यूपी चुनाव 2022: सीतापुर में दलबदल बापू के लिए लाभदायक है... सपा-भाजपा ने दूसरे दलों से आए नेताओं को दी अहमियत
टिकट बंटवारे में अपनों पर सितम, गैरों पर करम कर रही हैं सियासी पार्टियां। सीतापुर में दलबदल नेताओं के लिए लाभदायक साबित हुआ है। भाजपा-सपा ने बाहरी दलों से आए नेताओं को अहमियत दी है।
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औरों पर करम, बच्चों पर सितम... बापू मेरे ये जुल्म न कर... बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है। फिल्म दंगल में बापू का किरदार निभा रहे अभिनेता आमिर खान पर भले ही यह गीत फिल्माया गया हो लेकिन जिले में इन दिनों सियासी फिजा में दलबदल का खेल कहावत ‘बापू सेहत के लिए लाभदायक’ को सच साबित कर रहा है। जी हां, ऐसा हम नहीं बल्कि हाल ही में पार्टी छोड़कर आए नेताओं पर पार्टियों की ओर से दिखाई गई मेहरबानी इसकी तस्दीक करती है।
टिकट बंटवारे में सियासी पार्टियों ने अपनों पर सितम, गैरों पर करम दिखाया है। भाजपा हो या फिर सपा। दोनों सियासी पार्टियों ने अपनों को नजर अंदाज कर बाहरी दलों से आए नेताओं को जीत का कार्ड खेलने के लिए अहमियत दी है। सबसे पहले बात करते हैं हरगांव विधानसभा क्षेत्र की। यहां से सपा के पूर्व विधायक रहे रमेश राही इस बार पार्टी से टिकट मांग रहे थे। वह अपनी दावेदारी मजबूत होने का दावा भी कर रहे थे। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि पार्टी उन्हें टिकट देगी लेकिन ठीक इसके उलट हुआ। पार्टी ने उन्हें नजर अंदाज करते हुए हाल ही में भाजपा छोड़कर सपा में शामिल हुए बसपा सरकार में तीन बार विधायक रहे रामहेत भारती को टिकट दे दिया।
बिसवां विधानसभा क्षेत्र की सीट पर नजर डालें तो 2017 के चुनाव में भाजपा से महेंद्र यादव विधायक बने थे। इस बार भी शुरुआती दौर में उन्हें ही टिकट मिलने की बात कही जा रही थी लेकिन चुनाव से ऐन वक्त पहले सपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए पूर्व विधायक निर्मल पर भाजपा ने दांव लगा दिया। पार्टी ने शुक्रवार को उन्हें ही टिकट दिया है।
दल-बदल के खेल में नेताओं को फायदा होने की फेहरिस्त यहीं पर नहीं थमती। 2012 में सिधौली विधानसभा सीट से सपा के टिकट से जीते मनीष रावत 2017 में हार गए थे। इस बार भी मनीष सपा से टिकट के लिए मजबूत दावेदारी कर रहे थे लेकिन उनकी दावेदारी पार्टी को रास नहीं आई। कुछ महीने पहले ही बसपा छोड़कर आए विधायक हरगोविंद भार्गव को शुक्रवार को सपा ने सिधौली सीट से उतार दिया है। ऐसे में इन विधानसभा सीटों की चुनावी गणित यह बताती है कि इन नेताओं का दल बदलना उनके लिए हर तरीके से मुनाफे का ही सौदा साबित हुआ है।
अब किधर जाएगा सियासी सफर...
बिसवां विधायक महेंद्र यादव, पूर्व विधायक रमेश राही हों या फिर पूर्व विधायक मनीष रावत, इन तीनों नेताओं का अब सियासी सफर किस डगर की ओर जाता है, इसे लेकर हर किसी की नजरें इनके अगले कदम की ओर लगी हैं। वजह, जिस पार्टी में ये थे, वहां से तो इस बार तीनों नेताओं को मायूसी ही हाथ लगी है। तीनों लोगों ने टिकट मिलने की ढेरों उम्मीदें लगा रखीं थी लेकिन इनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। अब ऐसे में ये पार्टी में ही रहकर निष्ठावान कार्यकर्ता की तरह काम करेंगे या फिर कोई और कदम उठाकर सियासत में गुल खिलाएंगे.... यह अभी कह पाना मुमकिन नहीं है।
दिल के अरमां आंसुओं में बह गए
दिल के अरमां आंसुओं में बह गए, हम वफा करके भी तन्हा रह गए...। यह गीत इन दिनों भाजपा विधायक राकेश राठौर पर पूरी तरह से सटीक बैठ रहा है। 2017 में नगर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकट से जीते राकेश राठौर को पार्टी की व्यवस्था और नीतियां रास नहीं आईं। वह खुलकर मुखालफत करने लगे। पार्टी में कार्यकाल तो बिताया लेकिन पूरी तरह से खुद को किनारे करते हुए।
इसके बाद पिछले महीनों राकेश राठौर और हरगोविंद भार्गव दोनों विधायकों ने सपा का दामन थाम लिया था। हरगोविंद का पाला बदलना तो उनके लिए मुनाफे का सौदा रहा लेकिन घाटा तो विधायक राकेश राठौर का हो गया। भाजपा भी छोड़ दी और सपा ने टिकट भी नहीं दिया। हालांकि, चर्चाएं टिकट को लेकर थीं लेकिन पार्टी ने नगर विधानसभा क्षेत्र से राधेश्याम को मैदान में उतार दिया।