'सोशल इंजीनियरिंग' से मिलेगी यूपी में जीत, जुटीं सपा व भाजपा
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विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही सियासी दलों में वोट का गणित दुरुस्त करने की बेचैनी सतह पर है। खास तौर से सपा और भाजपा काफी सक्रिय हैं।
अहिल्याबाई होल्कर की जयंती पर 31 मई को मैनपुरी में पाल, धनगर, बघेल और गड़रिया जैसी उपजातियों का सम्मेलन बुलाया गया है, जिसमें लोक निर्माण मंत्री शिवपाल यादव व माध्यमिक शिक्षा राज्य मंत्री विजय बहादुर पाल सहित सपा के कई नेता हिस्सा लेंगे।
उधर, भाजपा ने 4 जून को लखनऊ में दलित जातियों के जमावड़े के साथ जातीय जुगलबंदी पर आगे बढ़ाने की योजना बनाई है।
वैसे तो मैनपुरी के सम्मेलन को लेकर सपा ने खुद को पर्दे के पीछे रखा है, पर अंदरखाने सपा के लोग ही सक्रिय हैं। सम्मेलन में सपा सरकार के दौरान धनगर व पाल समाज के लिए किए गए कामों का उल्लेख होगा।
अमित शाह बताएंगे दलितों के लिए क्या किया
बताया जाएगा कि धनगर को अनुसूचित जाति का अधिकार देने के आदेश जारी किया गया। अहिल्याबाई के नाम पर पांच-पांच लाख रुपये के दो पुरस्कार शुरू किए गए। मनु पाल को यशभारती पुरस्कार देकर बिरादरी का गौरव बढ़ाया गया।
भाजपा अनुसूचित मोर्चा के जरिये राजधानी में 4 जून को दलितों का बड़ा जमावड़ा किया जा रहा है। इसमें पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह लोगों को केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद दलित वर्गों के लिए उठाए गए कदमों जैसे डॉ. अंबेडकर से जुड़े स्थलों का विकास, स्टैंड अप इंडिया से दलितों को बड़ा उद्यमी बनाने के संकल्प के बारे में बताया जाएगा।
उन्हें बताएंगे कि भाजपा ऐसी पहली पार्टी है जिसने न सिर्फ सरकार, बल्कि संगठन में भी हिस्सेदारी देने के लिए पदों का कोटा तय किया है। इसके अलावा केंद्र सरकार ने भी इस समाज के लिए कई योजनाएं बनाई हैं।
सपा पर से सिर्फ यादवों की पार्टी का टैग हटाने की कोशिश
दोनों ही सम्मेलनों के राजनीतिक निहितार्थ हैं। सपा पाल, गड़रिया व बघेल समाज के बीच काम बताकर जहां यह संदेश देना चाहती है कि वह सिर्फ यादवों की पार्टी नहीं है। फर्रुखाबाद के आसपास सम्मेलन करने के पीछे भी सपा का अपना गणित है।
दरअसल, मैनपुरी से आगरा व कन्नौज तक पाल, धनगर, गड़रिया बिरादरी काफी अच्छी संख्या में हैं। इसी इलाके से मुलायम सिंह यादव परिवार के कई सदस्य चुनाव लड़ते हैं। सपा को यहां से अच्छी बढ़त मिलती रही है। प्रदेश के ज्यादातर विधानसभा क्षेत्रों में भी इनकी आबादी लगभग 10 से 30 हजार है।
भाजपा की तरफ से अति पिछड़ों के बीच पकड़ व पैठ बनाने की कोशिशें जिस तरह शुरू हुई हैं, यह सम्मेलन उसे रोकने के सिलसिले में है।
सपा की रणनीति पिछड़ों में लगभग 10 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले यादव और 18 प्रतिशत मुसलमानों के साथ अति पिछड़ी जातियों से 10-15 प्रतिशत वोट हासिल करने की है ताकि 2017 में दोबारा सत्ता में आने का रास्ता आसान हो सके।
ये है भाजपा की योजना
उत्तर प्रदेश में भी जब भाजपा की सरकार थी तो उसने सामाजिक न्याय समिति की सिफारिशों के आधार पर सभी जातियों के आरक्षण का कोटा तय करने का फॉर्मूला बनाया था जिससे आरक्षण का लाभ सिर्फ एक ही बिरादरी तक सिमटकर न रह जाए।
भाजपा का गणित लगभग 20 प्रतिशत अगड़ों, पिछड़ों में 90 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली लोध, मुराऊ, कुशवाहा, काछी, तेली जैसी अति पिछड़ी जातियों में हिस्सेदारी बढ़ाने के साथ अनुसूचित जातियों की आबादी में गैर जाटव पासी, धोबी, कोरी, वाल्मीकि, कठेरिया और लोनिया जैसी 45 प्रतिशत हिस्सेदारी को लामबंद करके सत्ता पाने का रास्ता आसान बनाने की है।