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जहां के बसंत मेले में नवाब भी शरीक हुआ करते थे
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
Updated Tue, 10 Sep 2013 03:38 PM IST
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बादशाह बाग यानी आज जहां यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स बसंत उत्सव मनाते हैं। कभी इसी जगह अवध के दूसरे नवाब नासिर-उद-दिन हैदर (1827-1837) बसंत मेले का आयोजन करते थे।
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जहां मीना बाजार, सांस्कृतिक गीत, नृत्य से लोगों का मनोरंजन किया जाता था।
रॉयल गार्डेन कुशीदा महल है दूसरा नाम
तीन दिन तक चलने वाले इस मेले का आयोजन रॉयल गार्डेन कुशीदा महल में किया जाता था। इसे बादशाह बाग के नाम से भी जाना जाता था जो एक छोर पर हसनगंज और दूसरे छोर पर इरादत नगर को अपने से जोड़ता है।
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आज के समय में इरादतनगर डालीगंज रेलवे स्टेशन के पीछे स्थित है जबकि हसनगंज चांदगंज के दूसरी तरफ स्थित है।
आज का लखनऊ विश्वविद्यालय बादशाह बाग के बहुत छोटे से हिस्से में बसा है।
ये शिक्षण संस्थान के रूप में तीसरा स्थान है जिसकी शुरूआत एक विद्यालय के रूप में अमीनाबाद पैलेस में एक मई 1864 को हुई जो दो साल बाद कैनिंग कॉलेज के रूप में जाना गया। बाद में इसे कैसरबाग के परिखाना में स्थानांतरित कर दिया गया।
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किस महाराजा ने खरीदा था इसे?
कपूरथला के महाराजा ने बादशाह बाग को अंग्रेजी सरकार से 35000 रुपये में खरीदा था। स्वतंत्रता संग्राम में नरसंहार के बाद करीब 90 एकड़ जमीन कैनिंग कॉलेज को तीन रूपए प्रति वर्ष के दाम पर लीज पर दे दी गई।
बाद में 1922 में यही कॉलेज लखनऊ विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाने लगा। बादशाह बाग की कुछ प्रमख जानकारी फ्रेंच महिला फैनी पाक्र्स के लेखों से मिलती है जो 1831 में गार्डेन के दौरे पर आई थी।
बादशाह बाग को मिनी जू के रूप में भी देखा जाता था जिसमें कुछ विशेष प्रजाति की चिडिय़ा और जंगली जानवरों को संरक्षित कर के रखा गया था।
बादशाह बाग ने 1857 से 1858 की स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्वपूर्ण भमिका निभाई।