कानून के रक्षक नहीं, खुद क्राइम मास्टर हैं SSP यशस्वी यादव
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खुद को मुख्यमंत्री का दोस्त बताकर आला हाकिमों की नाफरमानी करने और मातहतों पर चाबुक चलाना एसएसपी यशस्वी यादव को महंगा पड़ा। उनकी कारगुजारियों से त्रस्त होकर शासन ने शुक्रवार शाम उन्हें चलता कर दिया और डीआईजी रेंज आरके चतुर्वेदी को राजधानी पुलिस की कमान सौंप दी।
यशस्वी यादव का पांच महीने का कार्यकाल फर्जी खुलासों, बेगुनाहों को जेल भेजने, अपराध छुपाने और लोगों पर फर्जी मुकदमे लादने जैसे कारनामों से भरा रहा।
शासन ने महाराष्ट्र काडर के आईपीएस यशस्वी यादव को 4 दिसंबर 2014 को राजधानी का एसएसपी बनाया था। चार्ज लेते ही उन्होंने मनमानी शुरू कर दी। एक पूर्व राज्यमंत्री के इशारे पर स्पोर्ट्स असलहों के कारोबारी तारिक को विदेशी तारिक को विदेशी हथियारों का तस्कर बताकर जेल भेज दिया।
खेल की भनक लगने पर उच्चाधिकारियों ने मुकदमे की तफ्तीश सीतापुर पुलिस को सौंपी। ताबड़तोड़ वारदातों पर अंकुश न लगते देख यशस्वी ने थानेदारों को बगैर इजाजत मुकदमे दर्ज न करने के आदेश देकर अपराध छुपाने का सिलसिला शुरू कराया। इससे अपराधों का ग्राफ बढ़ने लगा।
गौरी हत्याकांड में डीआईजी तक के नहीं माने निर्देश
पिछले दिनों मोहनलालगंज इलाके में बुजुर्ग किसान की गोली मारकर हत्या के पीछे भी अपराध छुपाने का खेल पता चला। कत्ल से 20 दिन पहले भी उसे गोली मारी गई लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज नहीं की।
इससे पहले विधि छात्रा गौरी श्रीवास्तव हत्याकांड में डीआईजी से लेकर डीजीपी तक के निर्देश को दरकिनार कर बेगुनाह अनुज गौतम को जेल भिजवाया और 66 दिन तक वह सलाखों के पीछे रहा।
फर्जी और अधूरे खुलासों से किया गुमराह
यशस्वी यादव के कार्यकाल में राजभवन के पास व्यापारी से 19 लाख की लूट हुई। फजीहत होते देख उन्होंने हजरतगंज पुलिस पर दबाव बनाया और पुलिस ने एक बदमाश को दो लाख रुपये के साथ गिरफ्तार दिखा कर अधूरा खुलासा कर दिया।
शेष 17 लाख रुपये और अन्य बदमाशों का चार महीने बाद भी सुराग नहीं लगा है। इसी तरह विधानसभा मार्ग पर एटीएम बूथ के सामने कैश वैन से 1.33 करोड़ की लूट में भी पुलिस ने एक बदमाश को चार लाख रुपये के साथ गिरफ्तार बता कर फाइल बंद कर दी।
लुटे गए 1.29 करोड़ की बरामदगी और अन्य बदमाशों की तलाश सिर्फ कागजों पर है। पीजीआई इलाके में वकील को बम से उड़ाने वाले अपराधी पांच महीने बाद भी पकड़ने नहीं गए। इसमें भी पड़ोसी को जेल भेज खुलासा कर दिया गया।
ट्रिपल मर्डर व 50 लाख की लूट में भी फर्जी खुलासे की कवायद
दुस्साहसी बदमाशों ने 27 फरवरी की दोपहर डालीगंज इलाके में एटीएम बूथ पर तीन लोगों की हत्या व 50.50 लाख की लूट कर सभी को दहला दिया। खूनी लुटेरों का सुराग लगाने में नाकाम यशस्वी यादव ने फर्जी खुलासे का जाल बुनना शुरू किया।
इसके चलते उसने बाराबंकी से पुलिस कस्टडी रिमांड पर लाए गए अपराधी जीवा पर वारदात कुबूल करने का दबाव बनाया। यही नहीं तेलंगाना में सिमी आतंकियों के मुठभेड़ में मारे जाने की भनक लगते ही ट्रिपल मर्डर व एटीएम लूटकांड से उनका कनेक्शन जोड़ते हुए हवा दी गई लेकिन तेलंगाना के डीजीपी से लेकर अन्य अफसरों ने मारे गए आतंकियों का लखनऊ कनेक्शन मानने से इन्कार कर दिया।
अल्टीमेटम फुस्स होने से आई बेअंदाजी
ट्रिपल मर्डर व 50.50 लाख की लूट के मामले में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पुलिस को 15 दिन का अल्टीमेटम दिया। एसएसपी यशस्वी यादव सीसीटीवी फुटेज के आधार पर खूनी लुटेरों को जल्द पकड़ने का दावा कर गुमराह करते रहे। अल्टीमेटम का वक्त गुजरने के बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर मनमानी शुरू कर दी थी।
मीडिया कर्मियों को बनाया निशाना
यशस्वी यादव ने मीडिया कर्मियों पर भी दबाव बनाया। पेशे से समझौता न करते देख उनके खिलाफ आपराधिक साजिश रचनी शुरू कर दी। मातहतों की टोली बनाई और डकैती व अन्य संगीन धाराओं में फर्जी मुकदमे दर्ज करा दिए।
मीडिया कर्मियों की शिकायत पर डीजीपी ने तफ्तीश दूसरे जिले को स्थानांतरित करने के आदेश दिए लेकिन इस आदेश को भी उन्होंने तवज्जो नहीं दी। डीआईजी रेंज द्वारा जवाब तलब करने पर डीजीपी से तीन दिन का समय मांगा।
इसके बावजूद पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई करते रहे। पानी सिर से ऊपर जाते देख डीजीपी ने खुद जवाब तलब किया और शासन को उनकी करतूत बताई।
राज्यपाल ने सीएम को दिए थे निर्देश
डकैती व अन्य संगीन धाराओं के तहत फर्जी मुकदमा दर्ज कराए जाने से क्षुब्ध मीडिया कर्मियों ने राज्यपाल राम नाइक को प्रत्यावेदन सौंपकर यशस्वी यादव की प्रतिनियुक्ति रद्द कराने और कानूनी कार्रवाई की मांग की थी।
इस पर राज्यपाल ने पत्रकारों की समस्या को गंभीर मानते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कार्रवाई के लिए कहा था। डीजीपी एके जैन ने आईजी जोन जकी अहमद को मामले की जांच सौंपी।
खुद की तुलना मुख्यमंत्री से करते थे यशस्वी यादव
खुद को मुख्यमंत्री का करीबी दोस्त बताने वाले यशस्वी यादव ने राजधानी का कप्तान बनने के साथ अपनी तुलना भी सीएम से करनी शुरू कर दी थी। नीली बत्ती की एंबेसडर कार खड़ी कराई और माडर्न पुलिस कंट्रोल रूम की दो गाड़ियां लेकर चलने लगे।
उसके निकलने पर ट्रैफिक रोक दिया जाता था। रास्ते में कोई व्यवधान आया तो ट्रैफिक दरोगा व सिपाही निलंबित।
कानपुर के अफसरों की तैनाती
यशस्वी यादव ने राजधानी में मनमानी के लिए कानपुर में साथ रहे पुलिस अफसरों की लखनऊ में तैनाती कराई। डग्गामार बसों के संचालन को लेकर दो साल पहले कैसरबाग कोतवाली के एसएसआई से झगड़ने वाले मनीराम यादव को एएसपी ट्रांसगोमती बनवाया।
इसी तरह एएसपी पूर्वी रोहित मिश्रा, एएसपी ग्रामीण मनोज सोनकर, एएसपी ट्रैफिक बृजेश मिश्रा, सीओ राकेश नायक, सीओ अवनीश मिश्रा समेत कई दरोगाओं की तैनाती कराई।
राजधानी में चर्चित रहे इंस्पेक्टर व दरोगाओं को अपनी टोली में शामिल किया। इसके साथ फर्जी खुलासे, अपराध छुपाने व अन्य खेल शुरू कर दिया। अपने मूल काडर महाराष्ट्र में तैनाती के दौरान भी यशस्वी पर महिला पुलिसकर्मी से बदसुलूकी का आरोप लगा था।
विवादो से रहा पुराना नाता, कानपुर में भी किए कारनामे
यशस्वी यादव का विवादों से पुराना नाता रहा है। महाराष्ट्र से प्रतिनियुक्ति पर आए यशस्वी यादव को पहले कानपुर का एसएसपी बनाया गया था। जहां स्टिंग ऑपरेशन कर सरकार के खिलाफ ही मोर्चे खोल दिया। उर्सला अस्पताल में फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बनाकर गिरफ्तार किए गए डॉक्टर को बीते दिनों कोर्ट ने बरी कर दिया।
सपा विधायक इरफान सोलंकी और मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के बीच मारपीट के मामले में एकतरफा कार्रवाई से भी भारी विरोध हुआ। यशस्वी पर डॉक्टरों को मैनेज करने के लिए सवा करोड़ रुपये का ऑफर देने का भी आरोप लगा। कानपुर से कोर्ट के आदेश पर यशस्वी यादव को हटाकर डीजीपी ऑफिस से संबद्ध किया गया था।
यशस्वी के तबादले से महकमा खुश
शुक्रवार देरशाम यशस्वी यादव के हटने की खबर फैलते ही पुलिसकर्मियों ने पुष्टि के लिए मीडिया कर्मियों से संपर्क साधना शुरू किया। दबी जुबान से खुशी का इजहार करने लगे। एसएसपी ऑफिस व कैंप ऑफिस ही नहीं थाने, सीओ व अपर पुलिस अधीक्षकों के ऑफिस में तैनात पुलिसकर्मी खुश थे।
कानपुर से आई टीम बेचैन दिखी। कुछ अधिकारियों ने सपा कार्यालय से लेकर सीएम आवास तक के चक्कर काटे। यशस्वी यादव खुद भी शनिवार दोपहर तक चक्कर काटने के बाद मायूस होकर कैंप ऑफिस लौटे और फाइलों पर दस्तखत बनाने शुरू किए।
आला अफसरों से मिलने पर थी बंदिश
यशस्वी यादव ने मातहतों को आदेश जारी किया था कि उन्हें बताए बगैर आला अफसरों के पास नहीं जाएंगे। किसी बड़े अधिकारी द्वारा बुलाए जाने पर उन्हें जानकारी देनी होगी और लौटने पर बताना होगा कि अफसर ने क्या निर्देश दिए और क्या बात की? इस तरह से एसएसपी ने उच्चाधिकारियों से पुलिस की करतूत छुपाने के प्रयास किए थे।