{"_id":"5e928b788ebc3e76c83e2c9c","slug":"corona-virus-special-story-female-doctor-and-officer","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"संकट के सिपाही: किसी ने बीमार बच्ची को दूसरों के हवाले किया, कोई दादी को आखिरी बार तक नहीं देख पाया","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
संकट के सिपाही: किसी ने बीमार बच्ची को दूसरों के हवाले किया, कोई दादी को आखिरी बार तक नहीं देख पाया
Sun, 12 Apr 2020 12:59 PM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: शाहरुख खान
Updated Sun, 12 Apr 2020 12:59 PM IST
विज्ञापन
कोरोना वायरस
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कोरोना से जंग लड़ रहे योद्धाओं को थकान बिल्कुल नहीं है। वह परिवार से नहीं मिल पा रहे...बच्चों से बात नहीं हो रही लेकिन उनका मनोबल नहीं डिगा है। वह लगातार कोशिश में हैं कि किसी भी संक्रमित या क्वारंटीन में समय बिता रहे लोगों को कुछ न हो। इनमें डॉक्टर तो हैं ही ऐसे भी अधिकारी हैं जो दिन रात अपने परिवार से दूर रहते हुए जनता की सेवा में लगे हुए हैं। किसी ने अपनी बच्ची की देखरेख परिवार वालों को सौंप दी है तो कोई अपनी दादी के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंच सका।
कोरोना वायरस
- फोटो : अमर उजाला
बस एक नजर मां-पापा को बाहर से देख कर चली आती हूं
एक सख्त अधिकारी और एक नरम दिल इंसान। ये वो कोरोना फाइटर हैं जो इस वक्त घर और बाहर दोनों मोर्चों पर एक साथ-साथ डटी हुई हैं। इन्हें कभी कम्युनिटी किचेन की निगरानी तो कभी कहीं किसी इलाके का दौरा करते देखा जा सकता है। खास बात है कि लाकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के दौर में लगातार सक्रिय हैं। वह भी इस एक रिस्क फैक्टर के साथ कि एक तरफ घर में दो छोटे-छोटे बच्चे हैं, तो दूसरी ओर बुजुर्ग माता-पिता, जिनकी जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है। पति बाहर कार्यरत होने से सारा दारोमदार उनके ऊपर आ गया है। माता-पिता आलमबाग में रहते हैं और दो छोटे बच्चे गोमतीनगर स्थित घर में रहते हैं। बच्चों को अकेले छोड़ा नहीं जा सकता है। दिन में एक बार पापा-मम्मी को देखने जाती हैं और संक्रमण से उन्हें बचाने को सिर्फ घर से बाहर से ही उनका हालचाल लेकर लौट आती हैं। कहती हैं कि आंखों से देख लेती हूं तो तसल्ली हो जाती है। दूसरी तरफ घर में बच्चे हैं, उनसे मिलने से डर लगता है, कई बार लगता है कि मैं दिनभर इधर-उधर जाती हूं, कई तरह के लोगों से मिलती हूं, ऐसे में बच्चों के साथ रहना...चुनौतीपूर्ण तो है। फिर भी घर जाकर पहले खुद को सैनिटाइज करती हूं। उसके बाद ही बच्चों से मिलती हूं। इसके अलावा खानपान को लेकर पहले से ज्यादा सतर्क हो गई हूं। बच्चों की इम्युनिटी मजबूत रहे, इसलिए दूध-हल्दी, तुलसी जैसी चीजों का सेवन करती हूं और बच्चों को भी कराती हूं। रितु सुहास के मुताबिक हम जरूरमंदों तक पक्का और कच्चा दोनों तरह का खाना पहुंचवा रहे हैं। खाने के पैकेट के साथ साबुन भी होता है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए खाना बंटे यह सुनिश्चित करने के बाद ही भोजन वितरण होता है।
रितु सुहास, संयुक्त निदेशक, लखनऊ विकास प्राधिकरण
एक सख्त अधिकारी और एक नरम दिल इंसान। ये वो कोरोना फाइटर हैं जो इस वक्त घर और बाहर दोनों मोर्चों पर एक साथ-साथ डटी हुई हैं। इन्हें कभी कम्युनिटी किचेन की निगरानी तो कभी कहीं किसी इलाके का दौरा करते देखा जा सकता है। खास बात है कि लाकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के दौर में लगातार सक्रिय हैं। वह भी इस एक रिस्क फैक्टर के साथ कि एक तरफ घर में दो छोटे-छोटे बच्चे हैं, तो दूसरी ओर बुजुर्ग माता-पिता, जिनकी जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है। पति बाहर कार्यरत होने से सारा दारोमदार उनके ऊपर आ गया है। माता-पिता आलमबाग में रहते हैं और दो छोटे बच्चे गोमतीनगर स्थित घर में रहते हैं। बच्चों को अकेले छोड़ा नहीं जा सकता है। दिन में एक बार पापा-मम्मी को देखने जाती हैं और संक्रमण से उन्हें बचाने को सिर्फ घर से बाहर से ही उनका हालचाल लेकर लौट आती हैं। कहती हैं कि आंखों से देख लेती हूं तो तसल्ली हो जाती है। दूसरी तरफ घर में बच्चे हैं, उनसे मिलने से डर लगता है, कई बार लगता है कि मैं दिनभर इधर-उधर जाती हूं, कई तरह के लोगों से मिलती हूं, ऐसे में बच्चों के साथ रहना...चुनौतीपूर्ण तो है। फिर भी घर जाकर पहले खुद को सैनिटाइज करती हूं। उसके बाद ही बच्चों से मिलती हूं। इसके अलावा खानपान को लेकर पहले से ज्यादा सतर्क हो गई हूं। बच्चों की इम्युनिटी मजबूत रहे, इसलिए दूध-हल्दी, तुलसी जैसी चीजों का सेवन करती हूं और बच्चों को भी कराती हूं। रितु सुहास के मुताबिक हम जरूरमंदों तक पक्का और कच्चा दोनों तरह का खाना पहुंचवा रहे हैं। खाने के पैकेट के साथ साबुन भी होता है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए खाना बंटे यह सुनिश्चित करने के बाद ही भोजन वितरण होता है।
रितु सुहास, संयुक्त निदेशक, लखनऊ विकास प्राधिकरण
कोरोना वायरस
- फोटो : अमर उजाला
दिल में ही रह गई दादी को आखिरी बार देखने की हसरत
नर्स मोहिनी पाठक, एक साल पहले नर्स बनीं मोहिनी की शादी तब हुई जब कोरोना भारत में अपने पांव पसारना शुरू कर रहा था। शादी के 15 दिनों बाद उन्होंने कानपुर स्थित ससुराल से 40 किलोमीटर दूर अस्पताल में दोबारा ड्यूटी ज्वॉइन की। रोज अप-डाउन कर रहीं थीं कि 22 मार्च से उनकी ड्यूटी जिला अस्पताल में बने आइसोलेशन वार्ड में लगा दी गई। दो दिन बाद 24 मार्च को कानपुर में दादी की मौत की खबर घरवालों ने उन्हें दी। वह आंसू बहाने के सिवा कुछ न कर सकीं। दादी को आखिरी बार देखने की हसरत दिल में ही रह गई। वह कहती हैं, घरवाले जब भी बात करते हैं तो सावधानी रखने की सीख देते हैं, लेकिन मरीज की सेवा सबसे पहले है।
मोहिनी पाठक, नर्स, जिला अस्पताल, कानपुर देहात
नर्स मोहिनी पाठक, एक साल पहले नर्स बनीं मोहिनी की शादी तब हुई जब कोरोना भारत में अपने पांव पसारना शुरू कर रहा था। शादी के 15 दिनों बाद उन्होंने कानपुर स्थित ससुराल से 40 किलोमीटर दूर अस्पताल में दोबारा ड्यूटी ज्वॉइन की। रोज अप-डाउन कर रहीं थीं कि 22 मार्च से उनकी ड्यूटी जिला अस्पताल में बने आइसोलेशन वार्ड में लगा दी गई। दो दिन बाद 24 मार्च को कानपुर में दादी की मौत की खबर घरवालों ने उन्हें दी। वह आंसू बहाने के सिवा कुछ न कर सकीं। दादी को आखिरी बार देखने की हसरत दिल में ही रह गई। वह कहती हैं, घरवाले जब भी बात करते हैं तो सावधानी रखने की सीख देते हैं, लेकिन मरीज की सेवा सबसे पहले है।
मोहिनी पाठक, नर्स, जिला अस्पताल, कानपुर देहात
विज्ञापन
विज्ञापन
लॉकडाउन
- फोटो : amar ujala
कोरोना में ड्यूटी जॉइन करने के लिए चलाई 870 किमी कार
यह कहानी है मिर्जापुर पचपेड़वा, पोस्ट गोरखनाथ जिला गोरखपुर की बेटी डॉ. श्रेया श्रीवास्तव की। उनकी नियुक्ति 26 मार्च को फिजीशियन के तौर पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र छपरौली पर हुई। नियुक्ति के एक सप्ताह के भीतर चिकित्सक को ज्वॉइन करना होता है। वह बताती हैं कि सुबह साढ़े तीन बजे वह घर की गाड़ी लेकर अपने चाचा के साथ छपरौली सीएचसी पर ज्वॉइन करने के लिए निकल पड़ीं। सफर के दौरान लॉकडाउन के चलते न तो कोई ढाबा व दुकान खुली मिली और न ही कोई खाने की चीज। 870 किमी का यह सफर जिंदगी भर याद रहेगा।
डॉ. श्रेया श्रीवास्तव, चिकित्सक, सीएचसी, छपरौली बड़ौत
यह कहानी है मिर्जापुर पचपेड़वा, पोस्ट गोरखनाथ जिला गोरखपुर की बेटी डॉ. श्रेया श्रीवास्तव की। उनकी नियुक्ति 26 मार्च को फिजीशियन के तौर पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र छपरौली पर हुई। नियुक्ति के एक सप्ताह के भीतर चिकित्सक को ज्वॉइन करना होता है। वह बताती हैं कि सुबह साढ़े तीन बजे वह घर की गाड़ी लेकर अपने चाचा के साथ छपरौली सीएचसी पर ज्वॉइन करने के लिए निकल पड़ीं। सफर के दौरान लॉकडाउन के चलते न तो कोई ढाबा व दुकान खुली मिली और न ही कोई खाने की चीज। 870 किमी का यह सफर जिंदगी भर याद रहेगा।
डॉ. श्रेया श्रीवास्तव, चिकित्सक, सीएचसी, छपरौली बड़ौत
विज्ञापन
कोरोना वायरस
- फोटो : अमर उजाला
तीन माह की बेटी को छोड़ कर अपना फर्ज निभा रहीं
डॉ. रेशू राजपूत अपनी तीन माह की बेटी को छोड़कर अपनी ड्यूटी कर रही हैं। जब वह ड्यूटी पर होती हैं तो परिवार के लोग बच्ची का ध्यान रखते हैं। डॉ. रेशू ने कहा कि वो देश और देश के नागरिकों के लिए एक भी कदम पीछे नहीं हटाएंगी। शाम को जब घर लौटती हैं तो बेहद सतर्कता बरतती हैं। उन्हें अस्पताल और क्षेत्र में रहकर काम करना पड़ता है। ऐसे में संक्रमण का खतरा होता है। खुद को और परिवार को उससे बचाना चुनौती भरा होता है। वायरस से बचने के लिए लोगों को अपने घरों में ही रहना चाहिए।
डॉ. रेशू, सीएचसी भोपा, मुजफ्फरनगर
डॉ. रेशू राजपूत अपनी तीन माह की बेटी को छोड़कर अपनी ड्यूटी कर रही हैं। जब वह ड्यूटी पर होती हैं तो परिवार के लोग बच्ची का ध्यान रखते हैं। डॉ. रेशू ने कहा कि वो देश और देश के नागरिकों के लिए एक भी कदम पीछे नहीं हटाएंगी। शाम को जब घर लौटती हैं तो बेहद सतर्कता बरतती हैं। उन्हें अस्पताल और क्षेत्र में रहकर काम करना पड़ता है। ऐसे में संक्रमण का खतरा होता है। खुद को और परिवार को उससे बचाना चुनौती भरा होता है। वायरस से बचने के लिए लोगों को अपने घरों में ही रहना चाहिए।
डॉ. रेशू, सीएचसी भोपा, मुजफ्फरनगर