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यूपीः इस बार के चुनाव में 'किनारे लगा दिए गए' ये दिग्गज

Tue, 07 Feb 2017 11:46 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 07 Feb 2017 11:46 AM IST
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Big leaders are ignored in UP election.
अमर सिंह, मुलायम‌ सिंह यादव व विनय कटियार - फोटो : amar ujala

यूपी का चुनावी समर तमाम नए लोगों के लिए सियासत का मंच देने का फिर एक मौका बन रहा है तो कई चिर परिचित, जमे-जमाए चेहरे ओझल होते नजर आ रहे हैं। इनमें कई तो अपनों की बेवफाई से अलग-थलग होकर मैदान से ही बाहर हो गए हैं।

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2012 के विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद सूबे की सियासत में आए बड़े बदलावों की छाप इस चुनाव में नजर आने लगी है।

पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और 2014 के लोकसभा चुनाव तक सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव, तत्कालीन सपा प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री बड़ी भूमिका में हुआ करते थे।
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प्रत्याशी चयन से लेकर पार्टी की रीति-नीति में इनकी राय बड़ी मायने रखती थी। पर, सियासत इस कदर बदली कि आडवाणी, जोशी से लेकर मुलायम-शिवपाल और खत्री जैसे चेहरे मुख्य भूमिका से बाहर हो गए।

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बेनी प्रसाद व अमर सिंह पड़े अलग-थलग

Big leaders are ignored in UP election.
बेनी प्रसाद वर्मा - फोटो : amar ujala

पूर्व केंद्रीय मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा, भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओम प्रकाश सिंह की चुनावों में बड़ी पूछ हुआ करती थी। इस बार इनकी भूमिका का कहीं अता-पता नहीं है।

कई लोगों ने अपनी आगे की सियासत बनाने के चक्कर में दलबदल भी किए लेकिन वह भी काम नहीं आया। बेनी प्रसाद वर्मा, अमर सिंह जैसे नेता अलग-थलग पड़ गए।

पूर्व मंत्री अनंत कुमार मिश्र ‘अंटू’ और राकेशधर त्रिपाठी भ्रष्टाचार के आरोपों में इस कदर उलझे कि खुद को चुनाव मैदान से बाहर ही कर लेना पड़ा।

मुलायम : कभी पार्टी के सर्वेसर्वा हुआ करते थे... अब अलग हुए

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मुलायम ‌सिंह यादव - फोटो : amar ujala

मुलायम सिंह यादव सपा के सर्वेसर्वा हुए करते थे। वे पार्टी में नेता बनाते थे, पदाधिकारी बनाते थे, मुख्यमंत्री बनाते थे। सरकार में न रहकर भी सरकार की दिशा तय करते थे। इस चुनाव में टिकट बंटवारे, पार्टी पर नियंत्रण का ऐसा बखेड़ा हुआ कि मुलायम को पार्टी के मुखिया पद से बेदखल हो जाना पड़ा। उनके चहेते मंत्री सरकार से बाहर हो गए।

हालात ये बने कि अपने कुछ लोगों को ‌टिकट दिलाने के लिए उन्हें अखिलेश से गुहार लगानी पड़ी। मुलायम इतने अलग-थलग कभी नजर नहीं आए। हालांकि, सोमवार को उन्होंने दिल्ली में कहा कि वे मंगलवार से सपा-कांग्रेस गठबंधन के लिए प्रचार करेंगे।

शिवपाल : अपने क्षेत्र तक हो गए सीमित
शिवपाल सिंह यादव कुछ दिन पहले तक सपा की दशा और दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते थे। सबसे प्रभावशाली मंत्री हुआ करते थे। चुनाव में प्रत्याशी बनाने और हटाने का काम करते थे। मगर, प्रत्याशी चयन को लेकर ही रार इतनी बढ़ी कि शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से बेदखल होना पड़ा।

शिवपाल न सिर्फ प्रत्याशी चयन की भूमिका से बाहर हो गए, बल्कि अपने टिकट के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मर्जी पर निर्भर हो गए। पार्टी के राजकाज में उनकी भूमिका खत्म कर दी गई है। वे अपने चुनाव क्षेत्र तक सीमित कर दिए गए।

मुरली मनोहर जोशी: टिकट वितरण में नहीं रही भूमिका

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भाजपा के मार्गदर्शक मंडल में हैं। यूपी से ताल्लुक रखते हैं और कानपुर से निर्वाचित सांसद हैं। संसद की गतिविधियों में पूरी सक्रियता के साथ नजर आते हैं। पर, पार्टी में उनकी भूमिका किस तरह सीमित हो गई है कि पहली बार टिकट वितरण में उनकी कोई भूमिका नजर नहीं आई।

पार्टी के स्टार प्रचारकों की पहली सूची में स्थान भी नहीं बना सके। उनकी उपेक्षा पर सवाल उठे तो दूसरी सूची में स्थान मिला। लेकिन पहले चरण का चुनाव चरम पर पहुंच चुका है, पार्टी के छोटे-बड़े नेता सक्रिय हैं। प्रधानमंत्री तक सभाएं शुरू कर चुके हैं। पर, जोशी कहीं नजर नहीं आ रहे हैं।

विनय कटियार : नहीं रही वह धमक
विनय कटियार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। हिंदूवादी चेहरे के तौर पर पहचान रही है। चुनावों में उनके कार्यक्रम कभी खूब मांगे जाते थे। पर, पिछले कुछ समय से उनकी भूमिका सीमित ही नजर आ रही है। अब वे इस कदर हाशिए पर पहुंच गए हैं कि उनके अपने जिले फैजाबाद के प्रत्याशी चयन में उनकी राय को तवज्जो नहीं मिल सकी।

इसके अलावा भाजपा ने विधानसभा चुनाव के स्टार प्रचारकों की पहली सूची में भी उन्हें स्थान नहीं दिया। दूसरी सूची में उन्हें स्थान तब मिला जब पहली सूची से उनको स्थान न मिलने की चर्चा हुई। कटियार की जगह महंत आदित्यनाथ को हिंदू झंडाबरदार के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है।

बेनी प्रसाद वर्मा : बेटे को चुनाव तक नहीं लड़ा पाए

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बेनी प्रसाद वर्मा व मुलायम सिंह यादव - फोटो : amar ujala

बेनी प्रसाद वर्मा सपा में रहे हों या कांग्रेस में, हमेशा सक्रिय भूमिका में नजर आए। कुर्मी मतदाताओं में पकड़ के चलते मुलायम उन्हें कांग्रेस से सपा में लाए और राज्यसभा सदस्य बनाया।

सपा में पारिवारिक कलह बढ़ी तो वर्मा मुलायम के साथ खड़े हुए। नतीजा ये हुआ कि दूसरों के टिकट में भूमिका निभाने वाले वर्मा सपा से अपने बेटे को टिकट नहीं दिला सके। मजबूरी में भाजपा में जाने की कोशिश की, लेकिन वहां भी बात नहीं बन पाई।

अमर सिंह: ‘बाहरी’ होकर हुए बाहर
अमर सिंह, कभी सपा के रणनीतिकारों में शामिल हुआ करते थे। जैसा चाहते थे, वैसा होता था। लंबे समय बाद सपा में वापसी और राज्यसभा सदस्य व राष्ट्रीय महासचिव बनाए जाने के बाद उनके पुरानी भूमिका वापस आनी नजर आने लगी थी।

इसी बीच सपा में पारिवारिक कलह बढ़ी तो उसके पीछे सिंह की भूमिका को भी बड़ा वजह माना गया। मुलायम के लाख प्रयास के बावजूद अमर सिंह के प्रति अखिलेश नरम नहीं हुए। नतीजा ये हुआ कि कलह के बीच मुलायम को पार्टी के मुखिया पद से हटाने के साथ ही अमर सिंह को पार्टी से बाहर कर दिया गया।

जयाप्रदा : प्रचार में नजर नहीं आएंगी

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अमर-शिवपाल

फिल्म अभिनेत्री व पूर्व सांसद जयाप्रदा कभी सपा की स्टार प्रचारक हुआ करती थीं। सपा में वह आजम खां जैसे नेता की चुनौती का सामने करने के बावजूद सांसद भी बन गईं।

अमर सिंह की सपा में वापसी हुई तो लगा कि वे फिर 2017 के चुनावों में सक्रिय नजर आएंगी। पर, अमर के सपा से निष्कासन के बाद इस चुनाव में जयाप्रदा की भूमिका खत्म मानी जाने लगी है।

निर्मल खत्री: अर्श से फर्श पर
चुनाव के कुछ महीने तक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे। जब राजबब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो खत्री को संतुष्ट करने के लिए प्रत्याशियों के चयन वाली स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरमैन बना दिया गया।

मगर, जब प्रत्याशियों की स्क्रीनिंग का वास्तविक मौका आया तब राजबब्बर को ही यह जिम्मेदारी भी दे दी गई। उन्हें को-चेयरमैन बना दिया गया। चुनाव अभियान में गर्मी आ चुकी है लेकिन यह पता नहीं चल रहा है कि खत्री क्या कर रहे हैं?

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