एक सैनिक की सच्ची कहानी जिसने अपनी सेना की वजह से 26 साल झेला नर्क
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एक सेकंड लेफ्टिनेंट को झूठे आरोपों में फंसाकर गलत तरीके से कोर्ट मार्शल करने और जेल भेजने के मामले में आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने केंद्र सरकार और सेना प्रमुख पर पांच करोड़ रुपये का जुर्माना ठोका है। इस सैनिक के जीवन के 26 साल किसी फिल्म की ट्रैजिक स्टोरी से कम नहीं।
भारतीय सेना में अपने परिवार की लगातार तीसरी पीढ़ी के तौर पर याची सेकंड लेफ्टिनेंट शत्रुघ्न सिंह चौहान शामिल हुए थे और राजपूत रेजीमेंट में उन्हें कमीशन किया गया। 11 अप्रैल 1990 को उन्हें कमांडिंग ऑफिसर ने श्रीनगर के लक्ष्मणपुरा बटमालू में घर-घर जाकर आतंकियों के ठिकानों की तलाशी के निर्देश दिए।
इस दौरान लांसनायक अनिल कुमार सिंह को कंपनी हवलदार मेजर पुत्तु सिंह ने एक नेकलेस चुराते देखा और इसकी सूचना याची को दी। अनिल कुमार सिंह की तलाशी करवाई गई जिसमें 5,100 रुपये कैश उनकी जेब से बरामद हुए। उसी दिन दोपहर दो बजे एक घर में बटमालू मस्जिद के लंगड़े इमाम के पास से सोने के 147 बिस्कुट बरामद किए गए।
इन पर जॉनसन मैथ्यू बैंक, बैंक ऑफ लंदन की मुहर थी। याची शत्रुघ्न सिंह चौहान ने इसकी सूचना अपने सीओ को दी। सीओ ने उन्हें पास में एक जगह पाकिस्तानी झंडा लहराए जाने की सूचना दी और उसे हटाने के लिए भेजा।
दूसरी ओर कर्नल केआरएस पंवार, लांसनायक अनिल कुमार, सेकंड लेफ्टिनेंट राजीव शुक्ला, हवलदार अत्तर सिंह, राजपाल सिंह ने सोने के बिस्कुटों को कर्नल पंवार की जीप के बोनट पर सजाया और जनता, सेना के जवानों और सीआरपीएफ कर्मियों को दिखाया।
नहीं दिखाई सोने के सिक्कों की बरामदगी
साथ ही चौहान से कहा गया कि वे इसका उल्लेख न करें। इस बरामदगी का कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया, न ही किसी नागरिक, सैन्य अधिकारी, सीओ ने इसे पुलिस या कहीं और अपनी शिकायत में दर्ज करवाया। याची ने इस मामले को पार्लियामेंट्री कमेटी में भेजा, जहां सोने के बिस्कुटों की रिकवरी को लेकर याची के हक में निर्णय दिया गया।
सेना मुख्यालय ने जांच के आदेश दिए। मेजर जनरल आरएस तरागी ने जांच की और अगस्त 1990 में अपनी रिपोर्ट दी जिसमें मामले की आगे जांच के लिए कहा गया। इस मामले में पांच कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के आदेश दिए गए।
पहली इन्क्वायरी अनिल कुमार सिंह के खिलाफ की गई, लेकिन इसमें केवल याची के खिलाफ बयान लेने और साक्ष्य जुटाने का काम किया गया। दूसरी जांच 5100 रुपये की रिकवरी और याची के ड्यूटी से अनुपस्थित रहने के मामले में थी, इसमें याची को शामिल होने से रोका गया।
‘कंबल परेड’ में पीटते-पीटते कर दिया अधमरा
याची के अनुसार 13 अप्रैल 1990 की रात जब वे अपने टेंट में सो रहे थे, तब ले. कर्नल एमएस राव, मेजर मुकेश संगुरी और कैप्टन अनिल हजेला ने उन पर हमला किया, जिसे ‘कंबल परेड’ कहा जाता है।
इसमें याची को बर्फ में चलने वाले जूतों से इतना पीटा गया कि कि वे अचेत हो गए। इसके अगले दिन याची मैनपुरी अपने गांव के लिए रवाना हो गया। 16 अप्रैल को वह घर पहुंचा और परिवार को बताया। उसे कानपुर के एयरफोर्स हॉस्पिटल में एडमिट किया गया और वहां से लखनऊ के कमांड हॉस्पिटल लाया गया।
यहां उसे न्यूरोटिक डिप्रेशन एंड एंग्जाइटी का मरीज पाया गया और इलाज किया गया। इलाज के दौरान ही उसे उधमपुर कमांड हॉस्पिटल ट्रांसफर किया गया, जहां वह छह जून 1990 को पहुंचा। 24 घंटे के भीतर ही उसे श्रीनगर शिफ्ट होने के आदेश दिए गए।
श्रीनगर जाने के लिए याची को दो अधिकारी और 17 जवान दिए गए। मूवमेंट के दो आदेश नौ और 10 जून को कर्नल मुखोपाध्याय और सीओ की ओर से थे। हालांकि कोर्ट मार्शल के दौरान कर्नल मुखोपाध्याय ने अपने जीवनकाल में किसी मूवमेंट ऑर्डर को साइन करने की बात से इन्कार किया।
कोर्ट मार्शल की तैयारी
श्रीनगर जाने के दौरान सूबेदार धर्मपाल ने याची को बताया कि उनकी जान को खतरा है और उधमपुर से श्रीनगर जाने के दौरान उन्हें मार दिया जाएगा, वे भाग जाएं। सूबेदार ने उनका पहचान पत्र व अन्य दस्तावेज उन्हें दिए, जिसके जरिए वे बच निकले और 23 जून को वापस मैनपुरी पहुंचे।
इस दौरान याची के पिता जगपाल सिंह ने पूरे मामले की शिकायत सेना मुख्यालय व अन्य अधिकारियों से की। इसके बाद एजुटेंट जनरल की सिफारिश पर याची को तीन महीने नई दिल्ली के मिलिट्री अस्पताल में रखा गया। यहां उन्हें रिलीव करते समय कहा गया कि वे एकल ड्यूटी के लिए फिट नहीं हैं। उन्हें चार राजपूताना राइफल से अटैच किया गया।
अपनी जांच में एजुटेंट जनरल ने सोने के बिस्कुट के मामले को सही पाया और विस्तृत जांच की सिफारिश की। ब्रिगेडियर एसएस वासुदेव ने जांच शुरू की, जिन्हाेंने याची सहित लांसनायक अनिल कुमार, सूबेदार जतन सिंह, सिपाही जनक सिंह आदि की जांच की सिफारिश की, लेकिन याची के खिलाफ ही जांच की गई।
समरी एविडेंस रिकॉर्ड किए गए और फिर याची का कोर्ट मार्शल शुरू किया गया। याची को सामान्य कोर्ट मार्शल के तहत ट्रायल पर भेजा गया। वहीं याची ने सेना प्रमुख को कुछ पत्र लिखे। उनका जवाब भी आया, लेकिन सेना के अधिकारियों ने उन तक नहीं पहुंचने दिए।
जानलेवा हमला कराया
सेना के अस्पताल से छूटे याची को मार्च 1991 में सेना के मेडिकल बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत होना था, लेकिन उन्हें गिरफ्तार करके अप्रैल में श्रीनगर में मेडिकल बोर्ड के समक्ष ले जाया गया।
श्रीनगर जाने के दौरान सिपाही सुरेश सिंह ने उन पर एके 47 राइफल से कुछ मीटर की दूरी से गोलियां दागीं। याची घायल था, उसने भागकर बीएसफ चौकी में शरण ली। इलाज के दौरान याची बच गया।
दूसरी ओर प्रतिवादी पक्ष द्वारा कहा गया कि यह याची का आत्महत्या के प्रयास का मामला था। हालांकि कोर्ट मार्शल के दौरान पुत्तु सिंह और सिपाही अजय पाल सिंह ने माना कि उन्हें याची को गोली मारने के आदेश थे।
इस घटनाक्रम के बाद याची एक महीना श्रीनगर अस्पताल में रहा, लेकिन मेजर सुरेंद्र नाथ के निर्देशों के अनुसार उनके पिता को उनसे नहीं मिलने दिया गया। पिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिस पर बताया गया कि वे निआरी (कुपवाड़ा) में सेना की कस्टडी में हैं।
उन्हें बाद में यहीं अटैच कर दिया गया। एक सिपाही कुशलेंद्र सिंह चौहान के जरिए याची ने अपनी पत्नी से बात की, पत्नी ने उनकी जान को खतरा बताते हुए शिकायत राष्ट्रपति से की। दूसरी ओर याची पर हुए हमले की कोई एफआईआर दर्ज नहीं करवाई गई।
कोर्ट मार्शल में मिली थी सात साल की जेल
ट्रायल के दौरान उनका कोई वकील नहीं रहा। याची ने सेना प्रमुख को अपना मामला भेजा, लेकिन इसे ऑफिशिएटिंग कर्नल (प्रशासन) केएस सघू द्वारा सेना प्रमुख की ओर से खारिज कर दिया गया। वहीं सात अगस्त 1991 को याची पर तीन आरोपों के साथ कोर्ट मार्शल पूरा किया गया।
इसमें उन्हें सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सहित सेवा समाप्त करने के आदेश दिए गए। याची को चार नवंबर 1991 को श्रीनगर जेल भेजा गया, जहां से 15 नवंबर को सिविल जेल में शिफ्ट करते हुए कानपुर सेंट्रल जेल भेजा गया।
वहीं सेना प्रमुख ने सात जुलाई 1992 को उन्हें दी गई सजा से छूट दे दी। इसके बाद याची ने 1993 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसे आर्म्ड फार्स ट्रिब्यूनल में 2012 में ट्रांसफर किया गया।