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मोदी ने खास अंदाज में पूर्वांचल को दिया सियासी संदेश

Fri, 25 Apr 2014 04:13 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 25 Apr 2014 04:13 AM IST
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acts of modi on nomination day

वाराणसी में पर्चा दाखिल करने पहुंचे नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक संदेश देने के लिए वह सब कुछ किया जो उनकी राजनीति को ही नहीं, बल्कि खुद उन्हें ताकत देने में मददगार हो।

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प्रतीकों के सहारे हर तरह के समीकरण साधने की कोशिश की तो शब्दों और हावभाव से लोगों की धारणाओं को बदलने और उनसे जुड़ने का प्रयास किया।

मानों वह यह जान चुके हों कि कुछ लोग उन्हें दबंग, अकड़ूं और तानाशाह नेता ही नहीं बताते बल्कि ब्राह्मण, अगड़ा और मुस्लिम विरोधी बताकर भी प्रचारित कर रहे हैं।
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इसीलिए, उन्होंने इस प्रचार को भी झूठा साबित करने पर पूरी नजर रखी। काशी की धरती पर कदम रखने से लेकर प्रस्तावकों के चयन और बोलने तक एक-एक कदम पर वही किया जो पूरे देश में उनकी स्वीकार्यता को बढ़ाने में और उनके विरोधियों को जनता के बीच कठघरे में खड़ा करने में मददगार हो।
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सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश

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वाराणसी के धरती पर पहुंचने के साथ उन्होंने सबसे पहले पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा को माल्यार्पण किया।

मालवीय के बाद उन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा पर माल्यार्पण करके पूर्वांचल के सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश की तो यह संदेश देने का प्रयास भी कि वह पटेल जैसी राष्ट्रवादी राजनीति के प्रति प्रतिबद्ध हैं।

नामांकन के लिए खुली गाड़ी पर सवार हुए तो उनके साथ भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद, मुख्तार अब्बास नकवी, रामेश्वर चौरसिया, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अमित शाह, प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी के साथ अनुप्रिया पटेल की और नामांकन कराने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश थे।

इसके अलावा पंडित मदन मोहन मालवीय के पौत्र गिरिधर मालवीय, पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र, बुनकर प्रतिनिधि अशोक और वीरभद्र निषाद की मौजूदगी के साथ से उन्होंने सबका साथ और सबका विश्वास हासिल करने का संदेश देने की कोशिश की।

युवाओं से जुड़ने की कोशिश

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मोदी ने काशी की धरती का प्रतीक विद्वता को सम्मान देने, सांस्कृतिक विविधता और प्रतिभा का ख्याल रखने, पूर्वांचल के पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों की तरक्की पर ध्यान देने और इस पूरे इलाके में बुनकरों की बदहाली को दूर करने की प्रतिबद्धता जताने में भी कसर नहीं छोड़ी।

विवेकानंद की प्रतिमा पर माल्यार्पण करके उन्होंने युवाओं से जुड़ने की कोशिश की तो यह बताने का भी प्रयास किया कि उनकी सरकार बनी तो उनकी प्राथमिकताओं में काशी की संस्कृति सबसे ऊपर होगी।

जो पूरे देश के प्रतिभाओं का सम्मान व संस्कृति की रक्षा करने में उनकी सहायक बनेगी। डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर सामाजिक समरसता का संदेश दिया।

उन्होंने चारों तरफ घूम-घूमकर लोगों का अभिवादन कर और प्रणाम कर आशीर्वाद लेने की मुद्रा में जिस तरह हाथ जोड़े, उससे मानो यह भरोसा दिलाना चाह रहे हों कि वे वाराणसी नहीं छोड़ेंगे।

विस्मिल्लाह का ब्‍लॉग पर जिक्र

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प्रख्यात शहनाई वादक विस्मिल्लाह खां के वंशजों ने भले ही मोदी का प्रस्तावक बनने से इन्कार कर दिया हो लेकिन मोदी ने अपने ब्लॉग पर उनकी चर्चा कर यह संदेश देना नहीं भूले कि वे न तो मुस्लिम विरोधी हैं और न दलित विरोधी।

मोदी ने ब्लॉग पर लिखा ‘लोग शांति और मोक्ष की खोज में वाराणसी आते हैं। मैं संत रविदास और विस्मिल्लाह खां की धरती को प्रणाम करता हूं। विस्मिल्ला खां के बगैर काशी की चर्चा अधूरी है।

खान, गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक थे। काशी के हर व्यक्ति में देवत्व है। गालिब ने भी बनारस के बारे में लिखा है। मुझे आशीर्वाद दे कि मैं वाराणसी की पुरानी प्रतिष्ठा लौटा सकूं।’

उन्होंने यह संदेश भी दिया कि वे सिर्फ चुनाव लड़ने के लिए नहीं बल्कि यहां के लोगों के आशीर्वाद से भगीरथ की भूमिका में भागीरथ के किनारे की नगरी और इस नगरी के लोगों को शिव की जटाओं से जैसे तमाम उलझावों से बाहर निकालना चाहते हैं।

भावनात्मक रूप से जुड़े

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मोदी ने लोगों के दिलों में उतरने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। गुजरात के अपने पैतृक गांव बडनगर (मेहसाणा गुजरात) से वाराणसी का रिश्ता जोड़ा। दोनों को भगवान भोलेनाथ की धरती बताया।

कहा, ‘यहां भगवान विश्वनाथ महादेव हैं तो उनका गांव बडनगर प्रसिद्ध हटकेश्वर महादेव मंदिर के लिए जाना जाता है। वाराणसी और बडनगर दोनों प्रमुख तीर्थस्थल हैं। काशी भी बौद्ध संस्कृति के पठन-पाठन का केंद्र है तो उनका गांव भी बौद्ध संस्कृति और बौद्ध भिक्षुओं का बड़ा केंद्र रहा।

दोनों ही संगीत और संस्कृति के लिए जाने जाते हैं।’

मोदी ने पतंगों के कारोबार का जिक्र करके और बतौर काशी के सांसद बुनकरों की बेहतरी के लिए काम करने की प्रतिबद्धता जताकर पूर्वांचल के बुनकरों खासतौर से मुसलमानों को यह समझाने की कोशिश की कि वे उनके कामकाज के एजेंडे से बाहर नहीं है।

अंत में उन्होंने गंगा को साबरमती से ज्यादा साफ करने की बात कहकर यह बताने की कोशिश की कि वह काशी की चिंताओं को अपने दिल में लेकर आए हैं।

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