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कानून भी नहीं बचा पाया पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले, लाखों का मेंटेनेंस पर मामूली था किराया

Tue, 08 May 2018 09:12 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 08 May 2018 09:12 AM IST
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Act could not save the bungalows of former chief ministers of uttar pradesh.
- फोटो : amar ujala

उत्तर प्रदेश सरकार विधानमंडल से एक्ट बनाकर भी पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी आवास की सुविधा नहीं बचा पाई। इसके लिए राज्य सरकार द्वारा बनाए गए उप्र. मंत्री (वेतन, भत्ता और प्रकीर्ण) (संशोधन) अधिनियम को शीर्ष अदालत ने निरस्त कर दिया। प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को 1980 से आजीवन आवास सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। इस समय एनडी तिवारी से लेकर अखिलेश यादव तक 6 पूर्व मुख्यमंत्री सरकारी बंगले पर काबिज हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने लोकप्रहरी की याचिका पर एक अगस्त 2016 को पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवासों के साथ ही ट्रस्टों, सोसायटीज व संस्थाओं को संपत्तियों के आवंटन को अवैध ठहराया था। शीर्ष अदालत ने आदेश दिया था कि तत्कालीन 6 पूर्व मुख्यमंत्रियों से दो माह में सरकारी बंगले खाली कराए जाएं।
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सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार की उस नियमावली को अवैध ठहराते हुए खारिज कर दिया था जिसके तहत पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवास आवंटित किए गए थे। इसके बाद तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले बचाने के लिए कानून में संशोधन का फैसला किया। 1981 के मूल अधिनियम में संशोधन करके नए विधेयक का प्रस्ताव कैबिनेट में रखा गया।
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29 अगस्त 2016 को विधानसभा में उप्र. मंत्री (वेतन, भत्ता और प्रकीर्ण) (संशोधन) विधेयक पेश किया गया। विधानमंडल के दोनों सदनों से विधेयक पारित कराकर पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास आवंटन को कानूनी दर्जा दिया गया। इसमें प्रावधान था कि प्रदेश के किसी पूर्व मुख्यमंत्री को उनके अनुरोध पर जीवनपर्यंत राज्य संपत्ति विभाग द्वारा निर्धारित मासिक किराये पर सरकारी आवास आवंटित किया जाएगा।

नए एक्ट को थी दी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

Act could not save the bungalows of former chief ministers of uttar pradesh.
विक्रमादित्य मार्ग पर स्थित पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बंगला। - फोटो : amar ujala

लोकप्रहरी ने उत्तर प्रदेश विधानमंडल से पारित नए अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सर्वोच्च अदालत में प्रदेश सरकार का पक्ष सुना। राज्य सरकार की ओर से पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगला आवंटित करने के पक्ष में तर्क दिया गया।

कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री को विशेष दर्जे का लाभ दिया जा सकता है। कुछ अन्य उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को भी आफिस छोड़ने के बाद विशिष्ट श्रेणी में रखा जाता है। इसमें सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति शामिल हैं।

उन्हें पेंशन, स्वास्थ्य सुविधाएं, यात्रा भत्ता, स्टाफ जैसी सुविधाएं दी जाती हैं। ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री को सरकारी आवास उपलब्ध कराने को गलत नहीं माना जा सकता। इस मामले में  सर्वोच्च अदालत में न्याय मित्र बनाए गए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवास सुविधा दिए जाने का विरोध किया था। सभी पक्षों को सुनने के बाद सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियो के आवास आवंटन को कानून जामा पहनाने वाले एक्ट को निरस्त कर दिया।

लाखों से होती है मरम्मत, किराया मात्र हजारों में

Act could not save the bungalows of former chief ministers of uttar pradesh.

पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवंटित सरकारी बंगले लंबे-चौड़े क्षेत्रफल और शहर के सबसे पॉश इलाके में हैं। इनका रखरखाव सरकार करती है। राज्य संपत्ति विभाग इसके लिए सालाना बजट आवंटित करता है। ये सभी बंगले मामूली किराये पर आवंटित है। इनमें हर साल लाखों रुपये मरम्मत पर खर्च किए जाते हैं।

राज्य संपत्ति विभाग पूर्व सीएम के बंगले की मरम्मत के लिए सालाना 25 लाख रुपये तक की धनराशि स्वीकृत कर सकता है जबकि इनसे किराया नाममात्र का लिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट से आदेश से पहले एक से पांच एकड़ तक में बने इन बंगलों में विक्रमादित्य मार्ग स्थित मुलायम सिंह के आवास का किराया सर्वाधिक 13,478  रुपये मासिक था। सबसे कम किराया 4625 रुपये किराया रामनरेश यादव के बंगले का था।

22 नवबंर 16 को राम नरेश यादव की मृत्यु हो जाने पर उनके बंगले का आवंटन निरस्त कर दिया गया है। दो बंगलों को जोड़कर बनाए गए मायावती के आवास का किराया मात्र 12,500 रुपये प्रतिमाह था।

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