतियां कम नहीं थीं

डॉ. मंदाकिनी ने प्रक्रिया की जटिलता के बारे में बताया कि जरा सी चूक से सामान्य भ्रूण को गंभीर चोट पहुंच सकती थी। गर्भस्थ भ्रूण लगातार घूमता रहता है, ऐसे में सुई के जरिए विशेष वाहिका तक पहुंचना और रक्त सप्लाई रोकना और मुश्किल काम था। 

पांच घंटे में इस टीम ने पूरी की प्रक्रिया
इस प्रक्रिया को पांच विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने अंजाम दिया। इसमें डॉ. मंदाकिनी के साथ डॉ. संगीता, डॉ. इंदुलता, डॉ. नीता व डॉ. अमृत शामिल थीं। प्रक्रिया में करीब पांच घंटे लगे। 

जानिए आरएफए तकनीक
रेडियो फ्रिक्वेंसी एब्लेशन (आरएफए) तकनीक हीट एनर्जी बेस्ड प्रक्रिया है। इसमें एक नीडिल (सुई) को मां की कोख से भ्रूण की संबंधित रक्त वाहिका तक पहुंचाया जाता है। इस नीडिल में लगे इलेक्ट्रोड के जरिए रेडियो फ्रीक्वेंसी एनर्जी (रेडियो वेव) अंदर पहुंचाई जाती है जो भीतर जाकर थर्मल एनर्जी में बदल जाती है। थर्मल एनर्जी उस विशेष जगह पर गर्मी पैदा करती है, जहां उसकी जरूरत है। अधिक गर्मी संबंधित वाहिका की रक्त की सप्लाई बंद कर देती है।

पीजीआई ने उठाया खर्च

डॉ. मंदाकनी ने बताया कि नीडिल करीब एक लाख रुपये कीमत की होती है। पीजीआई में पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया इसलिए इसका खर्च परिवार के बजाए खुद पीजीआई की ओर से उठाया गया। डॉ. मंदाकिनी प्रधान ने बताया कि ऐसे मामले बेहद कम देखने को मिलते हैं। 10 प्रतिशत मामलों में स्वस्थ भ्रूण को भी जख्म लग सकते हैं, खुशकिस्मती से अंकिता के मामले में ऐसा नहीं हुआ।
 
सामान्य प्रसव हुआ
अब 29 अगस्त को सामान्य प्रसव हुआ। फिलहाल मां और नवजात दोनों पूरी तरह से स्वस्थ हैं। जन्म के समय शिशु का वजन 2.46 किलोग्राम था। अब तक इसे देश में केवल एम्स जैसे संस्थानों में ही आरएफए तकनीक का इस्तेमाल हो रहा था। लेकिन अब लखनऊ में मिली सफलता ने न केवल यहां के डॉक्टरों का कौशल साबित किया है, बल्कि भविष्य में इस तरह के मामलों का इलाज भी प्रदेश में मुहैया करवाने का विश्वास जताया है। 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed