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फर्ज तो और भी हैं

Fri, 18 Oct 2013 10:27 AM IST
टीम डिजिटल/लखनऊ
टीम डिजिटल/लखनऊ Updated Fri, 18 Oct 2013 10:27 AM IST
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azam khan and raja bhaiya

वजीर बनने के बाद अपने राजा की ठसक, जाहिर है...बढ़ी ही है। नेताजी का भी जवाब नहीं है। एक तीर से दो निशाने लगा लिए।

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कांटे बिछाने वाले खां साहब को ही कांटे हटाने की जिम्मेदारी सौंपकर उनकी ठसक कम की, वहीं खफा-से चल रहे राजा को भी मना लिया।

राजा की चौखट पर जाने के लिए खां साहब सफाई दे रहे हैं कि जो यूनिवर्सिटी की संग-ए-बुनियाद में साथ थे, वे अब भी हमारे साथ रहें...यह न्यौता देना हमारा फर्ज है।

काबीना में उनके ही एक साथी की टिप्पणी थी, फर्ज तो और भी हैं, कभी उन्हें भी याद कर लेते।

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