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आप सोच भी नहीं सकते शहर की हवा दे रही है कितने रोग

Sat, 12 Dec 2015 03:51 PM IST
अतुल भारद्वाज/अमर उजाला, लखनऊ
अतुल भारद्वाज/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 12 Dec 2015 03:51 PM IST
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air pollution in lucknow city leads to many diseases

हवा में बढ़ता प्रदूषण अब स्वस्थ लखनऊ वालों को भी बीमार बना रहा है। देश का सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर बन चुका लखनऊ अब इससे पैदा हो रही बीमारियों का भी सामना कर रहा है।

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केजीएमयू और सिविल अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि लोग आंख, गला और फेफड़ों में संक्रमण की समस्या लेकर आ रहे हैं।

मरीजों की मेडिकल हिस्ट्री से पता चल रहा है कि उन्हें बीमार करने में प्रदूषण का बड़ा रोल है। वहीं प्रदूषण से बचाने के लिए एकमात्र जरिया एन-95 मास्क है जो कि इतना महंगा है कि इसे मध्यम वर्ग के लोगों के उपयोग करना संभव नहीं है।
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77 प्रतिशत ट्रैफिक कांस्टेबलों की आंखों में जलन
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (आईआईटीआर) ने वायु प्रदूषण का असर सड़क किनारे रहने वाले लोगों पर पता करने के लिए स्टडी कराई।

स्टडी में पता चला कि 77.47 प्रतिशत ट्रैफिक कांस्टेबल, 74.07 प्रतिशत दुकानदार और 20 प्रतिशत ड्राइवरों ने आंखों में जलन की शिकायत की।

इसके अलावा 33.49 प्रतिशत ड्राइवर, 21.29 प्रतिशत दुकानदार और 26.12 प्रतिशत ट्रैफिक कांस्टेबलों ने आंखें लाल होने यानी रेडनेस की शिकायत की। रिपोर्ट के मुताबिक अधिकांश लोग किसी न किसी तरह की आंखों की बीमारी से परेशान थे।
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केजीएमयू के ऑप्थमोलॉजी विभाग की ओपीडी के मरीजों में भी इसी तरह का ट्रेंड डॉक्टरों को मिला है। इनमें करीब 30 प्रतिशत मरीज प्रदूषण की वजह से रेडनेस, आंखों से पानी आना और एलर्जी की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं।

बीमारी
- आंखों का लाल होना
- आंखों में जलन
- आंखों से पानी का आना
- एलर्जी जैसे खुजली का बढ़ जाना
- कंजेक्टिवाइटिस

बढ़ रहे हैं खांसी के मरीज

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50-60 मरीज खांसी, गला खराब वाले रोजाना
सिविल अस्पताल की ईएनटी विभाग की ओपीडी में रोजाना 200-250 मरीज इलाज कराने पहुंचते हैं। इनमें से 50-60 मरीज नए होते हैं। यह मरीज प्रदूषण की वजह से खांसी या फिर गला खराब होने की शिकायत लेकर आते हैं।

डॉक्टरों का कहना है कि असल में यह साइनोसाइटिस और एलर्जी है। पहले साइनस और फे फड़ों की एलर्जी को अलग करके देखा जाता है।

प्रदूषण से जोड़कर इसे देखें तो दोनों का रूट एक ही है। सबसे पहले प्रदूषित कण सांस के जरिए नाक और गला से होते हुए फेफड़ों तक पहुंचते हैं। इससे साइनोसाइटिस और फेफ़डों का संक्रमण होता है। यही वजह है कि 25-30 प्रतिशत मरीज ओपीडी में बढ़ गए।

बीमारी
- साइनोसाइटिस
- एलर्जी की वजह से छींक और खांसी
- माइग्रेन का दर्द
- जुकाम होना

सांस के 25 प्रतिशत मरीज बढ़े

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केजीएमयू के पल्मोनरी डिसीज विभाग में करीब 25 प्रतिशत मरीज प्रदूषण ने बढ़ा दिए हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इसके पीछे हवा में मौजूद सूक्ष्मकण पीएम2.5 और पीएम10 कण हैं।

यह सांस के साथ फे पड़ों तक पहुंच जाते हैं। इसके बाद फेफड़ों में सेटल हो जाते हैं। इससे फेफड़ों में नुकसान होता है। सबसे बुरा असर अस्थमा के मरीजों पर होता है।

पुणे की एक स्टडी में यह पता भी चला है कि वाहनों के गुजरने के रूट किनारे के इलाकों के निवासियों में अस्थमा ज्यादा होता है। उनके फेफड़ों की क्षमता भी कम हो जाती है।

बीमारी
- ब्रांकाइटिस
- सीओपीडी
- ब्रांकिएटटेसिस
- लंग इंफेक्शन

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