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Lucknow News: दिन में काम के बाद रात में मंच पर छा जाते हैं रामायण के किरदार
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मृदुल मिश्रा
लखनऊ। रामलीला सिर्फ मंच पर निभाए जाने वाले किरदारों की कहानी नहीं, बल्कि उन लोगों की भी दास्तान है, जो पीढ़ियों से इन किरदारों को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाए हुए हैं। राजधानी की कई ऐतिहासिक रामलीलाओं में राम, लक्ष्मण, हनुमान, रावण, दशरथ और मेघनाद की भूमिका निभाने वाले कलाकार दिन में अपने काम-धंधे में जुटे रहते हैं और रात होते ही मंच पर उतरकर पात्र बन जाते हैं। वर्षों से निभाए जा रहे इन किरदारों के पीछे ऐसी ही कई अनकही कहानियां हैं। पेश है रामलीला के इन किरदारों की कहानी।
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दिन में कानून की रखवाली, रात में दशरथ-मेघनाद की भूमिका
147 साल पुरानी मौसमगंज की रामलीला से शिवकुमार वर्मा का रिश्ता चार दशक से ज्यादा पुराना है। उत्तर प्रदेश पुलिस में इंस्पेक्टर शिवकुमार दिन में कानून-व्यवस्था संभालते हैं और रात में मंच पर दशरथ या मेघनाद बन जाते हैं। नौकरी और रामलीला के बीच उन्होंने ऐसा तालमेल बनाया कि दोनों जिम्मेदारियां साथ चलती रहीं। आज उनका बेटा इंजीनियर है और बेटी ने बीएससी पूरी की है।
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पिता से विरासत में मिली हनुमान की भूमिका
मौसमगंज की रामलीला में 38 साल से हनुमान का किरदार निभा रहे सुशील मिश्रा के लिए यह भूमिका विरासत में मिली जिम्मेदारी जैसी है। उनके पिता भी इसी रामलीला में हनुमान बनते थे। करीब चार दशक पहले सुशील इससे जुड़े और फिर किरदार जिंदगी का हिस्सा बन गया। पहले सहारा कंपनी में नौकरी की, बाद में नौकरी छूटने पर परचून की दुकान संभाली। दुकान और रामलीला के बीच तालमेल बनाकर परिवार चलाया। आज बेटी बेंगलुरु में मैनेजर और बेटा अमेरिकी कंपनी में अच्छे पद पर है।
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माथे पर राम का मुकुट आते ही बदल जाता है अंदाज
21 वर्षीय अभिषेक त्रिपाठी के लिए रामलीला नौकरी से अलग कोई शौक नहीं, बल्कि परिवार से मिला जुड़ाव है। वह सर्जिकल इंप्लांट की बिक्री का काम करते हैं और मौसमगंज में राम की भूमिका निभाते हैं। पिता चार दशक से रामलीला से जुड़े हैं। अभिषेक भी मंचन से 15 दिन पहले रोज रात आठ से 11 बजे तक अभ्यास करते हैं। उनके मुताबिक राम की भूमिका ने उनके व्यक्तित्व में बदलाव किया है। मुकुट पहनते ही उन्हें एक अलग शांति महसूस होती है।
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उम्र के साथ गहरा हुआ मंच से रिश्ता
78 वर्षीय हेमा जोशी के कदम मंच पर पड़ते हैं तो शबरी का किरदार जीवंत हो उठता है। वर्ष 1982 से रामलीला से जुड़ीं हेमा ने लोकगीत, पार्श्व गायन और स्टेज कार्यक्रमों में लंबा सफर तय किया है। रेडियो और टीवी पर भी प्रस्तुतियां दीं। मूल रूप से अल्मोड़ा की रहने वालीं हेमा हिंदी की लेक्चरर रहीं और वहीं सेवाएं दीं। अब लखनऊ में रहती हैं। परिवार भी सफलता की राह पर है। बेटा आईआईएम से एमबीए कर बेंगलुरु में बड़े पद पर है, जबकि बेटी भी अच्छी तरह स्थापित है।
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दशरथ से सुबाहु तक निभाए पांच किरदार
आलमबाग रेलवे रामलीला में मृदुल मिश्रा करीब 15 साल से दशरथ, बाली और बाणासुर जैसे किरदार निभा रहे हैं। इससे पहले वह राम और सुग्रीव की भूमिका भी कर चुके हैं। पेशे से बैंकर मृदुल ने जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने अभिनय का सिलसिला नहीं टूटने दिया। किरदार बदलते रहे, लेकिन मंच से उनका रिश्ता बना रहा, आज भी वह बखूबी हर किरदार निभाते हैं।
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नौकरी के साथ 30 साल से रावण, 15 साल संभाली रामलीला की कमान
आलमबाग रेलवे रामलीला में वीरेंद्र कुमार शर्मा की पहचान तीन दशक से रावण के किरदार से है। निजी कंपनी में कार्यरत वीरेंद्र के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन मंच से उनका जुड़ाव नहीं टूटा। करीब 15 साल तक उन्होंने रामलीला का निर्देशन भी किया और अब फिर रावण की भूमिका में लौट आए हैं। परिवार में बेटी को पढ़ाकर दिल्ली की निजी कंपनी में अच्छे पद तक पहुंचाया।
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दिन में कानून की रखवाली, रात में दशरथ-मेघनाद की भूमिका
147 साल पुरानी मौसमगंज की रामलीला से शिवकुमार वर्मा का रिश्ता चार दशक से ज्यादा पुराना है। उत्तर प्रदेश पुलिस में इंस्पेक्टर शिवकुमार दिन में कानून-व्यवस्था संभालते हैं और रात में मंच पर दशरथ या मेघनाद बन जाते हैं। नौकरी और रामलीला के बीच उन्होंने ऐसा तालमेल बनाया कि दोनों जिम्मेदारियां साथ चलती रहीं। आज उनका बेटा इंजीनियर है और बेटी ने बीएससी पूरी की है।
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पिता से विरासत में मिली हनुमान की भूमिका
मौसमगंज की रामलीला में 38 साल से हनुमान का किरदार निभा रहे सुशील मिश्रा के लिए यह भूमिका विरासत में मिली जिम्मेदारी जैसी है। उनके पिता भी इसी रामलीला में हनुमान बनते थे। करीब चार दशक पहले सुशील इससे जुड़े और फिर किरदार जिंदगी का हिस्सा बन गया। पहले सहारा कंपनी में नौकरी की, बाद में नौकरी छूटने पर परचून की दुकान संभाली। दुकान और रामलीला के बीच तालमेल बनाकर परिवार चलाया। आज बेटी बेंगलुरु में मैनेजर और बेटा अमेरिकी कंपनी में अच्छे पद पर है।
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माथे पर राम का मुकुट आते ही बदल जाता है अंदाज
21 वर्षीय अभिषेक त्रिपाठी के लिए रामलीला नौकरी से अलग कोई शौक नहीं, बल्कि परिवार से मिला जुड़ाव है। वह सर्जिकल इंप्लांट की बिक्री का काम करते हैं और मौसमगंज में राम की भूमिका निभाते हैं। पिता चार दशक से रामलीला से जुड़े हैं। अभिषेक भी मंचन से 15 दिन पहले रोज रात आठ से 11 बजे तक अभ्यास करते हैं। उनके मुताबिक राम की भूमिका ने उनके व्यक्तित्व में बदलाव किया है। मुकुट पहनते ही उन्हें एक अलग शांति महसूस होती है।
उम्र के साथ गहरा हुआ मंच से रिश्ता
78 वर्षीय हेमा जोशी के कदम मंच पर पड़ते हैं तो शबरी का किरदार जीवंत हो उठता है। वर्ष 1982 से रामलीला से जुड़ीं हेमा ने लोकगीत, पार्श्व गायन और स्टेज कार्यक्रमों में लंबा सफर तय किया है। रेडियो और टीवी पर भी प्रस्तुतियां दीं। मूल रूप से अल्मोड़ा की रहने वालीं हेमा हिंदी की लेक्चरर रहीं और वहीं सेवाएं दीं। अब लखनऊ में रहती हैं। परिवार भी सफलता की राह पर है। बेटा आईआईएम से एमबीए कर बेंगलुरु में बड़े पद पर है, जबकि बेटी भी अच्छी तरह स्थापित है।
दशरथ से सुबाहु तक निभाए पांच किरदार
आलमबाग रेलवे रामलीला में मृदुल मिश्रा करीब 15 साल से दशरथ, बाली और बाणासुर जैसे किरदार निभा रहे हैं। इससे पहले वह राम और सुग्रीव की भूमिका भी कर चुके हैं। पेशे से बैंकर मृदुल ने जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने अभिनय का सिलसिला नहीं टूटने दिया। किरदार बदलते रहे, लेकिन मंच से उनका रिश्ता बना रहा, आज भी वह बखूबी हर किरदार निभाते हैं।
नौकरी के साथ 30 साल से रावण, 15 साल संभाली रामलीला की कमान
आलमबाग रेलवे रामलीला में वीरेंद्र कुमार शर्मा की पहचान तीन दशक से रावण के किरदार से है। निजी कंपनी में कार्यरत वीरेंद्र के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन मंच से उनका जुड़ाव नहीं टूटा। करीब 15 साल तक उन्होंने रामलीला का निर्देशन भी किया और अब फिर रावण की भूमिका में लौट आए हैं। परिवार में बेटी को पढ़ाकर दिल्ली की निजी कंपनी में अच्छे पद तक पहुंचाया।

मृदुल मिश्रा

मृदुल मिश्रा

मृदुल मिश्रा

मृदुल मिश्रा

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