मिशन यूपी पर मायावती की रणनीति पर 'उलझे' बसपाई
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सूबे में विधानसभा चुनाव के जब दो साल से भी कम समय बचे हैं, बसपा कार्यकर्ता चाहते हैं कि पार्टी सुप्रीमो मायावती अब लखनऊ और दिल्ली में बैठकें कर सिर्फ रणनीति बनाने तक सीमित रहने के बजाय कार्यकर्ताओं और जनता के बीच निकलें।
पर, कार्यकर्ताओं की मानें तो पार्टी के कुछ बड़े नेता ही नहीं चाहते कि मायावती अपनों के बीच पहुंचें। ऐसे लोगों को अपनी सियासत सिमटने का खतरा सता रहा है।
बसपा सुप्रीमो मायावती मिशन 2017 की रणनीति बनाने में व्यस्त हैं। उन्होंने गुरुवार को पार्टी पदाधिकारियों और को-ऑर्डिनेटरों की बैठक बुलाई थी। मोटे तौर पर यह बैठक 14 अप्रैल को डॉ. अंबेडकर की जयंती मनाने और संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने को लेकर निचले स्तर पर सांगठनिक ढांचे में बदलाव पर केंद्रित रही।
पर, बैठक में शामिल पार्टी के कुछेक नेताओं, को-ऑर्डिटनरों और कार्यकर्ताओं से बातचीत का लब्बोलुआब ये है कि संगठन 2017 की जमीनी तैयारी को लेकर खासा द्वंद्व में है।
एक को-ऑर्डिनेटर कहते हैं, सूबे और केंद्र की सरकार के खिलाफ जिस तरह इधर माहौल बना है, उम्मीद थी कि इसी बैठक में किसी आंदोलन का ऐलान हो जाएगा, पर अब 10-12 दिन और इंतजार करना होगा।
अपने ही मिशन में जुटे हुए हैं बसपाई
एक अन्य को-ऑर्डिनेटर कहते हैं कि हमें उम्मीद थी कि बसपा मुखिया बैठक में किसी आंदोलन का कार्यक्रम तय कर खुद अगुवाई का ऐलान करेंगी जिससे निराश बैठे कार्यकर्ताओं में जोश भरे। लेकिन लगता है कि कुछ बड़े सिपहसालार अब भी अपने ‘मिशन’ में लगे हुए हैं।
वे चाहते हैं कि मायावती घर में बैठकें करती रहें और वे लोग फील्ड में अपने मन की करते रहें। अब देखना यही है कि क्या मायावती पार्टी के कुछेक बड़े नेताओं के विचार वाली रणनीति को ही आगे बढ़ाएंगी या खुद आगे आएंगी।
कार्यकर्ताओं को तगड़ी चुनौती की चिंता
बसपा के सामने सबसे बड़ी मुश्किल है कि वह सत्ता के खिलाफ सड़क पर भाजपा और कांग्रेस से भी पिछड़ी नजर आती है। सूबे में ओले और बारिश से हुए फसलों के नुकसान पर किसानों से हमदर्दी जताने भाजपा के केंद्रीय मंत्री जिलों में पहुंचे तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी अपने चुनाव क्षेत्र रायबरेली और बेटे की सीट अमेठी तक हो आईं।
पर, बसपा मुखिया सूबे में नजर ही नहीं आईं। इसी तरह पिछले महीने रायबरेली के बछरावां में रेल हादसा हुआ। केंद्रीय गृहमंत्री और रेल राज्य मंत्री से लेकर सोनिया गांधी तक घायलों का हालचाल लेने पहुंचीं, पर मायावती नहीं दिखीं।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि कार्यकर्ताओं की चिंता यही है। बसपा मुखिया यदि एक बार लोगों के बीच उतर जाएं तो 2017 के पहले ही बसपा मुख्य लड़ाई में नजर आने लगेगी। वरना, चुनौती चिंताजनक है। पिछले कई चुनावों से लागातार मिल रही हार से कार्यकर्ता हताश हैं।
हालात बसपा के बेहद अनुकूल
बसपा के एक पुराने कार्यकर्ता कहते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, दैवी आपदा से प्रदेश के किसानों की बर्बादी और तमाम दावों के बीच राहत के नाम पर खानापूरी के हालात बसपा के लिए बेहद अनुकूल हैं।
सपा सरकार में कानून-व्यवस्था की बदहाली भी बसपा के पक्ष में ही जाएगी। ऐसे में मायावती को फसलों की बर्बादी से जान गंवाने वाले हर किसान के घर खुद पहुंचने की पहल करनी चाहिए।
इससे घर बैठा बसपा कार्यकर्ता भी उठ खड़ा होगा। वहीं सरकार को राहत देने के लिए कदम उठाने पड़ेंगे जिसका अच्छा संदेश जाएगा। बसपा कार्यकर्ताओं की दूसरी सबसे बड़ी शिकायत यही है कि वे मायावती तक पहुंच नहीं सकते।
उनका कहना है, मंडलीय व जिला स्तरीय सम्मेलनों के जरिये मायावती को स्वयं काडर के बीच पहुंचना चाहिए। स्थानीय मीडिया से भी मिलकर स्थानीय मुद्दों की बातें करनी चाहिए।
कांशीराम के बाद पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपने काडर से लगातार दूर है जिसका फायदा भाजपा तेजी से उठा रही है। उसके कई प्रभावशाली संगठन और नेता, बसपा कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ने में लगे हुए हैं। इस पर तत्काल ब्रेक लग जाएगा।
शुरू हो जाएगा बसपा कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न
पार्टी के एक राष्ट्रीय महासचिव कहते हैं कि जनता की मुश्किलों को लेकर सड़क पर उतरने का मतलब है सरकार से लड़ना। इससे बसपा कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न शुरू हो जाएगा। पार्टी कार्यकर्ताओं को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाने के लिए जनसमस्याओं पर धरना और प्रशासन के जरिये ज्ञापन तक सीमित रखना चाहिए।
हां, पीड़ित लोगों के बीच व्यक्तिगत पहुंचकर उनके दुख-तकलीफ में भागीदार जरूर बनना चाहिए। हो सके तो पार्टी की ओर से मदद भी करनी चाहिए। जैसा कि बसपा मुखिया ने बदायूं के मामले में किया था।
जिस तरह बसपा सरकार के खिलाफ सपा सड़क पर उतरी थी, उस तरह के आंदोलन का तरीका ठीक नहीं होगा। दूसरा, मायावती पार्टी की मुखिया हैं। उन्हें एक राष्ट्रीय नेता की गरिमा बनाए रखनी चाहिए। यदि वे जिले-जिले में बैठक और आंदोलन के लिए निकलने लगीं तो इससे पार्टी की हताशा का संकेत जाएगा।
15 की बैठक पर टिकी नजर
इस बीच मायावती केंद्र व प्रदेश सरकार के खिलाफ बड़े आंदोलन की रूपरेखा तैयार करने में जुटी हैं। संभावना है कि कुछ दिन तक वह प्रदेश में रुककर 2017 के चुनाव की रणनीति को अंतिम रूप देंगी। पार्टी के एक जिम्मेदार नेता कहते हैं कि 15 अप्रैल को होने वाली बैठक में आंदोलन की पूरी रूपरेखा कार्यकर्ताओं और आम लोगों के बीच आ जाएगी।