सवर्णों से दूरी...क्यों अखिलेश यादव की मजबूरी! जानें- क्या कहते हैं विशेषज्ञ
साल 2017 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार सामान्य वर्ग से दूरी बनाते जा रहे हैं। वे साफ-साफ कहते हैं कि उन्हें इस बात का अच्छी तरह से अहसास करा दिया गया है कि वे पिछड़े वर्ग से हैं। अपने हर सार्वजनिक वक्तव्य में डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ-साथ डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम ले रहे अखिलेश की दलित-पिछड़ों और सवर्णों के बीच विभाजन की मोटी लाइन खींचने की कोशिश के पीछे एक सोची-समझी रणनीति है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि धार्मिक ध्रुवीकरण की तर्ज पर जातिगत ध्रुवीकरण का फायदा लेने का यह एक प्रयास है। इस निगेटिव सोशल इंजीनियरिंग का कितना फायदा सपा-बसपा गठबंधन को मिलेगा, यह तो चुनाव नतीजों से ही पता चलेगा।
पत्रकार दिलीप मंडल भी अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते हैं कि सपा-बसपा-रालोद गठबंधन को ब्राह्मण मतदाताओं का साथ नहीं मिलेगा। अन्य प्रमुख अगड़ी जातियों का भी कमोबेश यही रुख रहेगा। ऐसे में जिनका वोट नहीं मिलना, उनका नाम लेकर उन दलित-पिछड़े मतदाताओं को क्यों छिटकाया जाए जो सपा-बसपा के परंपरागत वोट माने जाते हैं।
हां, धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण सपा-बसपा के लिए जरूर नुकसानदेह हो सकता है, इसलिए सपा के विजन डाक्यूमेंट में अल्पसंख्यकों के लिए अलग से कोई घोषणा नहीं की गई है। वैसे भी गठबंधन यह मानकर चल रहा है कि अल्पसंख्यक तो उसके साथ रहेंगे ही।
सवर्णों से दूरी की रणनीति का मिलेगा फायदा : डॉ. यादव
जाकिर हुसैन कॉलेज, नई दिल्ली के शिक्षक डॉ. लक्ष्मण यादव का मानना है कि सपा-बसपा गठबंधन सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर चल रहा है। लोहिया मानते थे कि भारत में गरीबी और अमीरी की भी जाति होती है। आज भी इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सामान्य तौर पर ब्राह्मण समेत कई अगड़ी जातियों का समर्थन इस चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशियों को नहीं मिलने वाला है।
इस बात को ये दोनों पार्टियां अच्छी तरह समझ चुकी हैं, वहीं सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए दलित व पिछड़ों के मन में यह बात भी बैठाने की कोशिश है कि उनके हित सामान्य वर्ग से अलग हैं। डॉ. लक्ष्मण यादव कहते हैं, मुझे लगता है कि सवर्ण मतदाताओं से अलग होने की इस कोशिश का गठबंधन को चुनावी फायदा जरूर मिलेगा।
लोहिया के विचारों को सिर्फ जाति के परिप्रेक्ष्य में देखना उचित नहीं : प्रो. आनंद
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं समाजशास्त्री डॉ. आनंद कुमार सपा के इस प्रयास को जाति और वर्ग का घालमेल कर देना मानते हैं। वे कहते हैं कि अब तक हमारी समझ के अनुसार देश की एक फीसदी आबादी 49 प्रतिशत राष्ट्रीय संपत्ति पर काबिज है।
सवर्ण और अवर्ण जातियों के अमीरों का एक वर्ग बन चुका है। यह बाद दीगर है कि सवर्ण और अवर्ण जातियों के गरीब बंटे हुए हैं। राम मनोहर लोहिया के जाति और वर्ग के संबंध की सिर्फ जाति के परिप्रेक्ष्य में जिस तरह सपा के विजन डॉक्यूमेंट में व्याख्या की गई है, वह उचित नहीं है।
हो सकता है कि इससे चुनावी फायदा मिल जाए, पर यह सामाजिक सद्भाव के लिहाज से खुदकुशी से कम नहीं है। हालांकि, वे कहते हैं कि इसका फायदा सपा को मिलेगा भी या नहीं, पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता।
निगेटिव सोशल इंजीनियरिंग का नहीं मिलेगा चुनावी फायदा : प्रो. मिश्रा
बीएचयू के प्रो. कौशल किशोर मिश्रा कहते हैं कि सवर्णों को इस तरह से टार्गेट करना निगेटिव सोशल इंजीनियरिंग है। वर्ष 1964-65 में यह बात लोहिया ने जरूर कही थी कि 60 फीसदी संपत्ति पर 10 फीसदी सवर्ण काबिज हैं। लेकिन, औद्योगीकरण और भूमंडलीकरण के बाद स्थिति में काफी बदलाव आया है।
सवर्णों, पिछड़ों और दलितों के आर्थिक हित एक-दूसरे से बंध चुके हैं। इसलिए सामाजिक तौर पर उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। वे वाराणसी का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यहां साड़ियों का कारोबार गुजरातियों के हाथ में है। कामगार मुसलमान हैं। क्या यहां कोई भी सामाजिक समीकरण गुजरातियों को मुसलमानों से अलग कर सकता है।
प्रो. मिश्रा कहते हैं, सपा अध्यक्ष का खुद को सवर्णों से अलग बताए जाने की क्रिया की प्रतिक्रिया जरूर होगी। मुझे नहीं लगता कि निगेटिव सोशल इंजीनियरिंग का चुनावी फायदा मिलेगा।