सियासी समर में 'सेंटर प्वॉइंट' के लिए बेकरार दल
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नए साल की शुरुआत के साथ ही यूपी में भाजपा ने कांग्रेस को मुख्य निशाने
भाजपा ने गुरुवार को यहां कांग्रेस के खिलाफ प्रदर्शन ही नहीं किया, बल्कि राहुल गांधी और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का पुतला फूंकने को लेकर उनकी कांग्रेसियों से भिड़ंत भी हुई।
पुलिस की लाठियां भी खाईं। यह ऐलान भी कर दिया कि कांग्रेस के खिलाफ उनकी लड़ाई जारी रहेगी। वहीं, कांग्रेस ने भी भाजपा को निशाने पर ले लिया है।
पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री ने सूबे में 30 जनवरी को भाजपा के खिलाफ प्रदर्शन करने की घोषणा की है।
उन्होंने तर्क दिया है कि शहीद दिवस पर भाजपा के खिलाफ प्रदर्शन की वजह लोगों को यह बताना है कि अपनी सांप्रदायिक राजनीति को धार देने के लिए इन ताकतों ने महात्मा गांधी की हत्या की थी।
उधर, समाजवादी पार्टी ने मुजफ्फरनगर दंगा में कांग्रेस और भाजपा का हाथ बताया है। यह आरोप भी लगाया है कि कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री, नरेंद्र मोदी को लाभ पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
बहुजन समाज पार्टी ने सपा और भाजपा पर यह कहते हुए हमला बोल दिया है कि मुजफ्फरनगर दंगा के पीछे सपा और भाजपा की साजिश है।
इस मोर्चाबंदी से यह साफ
हो गया है कि यूपी में चुनावी समर में सभी दल अपनी-अपनी मुख्य भूमिका
दिखाने को बेकरार हो उठे हैं।
जाहिर है कि आने वाले दिनों में सियासी दलों
के नेताओं के एक-दूसरे पर जुबानी हमले और ज्यादा तीखे होंगे बल्कि जमीनी
लड़ाई में भी तीखापन दिखेगा।
अपने बीच लड़ाई समेटना चाहते हैं भाजपा व कांग्रेस
कांग्रेस
और भाजपा जिस तरह एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में आए हैं, उससे इन दलों की
कोशिश सूबे में लोकसभा चुनाव के समर को अपने बीच समेटने की है।
दरअसल,
दोनों को ही पता है कि दिल्ली में सत्ता पर कब्जा करने को दम दिखाने का
पूरा दारोमदार उत्तर प्रदेश पर निर्भर है।
इसलिए दोनों की कोशिश है कि यूपी
के चुनावी समर में सपा और बसपा मुख्य लड़ाई में न दिखें, क्योंकि अगर ये
दल भी लड़ाई में दिखने लगे तो दोनों का ही गणित गड़बड़ाएगा।
मुस्लिम वोट फैक्टर
मुस्लिम
वोटों को कांग्रेस के साथ लामबंद होने से रोकने के लिए भाजपा की कोशिश है
कि वह कांग्रेस से मुकाबला करते दिखे।
इसके साथ ही वह मुजफ्फरनगर मुद्दे पर
कांग्रेस, सपा और बसपा तीनों को निशाने पर रखकर मुसलमानों में यह भ्रम भी
फैलाए रखना चाहती है कि मुसलमानों के लिए कामकाज को लेकर सिर्फ कांग्रेस
ही उसके निशाने पर नहीं है।
सपा और बसपा की नीतियों पर भी भाजपा को आपत्ति
है। वहीं कांग्रेस की कोशिश किसी तरह यह दिखाने की है कि मुसलमानों के
मुद्दे पर वही भाजपा की दुश्मन नंबर एक है। सपा और बसपा की नजर भी मुस्लिम
वोटों पर जमी है।
सपा की कोशिश मुस्लिम मतों का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा
अपने लिए जुटाना है तो बसपा यह कोशिश करती दिख रही है कि मुस्लिम वोट
कांग्रेस और सपा के बीच लामबंद न होने पाए, जिससे दिल्ली में उसका महत्व
बना रहे।
सपा- बसपा का गणित
सपा
और बसपा दोनों ही को पता है कि राजनीतिक भविष्य के लिए दिल्ली में अपनी
भूमिका महत्वपूर्ण बनाए रखना जरूरी है। इसीलिए इन दलों केे नेता भी तीखे
बयानों द्वारा यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में वे
भी कम नहीं हैं।
दोनों दलों के दिमाग में नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर भी
उथल-पुथल चल रही है। सपा दिल्ली में महत्वपूर्ण भूमिका के साथ-साथ तीसरे
मोर्चे की सरकार की संभावनाओं के मद्देनजर भी यूपी से अच्छी संख्या में
सीटों के साथ दिल्ली पहुंचना चाहती है।
वहीं, बसपा की कोशिश यह है कि वह
यूपी में सपा को जितना रोक सकती है रोक ले, जिससे दिल्ली में वह सपा की
तुलना में ज्यादा प्रासंगिक रहे।