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टूट गए सपने: निकलने से पहले मकान मालिक ने बर्तन तक रखवा लिए, मजदूरों की आपबीती सुनाते हुए भर आई आंखें
Sun, 10 May 2020 10:13 AM IST
शाहरुख खान
मनीष मिश्र, अमर उजाला, लखनऊ
मनीष मिश्र, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: शाहरुख खान
Updated Sun, 10 May 2020 10:13 AM IST
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लखनऊ पहुंचे मजदूर
- फोटो : अमर उजाला।
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मकान मालिक ने आते समय आधार कार्ड की फोटोकॉपी ले ली। बर्तन भी नहीं ले जाने दिए। बोला कि लौटकर आना और किराया देकर बर्तन ले लेना। इतना बताते ही बिहार के करवल निवासी राजेश कुमार, संतोष कुमार, सोना यादव, वीरेंद्र कुमार, राजकुमार और कमल गुप्ता की आंखें भर आईं।
आपबीती बताते हुए सभी ने बताया कि कुछ सपने लेकर 18 मार्च को दिल्ली गए थे। साथी की मदद से पीतमपुरा के पास एक खोली ली, जिसमें प्रति व्यक्ति एक हजार किराया था। खोली में 5 लोग रहते थे। तीन दिन मजदूरी की और 22 को लॉकडाउन हो गया।
21 दिन किसी तरह कट गए। जब लॉकडाउन बढ़ने लगा तो धैर्य जवाब देने लगा। 24 घंटे में एक बार खाना मिलता था। वह भी इतना कम कि पेट भी नहीं भरता था। ऊपर से मकान मालिक किराए को लेकर दबाव बना रहा था। परेशान होकर पांच मई को पैसे जुटाकर पुरानी साइकिलें खरीदीं।
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इसके बाद एक साइकिल पर दो लोग सवार हुए और सामान लाद के बिहार के लिए निकल पड़े। शनिवार शाम पांच बजे लखनऊ के उतरेठिया तिराहे पर पहुंचे। राजेश ने बताया कि सोचा था कि अपनी टूटी झोपड़ी की मरम्मत करा दूंगा। बूढ़े मां बाप को कुछ नए कपड़े बनवा दूंगा, लेकिन सब खत्म हो गया।
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आपबीती बताते हुए सभी ने बताया कि कुछ सपने लेकर 18 मार्च को दिल्ली गए थे। साथी की मदद से पीतमपुरा के पास एक खोली ली, जिसमें प्रति व्यक्ति एक हजार किराया था। खोली में 5 लोग रहते थे। तीन दिन मजदूरी की और 22 को लॉकडाउन हो गया।
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21 दिन किसी तरह कट गए। जब लॉकडाउन बढ़ने लगा तो धैर्य जवाब देने लगा। 24 घंटे में एक बार खाना मिलता था। वह भी इतना कम कि पेट भी नहीं भरता था। ऊपर से मकान मालिक किराए को लेकर दबाव बना रहा था। परेशान होकर पांच मई को पैसे जुटाकर पुरानी साइकिलें खरीदीं।
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इसके बाद एक साइकिल पर दो लोग सवार हुए और सामान लाद के बिहार के लिए निकल पड़े। शनिवार शाम पांच बजे लखनऊ के उतरेठिया तिराहे पर पहुंचे। राजेश ने बताया कि सोचा था कि अपनी टूटी झोपड़ी की मरम्मत करा दूंगा। बूढ़े मां बाप को कुछ नए कपड़े बनवा दूंगा, लेकिन सब खत्म हो गया।
12 से ज्यादा साइकिल से निकले छत्तीसगढ़ के लिए
भुखमरी की कगार पर आने के बाद दर्जनभर से ज्यादा परिवार साइकिल से ही छत्तीसगढ़ के लिए निकल पड़े। महिलाएं छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लिए थीं। साइकिल से तीन बच्चों और पत्नी को लेकर जा रहे राजेश ने अपने आंसू पोंछते हुए बताया कि कहीं से कोई मदद नहीं मिली तो मजबूरी में निकलना पड़ा। सभी परिवार बाराबिरवा के पास झोपड़ी बनाकर रहते थे और मजदूरी करते थे।