अतरौली: कल्याण की विरासत और आगे की सियासत, सीधी लड़ाई सपा-भाजपा के बीच
अतरौली विधानसभा सीट पर स्वर्गीय कल्याण सिंह के पौत्र संदीप सिंह भाजपा की तरफ से मैदान में हैं। सपा-भाजपा के बीच सीधी टक्कर है। आप आदमी पार्टी ने भी अपना प्रत्याशी उतारा है।
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अतरौली विधानसभा सीट प्रदेश की सियासत में किसी पहचान की मोहताज नहीं। अतरौली के जिक्र के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कल्याण सिंह का नाम खुद ब खुद जेहन में कौंध आता है। इस सीट पर कल्याण सिंह के देहांत के बाद पहली बार चुनाव हो रहा है और उनके पौत्र संदीप सिंह अपने दादा के ऐतिहासिक सियासी वजूद, खुद के कार्यों के दम पर मैदान में हैं। सपा के कद्दावर नेता व पूर्व विधायक वीरेश यादव उन्हें सीधी टक्कर दे रहे हैं। जातीय गणित के आधार पर सीट पर लड़ाई सीधी सपा और भाजपा में दिखाई दे रही है। हालांकि, हर बार की तरह कांग्रेस व बसपा भी अपनी पैठ बनाने की कोशिश में हैं। पहली बार आम आदमी पार्टी ने भी इस सीट पर चुनावी ताल ठोकी है।
मुद्दों पर मुखर हैं मतदाता : गंगा खादर यानी जिले के सांकरा गंगा घाट से सटे गांव नगला काम सहाय के उच्च शिक्षा अध्ययनरत युवा जयपाल सिंह यादव कहते हैं, सड़कों का जाल बिछा है। पर, दिल्ली-कानपुर हाईवे से सांकरा को जोड़ने वाला नानऊ सांकरा मार्ग बदहाल है। यहत हालत सरकार की दोहरी मानसिकता की वजह से है। अतरौली से सटे गांव जगतपुर के किसान नरेंद्र चौधरी कहते हैं कि बेशक मुख्यमंत्री रहते कल्याण सिंह ने सौ शैया का अस्पताल बनवाया। पर, आज उसमें संसाधनों का अभाव है। गांव काजिमाबाद के युवा नानक राजपूत कहते हैं, क्षेत्र में विकास बहुत तेजी से हुआ है। सबसे महत्वपूर्ण बात, इन पांच साल में अतरौली पर लगा नकल का गढ़ होने का धब्बा हटा है। गांव लोहगढ़ के पंकज शर्मा कहते हैं, हमारा क्षेत्र दुग्ध उत्पादन व्यापार का बड़ा गढ़ है। सरकार इस दिशा में अगर कोई उद्यम लगाने की पहल करेगी तो यहां रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।
यहां कल्याण ने एकछत्र राज किया
भाजपा के कद्दावर नेता व राम मंदिर मुद्दे के अग्रणी नेताओं में शामिल रहे पूर्व सीएम कल्याण सिंह की यह पैतृक सीट है। इनके अलावा विहिप के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अशोक सिंहल, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री सीबी गुप्ता इसी क्षेत्र के गांव बिजौली के मूल निवासी थे। इसलिए इस क्षेत्र में भाजपा की शुरू से गहरी पैठ रही है। वर्ष 1967 में पहली बार जनसंघ से विधायक बने कल्याण सिंह का हमेशा इस सीट पर दबदबा रहा है। इस बीच सिर्फ एक मर्तबा 1980 में इंदिरा लहर में कांग्रेस के अनवार खां ने कल्याण सिंह को चुनाव हराया। इसके बाद लगातार कल्याण सिंह ही जीतते रहे। 1991 व 96 में वे मुख्यमंत्री बने।
छर्रा सीट पर भी दिखता है अतरौली का असर
अतरौली से दो और सीटें छर्रा व बरौली जुड़ी हुई हैं। हालांकि, ठाकुर बहुल बरौली सीट का अपना अलग रसूख और मिजाज है। बरौली सीट पर किसी अन्य का कोई प्रभाव नहीं दिखाई देता। अतरौली से सटी छर्रा सीट जरूर ऐसी है, जिस पर अतरौली का सीधा और हमेशा से प्रभाव रहा है। यानी कल्याण सिंह और उनके परिवार का प्रभाव रहा है।
ये हैं प्रमुख मुद्दे
- रोजगार की दृष्टि से किसी बड़े उद्यम की आज तक स्थापना न हो पाना।
- किसानों के लिए बड़े वेयर हाउस और मंडी की स्थापना न हो पाना।
- स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जिला मुख्यालय या सुदूर शहरों पर निर्भर होना।
- महंगाई, छुट्टा जानवरों से फसलों को नुकसान, किसानों से जुड़े मुद्दे।
पूर्व विधायक व सपा प्रत्याशी वीरेश यादव का कहना है कि भाजपा सरकार में कोई नई सड़क नहीं बनी। समाजवादी सरकार में बनी सडकों और सांकरा पुल पर बोर्ड लगाकर अपनी उपलब्धि बता रहे हैं। सपा सरकार में 100 अधिक गांवों में लोहिया और जनेश्वर मिश्र योजना के तहत सीसी रोड, विद्युतीकरण और आवास बनाए गए। भाजपा सरकार में एक गांव में भी ऐसा कोई काम नहीं हुआ। प्रधानमंत्री आवास अधूरे पड़े हैं। किसानों के लिए भी कुछ काम नहीं किया और स्वास्थ्य सेवाएं भी बदहाल हैं। किसी भी हाल में अतरौली का विकास नहीं करवा सके।
भाजपा प्रत्याशी व राज्यमंत्री संदीप सिंह का कहना है कि पिछले साढ़े चार वर्ष में मैंने अतरौली की तस्वीर बदलने के भरपूर प्रयास किए हैं, जिसमें मैं सैकड़ों कार्य कर पाया हूं। सड़क निर्माण और सुधार पर सबसे अधिक व तेजी से काम किया गया। रोजगार व शिक्षा के लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। हमारा प्रयास समस्त सुविधाओं से अतरौली की जनता को लाभान्वित करना है। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा।