{"_id":"5ed7f0938ebc3e90354c7923","slug":"cancer-patients-are-also-beating-corona-virus-six-patients-admitted-in-kgmu-and-pgi-are-fine","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"कैंसर के मरीज भी दे रहे कोरोना को मात, केजीएमयू व पीजीआई में भर्ती छह मरीज हो चुके ठीक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कैंसर के मरीज भी दे रहे कोरोना को मात, केजीएमयू व पीजीआई में भर्ती छह मरीज हो चुके ठीक
Thu, 04 Jun 2020 12:18 AM IST
अवधेश कुमार
माई सिटी रिपोर्टर, लखनऊ
माई सिटी रिपोर्टर, लखनऊ
Published by: अवधेश कुमार
Updated Thu, 04 Jun 2020 12:18 AM IST
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : पीटीआई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दुनिया भर में कोरोना के मामले में सबसे हाई रिस्क की श्रेणी में रखे गए कैंसर के मरीज भी लखनऊ में इस महामारी को मात देने में कामयाब हो रहे हैं। यह इलाज की कामयाब तकनीक की वजह से है या मरीजों के बढ़े आत्मविश्वास की वजह से, लेकिन यह सुखद परिणाम है कि कोरोना वायरस इन मरीजों के आगे नतमस्तक हो चुका है।
अमेरिकन सोसायटी ऑफ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी के सर्वे में बताया गया है कि कोरोना पीड़ित 13 फीसदी कैंसर मरीजों को जान गंवानी पड़ी है। इसी तरह इंग्लैंड में हुए अध्ययन में कहा गया कि 800 मरीजों में करीब 28 फीसदी की मौत हो गई। वहीं राजधानी लखनऊ के आकड़े कुछ अलग कहानी बता रहे हैं। एसजीपीजीआई में भर्ती रायबरेली के एक कैंसर मरीज की मौत हुई थी जो करीब 65 वर्ष का था, लेकिन उसे कैंसर के साथ ही किडनी सहित अन्य बीमारियां थीं। ऐसे में चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि उसकी मौत कोरोना के बजाय किडनी फैलियर से हुई।
यहां भर्ती होने वाले दो अन्य मरीज आठ दिन के अंदर नेगेटिव हो गए थे। अब इनकी रेडियो थेरेपी चल रही है। इसी तरह केजीएमयू में अब तक कैंसर पीड़ित चार मरीजों को कोरोना ने अपनी चपेट में लिया था। इस में से दो की रिपोर्ट आठ दिन में नेगेटिव आ गई थी, जबकि दो को नेगेटिव होने में 12 दिन लगे। अब इन चारों मरीजों की रेडियोथेरेपी और कैंसर का इलाज पहले की तरह चल रहा है। यहां ठीक होने वालों में एक तीन साल का बच्चा भी शामिल है।
विज्ञापन
विज्ञापन
अमेरिकन सोसायटी ऑफ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी के सर्वे में बताया गया है कि कोरोना पीड़ित 13 फीसदी कैंसर मरीजों को जान गंवानी पड़ी है। इसी तरह इंग्लैंड में हुए अध्ययन में कहा गया कि 800 मरीजों में करीब 28 फीसदी की मौत हो गई। वहीं राजधानी लखनऊ के आकड़े कुछ अलग कहानी बता रहे हैं। एसजीपीजीआई में भर्ती रायबरेली के एक कैंसर मरीज की मौत हुई थी जो करीब 65 वर्ष का था, लेकिन उसे कैंसर के साथ ही किडनी सहित अन्य बीमारियां थीं। ऐसे में चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि उसकी मौत कोरोना के बजाय किडनी फैलियर से हुई।
विज्ञापन
यहां भर्ती होने वाले दो अन्य मरीज आठ दिन के अंदर नेगेटिव हो गए थे। अब इनकी रेडियो थेरेपी चल रही है। इसी तरह केजीएमयू में अब तक कैंसर पीड़ित चार मरीजों को कोरोना ने अपनी चपेट में लिया था। इस में से दो की रिपोर्ट आठ दिन में नेगेटिव आ गई थी, जबकि दो को नेगेटिव होने में 12 दिन लगे। अब इन चारों मरीजों की रेडियोथेरेपी और कैंसर का इलाज पहले की तरह चल रहा है। यहां ठीक होने वालों में एक तीन साल का बच्चा भी शामिल है।
विज्ञापन
दवाएं भी अन्य मरीजों जैसी
अमेरिका की एक शोध रिपोर्ट में कहा गया कि कैंसर के मरीजों में हाइड्रो क्लोरोक्वीन और एजिथ्रोमाइसिन काम नहीं करती है। कैंसर के मरीजों को ये दवाएं देने से लंग प्रभावित होने और ब्लड क्लॉट्स की समस्या सामने आई है। यह भी कहा गया कि लंग से जुड़ी छोटी नसें और कनेक्टिव नसों में क्लॉटिंग पाई गई है जो मौत की वजह बनी है। लेकिन केजीएमयू में इन दवाओं का प्रयोग करने से मरीजों पर कोई साइड इफेक्ट नजर नहीं आया। संक्रामक रोग नियंत्रण यूनिट के प्रभारी डॉ. डी हिमांशु का कहना है कि मरीज की स्थिति के अनुसार दवा की डोज दी गई और मरीजों की ईसीजी रिपोर्ट पर ध्यान रखा गया। ऐसे में इन दवाओं का कोई साइड इफेक्ट फिलहाल नजर नहीं आया है।
कैसे मिली कामयाबी
संक्रामक रोग यूनिट के प्रभारी डॉ. डी हिमांशु का कहना है कि कैंसर के मरीजों के इलाज के दौरान कई तरह की सावधानी बरती गई। रेडियो थेरेपी होने की वजह से इनका इम्यून सिस्टम कमजोर रहता है। ऐसे में कैंसर की दवाओं के साथ इम्यून बूस्टर दिया गया। कोराना की दवाओं का कंबीनेशन तैयार किया गया। लो डोज से शुरुआत की गई। इस दौरान मरीजों में संक्रमण का स्तर भी नियमित तौर पर जांचा गया।
अमेरिका की एक शोध रिपोर्ट में कहा गया कि कैंसर के मरीजों में हाइड्रो क्लोरोक्वीन और एजिथ्रोमाइसिन काम नहीं करती है। कैंसर के मरीजों को ये दवाएं देने से लंग प्रभावित होने और ब्लड क्लॉट्स की समस्या सामने आई है। यह भी कहा गया कि लंग से जुड़ी छोटी नसें और कनेक्टिव नसों में क्लॉटिंग पाई गई है जो मौत की वजह बनी है। लेकिन केजीएमयू में इन दवाओं का प्रयोग करने से मरीजों पर कोई साइड इफेक्ट नजर नहीं आया। संक्रामक रोग नियंत्रण यूनिट के प्रभारी डॉ. डी हिमांशु का कहना है कि मरीज की स्थिति के अनुसार दवा की डोज दी गई और मरीजों की ईसीजी रिपोर्ट पर ध्यान रखा गया। ऐसे में इन दवाओं का कोई साइड इफेक्ट फिलहाल नजर नहीं आया है।
कैसे मिली कामयाबी
संक्रामक रोग यूनिट के प्रभारी डॉ. डी हिमांशु का कहना है कि कैंसर के मरीजों के इलाज के दौरान कई तरह की सावधानी बरती गई। रेडियो थेरेपी होने की वजह से इनका इम्यून सिस्टम कमजोर रहता है। ऐसे में कैंसर की दवाओं के साथ इम्यून बूस्टर दिया गया। कोराना की दवाओं का कंबीनेशन तैयार किया गया। लो डोज से शुरुआत की गई। इस दौरान मरीजों में संक्रमण का स्तर भी नियमित तौर पर जांचा गया।
टीमवर्क से मिली कामयाबी
डॉ. डी हिमांशु ने बताया कि कैंसर मरीजों के इलाज के दौरान दूसरे विभागों की टीम को भी शामिल किया गया। मेडिसिन विभाग के साथ ही ऑन्कोलॉजी, रेडियोथेरेपी, कार्डियोलॉजी, पैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी सहित कई विभागों की टीम ने विचार विमर्श किया। फिर मरीजों की स्थिति के अनुसार उनकी डोज निर्धारित की गई। इसका नतीजा सकारात्मक निकला।
क्यों कमजोर हो जाती है इम्यूनिटी
रेडियोथेरेपी विभाग के डॉ. सुधीर सिंह बताते हैं कि कैंसर के मरीजों की इम्यूनिटी कमजोर होने की कई वजहें होती हैं। कैंसर शरीर की अनियंत्रित कोशिकाओं से फैलता है। ऐसे में शरीर के अंदर प्रतिरोधकता कम हो जाती है। कैंसर सेल को नष्ट करने वाली दवा भी रोग प्रतिरोधक क्षमता घटा देती है।
मरीजों का आत्मविश्वास बना रहा
इलाज के दौरान कैंसर के मरीजों में अन्य मरीजों की अपेक्षा घबराहट ज्यादा पाई गई। ऐसे में इलाज के साथ ही उनकी नियमित तौर पर काउंसलिंग की गई। हृदय की स्थिति, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को हर हाल में नियंत्रित किया गया। मरीजों को भरोसा दिया गया कि उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। ऐसे में उनका आत्मविश्वास बना रहा। यह भी ठीक होने का एक सकारात्मक पहलू है।
डॉ. डी हिमांशु ने बताया कि कैंसर मरीजों के इलाज के दौरान दूसरे विभागों की टीम को भी शामिल किया गया। मेडिसिन विभाग के साथ ही ऑन्कोलॉजी, रेडियोथेरेपी, कार्डियोलॉजी, पैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी सहित कई विभागों की टीम ने विचार विमर्श किया। फिर मरीजों की स्थिति के अनुसार उनकी डोज निर्धारित की गई। इसका नतीजा सकारात्मक निकला।
क्यों कमजोर हो जाती है इम्यूनिटी
रेडियोथेरेपी विभाग के डॉ. सुधीर सिंह बताते हैं कि कैंसर के मरीजों की इम्यूनिटी कमजोर होने की कई वजहें होती हैं। कैंसर शरीर की अनियंत्रित कोशिकाओं से फैलता है। ऐसे में शरीर के अंदर प्रतिरोधकता कम हो जाती है। कैंसर सेल को नष्ट करने वाली दवा भी रोग प्रतिरोधक क्षमता घटा देती है।
मरीजों का आत्मविश्वास बना रहा
इलाज के दौरान कैंसर के मरीजों में अन्य मरीजों की अपेक्षा घबराहट ज्यादा पाई गई। ऐसे में इलाज के साथ ही उनकी नियमित तौर पर काउंसलिंग की गई। हृदय की स्थिति, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को हर हाल में नियंत्रित किया गया। मरीजों को भरोसा दिया गया कि उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। ऐसे में उनका आत्मविश्वास बना रहा। यह भी ठीक होने का एक सकारात्मक पहलू है।