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हम तो चिल्लाएंगे, कब तक न सुनोगे
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
Updated Sat, 03 Aug 2013 10:28 AM IST
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यह थ्योरी एक वरिष्ठ राजनेता की है। किसानों की रहनुमाई का दावा करने वाली पार्टी को जिंदा रखने के लिए उनके पास कार्यकर्ता और भीड़ जुटाऊ नेता भले ही न हों, पर उनके पास अपनी एक खास कला तो है ही।
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वह यह कि बोलते रहो और चढ़ कर बोलो, चाहे सदन हो या सड़क।
बोलोगे नहीं तो लोग सुनेंगे कैसे। बोलते रहो, लोग कब तक नहीं सुनेंगे। उन्होंने अपनी इस थ्योरी को मीडिया में बने रहने के लिए इस्तेमाल कर लिया है।
नियमित तौर पर उनका एक या दो प्रेस नोट मीडिया के लिए तैयार रहता है। असल में नेता जी का मानना है कि अधिक नहीं तो कुछ तो छपेगा।
अगर नहीं छपेगा तो कितने दिन तक, रोज भेजेंगे और हर ज्वलंत मुद्दे पर बोलेंगे। कभी तो छापना ही पड़ेगा।