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उत्तर प्रदेश में 'बिग बॉस' से खौफ खाती है CBI

Mon, 11 Aug 2014 01:26 AM IST
विष्णु मोहन/अमर उजाला, लखनऊ
विष्णु मोहन/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 11 Aug 2014 01:26 AM IST
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CBI role in investigation in Uttar Pradesh

गुनहगार अगर बड़ा राजनेता या वरिष्ठ अधिकारी हुआ तो सीबीआई उस पर हाथ डालने से कतराती है। इसके एक नहीं कई उदाहरण हैं। इसके लिए सीबीआई को कई बार अदालत की नाराजगी भी झेलनी पड़ी।

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हाल ही में मनरेगा घोटाले की जांच को लेकर सीबीआई ने जो मुकदमे दर्ज किए, उनमें आईएएस अधिकारियों के नाम न होना कई सवाल खड़े करता है।

जांच एजेंसी ने अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के नामों का तो उल्लेख किया लेकिन बड़ों के नाम के बजाय ‘अज्ञात सरकारी अधिकारी-कर्मचारी’ लिख कर अपने बचाव का रास्ता तलाश लिया।
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सामने आई सीबीआई की गड़बड़ी

CBI role in investigation in Uttar Pradesh

मनरेगा घोटाले में तीन मुकदमे दर्ज करने के साथ ही सीबीआई ने 17 जगहों पर दबिश दी। सीबीआई ने लखनऊ से मैनपुरी के पूर्व डीएम सच्चिदानंद दुबे को भी गिरफ्तार कर कई लाख नकद बरामद किए। लेकिन यह गिरफ्तारी मनरेगा अनियमितता में नहीं हुई।

दुबे को मिड-डे मील योजना में हुई अनियमितता के मामले में ही सीबीआई कोर्ट से अरेस्ट वारंट जारी था। इसी आधार पर उनकी गिरफ्तारी हुई। हालांकि सीबीआई ने दुबे की इस गिरफ्तारी को मनरेगा की कार्रवाई में भुनाने की कोशिश की।

वर्ष 2007 से 2010 के दौरान मनरेगा के तहत हुई अनियमितता की जो प्रारंभिक जांचें हुईं वह मनरेगा योजना के राज्य मॉनिटर विनोद शंकर चौबे ने की थी और उन्होंने कई जिलों में अनियमितता की बात कही थी।

घपले में किसी डीएम का नाम नहीं

CBI role in investigation in Uttar Pradesh

मनरेगा घपले का दायरा 17 जिलों से अधिक फैले होने की बात सामने आई थी। बाद में मामला उच्च अदालत पहुंचा जहां से इसकी जांच सीबीआई से कराए जाने के निर्देश दिए गए।

अदालत ने सीबीआई को शुरुआत में सात जिलों गोंडा, बलरामपुर, महोबा, सोनभद्र, मिर्जापुर, कुशीनगर व संत कबीरनगर में जांच के लिए कहा और यह भी सलाह दी कि अगर अन्य जिलों में भी अनियमितता सामने आती है तो जांच का दायरा बढ़ाया जाए।

हैरत की बात है कि इस प्रकरण की सीबीआई की जांच में कुछ सीडीओ, परियोजना निदेशक व अन्य अधिकारी-कर्मचारी दोषी पाए जा रहे हैं। लेकिन किसी भी जिले के डीएम की भूमिका इसमें तय नहीं की गई। जबकि प्रारंभिक जांच होने के समय कम से कम 25 आईएएस अधिकारियों की इस अनियमितता में संलिप्तता की बात सामने आई थी।

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इन मामलों में सीबीआई ने की बड़ों को बचाने की कोशिश

CBI role in investigation in Uttar Pradesh

केस 1- एनआरएचएम घोटाले में परिवार कल्याण विभाग के दो सीएमओ डॉ. विनोद आर्य व डॉ. बीपी सिंह के मर्डर केस में सीबीआई की जांच सिर्फ छोटों तक सीमित रही।

केस 2- लखनऊ जिला कारागार में डिप्टी सीएमओ डॉ. वाईएस सचान की हत्या के मामले में भी सीबीआई ने बड़ों को बचाने के लिए क्लोजर रिपोर्ट लगाने की सिफारिश तक कर दी थी।

केस 3- एनआरएचएम घोटाले की साजिश में गहरे तक पैठे आरोपी पूर्व सीएमओ डॉ. एके शुक्ला के पक्ष में सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट लगा दी। सीबीआई ने यह कदम तब उठाया जबकि दोनों सीएमओ की हत्या के मामले में सीबीआई ने उसी अदालत से डॉ. शुक्ला को रिमांड पर मांगा था, ताकि उनकी निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त असलहा बरामद किया जा सके।

रसूखदारों को बचाने में परिवार को बनाया दोषी

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केस 4- नोएडा के चर्चित आरुषि-हेमराज हत्याकांड में सीबीआई ने जो तफ्तीश की, उसे लेकर उसकी काफी थू-थू हुई थी। सीबीआई ने बड़ों को बचाने के लिए उनके परिवारों के नौकरों को दोषी बना दिया था।

केस 5- कुंडा में सीओ जियाउल हक की हत्या के मामले में भी सीबीआई ने पर्दे के पीछे छिपे सफेदपोशों की भूमिका का कोई जिक्र नहीं किया।

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