सुरक्षा के लिए अगर चलने वाले हथियार नहीं दे सकते तो गुलेल ही दे दो...
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सवाल-‘खुशी की आंखों में आंसू की भी जगह रखना/बुरे वक्त कभी पूछ कर नहीं आते।’ जवाब- एक उम्र तक सियासत-ए-साकी से बेखबर, अपना ही लहू पीते रहे अपने जाम से।
शायराना अंदाज में ये सवाल-जवाब के ये अंश मंगलवार को उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रश्नकाल में देखने और सुनने को मिला। अंदाजे-बयां का तकाजा था कि नोंकझोंक के बीच चल रहा सदन कुछ क्षण के लिए ठहाकों से गूंज उठा।
दरअसल, मंगलवार को बसपा के भिनगा (श्रावस्ती) विधायक मो. असलम राईनी का विधायकों की सुरक्षा में तैनात सरकारी गनर को मिले असलहों को बदले जाने से जुड़ा सवाल लगा था। राईनी ने पहले सहज भाव से बताया कि गनर को जो स्टेन गन दी गईं हैं वे मिलिट्री से रिजेक्टेड हैं।
उन्होंने कहा कि नेता सदन अपनी सुरक्षा एसपीजी से कर लेते हैं तो क्या उनका खून, खून है और बाकी विधायकों का खून पानी है? उन्होंने माहौल को थोड़ा गंभीर बनाते हुए शायरी अर्ज की-‘खुशी की आंखों में आंसू की भी जगह रखना/बुरे वक्त कभी पूछ कर नहीं आते।’
राईनी ने विधायकों के गनर को एके-47 और एके-56 दिए जाने की मांग की। उनकी बात का कई सदस्यों ने समर्थन भी किया। राईनी ने कहा कि सरकार अगर काम करने वाले असलहे नहीं दे सकती तो फिर गुलेल ही उपलब्ध करा दे। इसका निशाना अचूक होता है और सदन से एयरपोर्ट तक लाने-ले जाने में कहीं कोई रोक नहीं है। इसी के साथ राईनी ने गले में पहनकर लाई गई गुलेल निकालकर दिखा दी। इसके जवाब में सुरेश खन्ना ने भी एक शायरी पेश की।
'ये तो चिड़िया और कौए मारने में प्रयोग में आती है'
कहा, एक उम्र तक सियासत-ए-साकी से बेखबर, अपना ही लहू पीते रहे अपने जाम से। उन्होंने बताया कि विधायकों की सुरक्षा से जुड़ी मौजूदा नीति पिछली सरकार के समय की लागू है। उनकी सरकार ने गनर के समयबद्ध प्रशिक्षण व शस्त्र जांच की समयबद्ध व्यवस्था लागू की है।
उन्होंने असलहा बदलने से इन्कार कर दिया। मंत्री ने गुलेल प्रदर्शन का भी जवाब देते हुए कहा कि यह तो चिड़िया और कौए मारने के प्रयोग में आती है।