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हिमायत व हिकारत के बीच झूलता ‘आप’ का ताप
राजेन्द्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sun, 16 Feb 2014 09:40 AM IST
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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे के फैसले पर समाज के जागरूक लोग एकमत नहीं है। किसी की नजर में वह अति महत्वाकांक्षी हैं तो कोई उन्हें भ्रष्ट व्यवस्था का शिकार मानता है।
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उन्हें लगता है कि पूरा घटनाक्रम सियासी नफे-नुकसान का आकलन करके गढ़ा गया है। इसमें आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा सभी शामिल हैं।
दिल्ली में जो कुछ हुआ उसका दूसरे राज्यों में लोकसभा चुनावों पर ज्यादा असर पड़ने की संभावना नहीं मानी जा रही है।
केजरीवाल सरकार के इस्तीफे पर शुरू हुई बहस टीवी चैनल्स और सोशल मीडिया से लेकर नुक्कड़ों और चौपालों तक पहुंच गई है।
49 दिन की सरकार को उन्होंने जनलोकपाल के मुद्दे पर कुर्बान कर दिया। कोई केजरीवाल के पक्ष में खड़ा है तो विरोध में।
सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डॉ. आरपी शुक्ला को लगता है कि केजरीवाल ने इस्तीफा देने में जल्दबाजी की है। शायद उनकी मजबूरी थी कि लोकसभा चुनाव सिर पर है।
इसके पीछे कहीं न कहीं उनकी अति महत्वाकांक्षा दिखती है। दिल्ली में ‘आप’ को अप्रत्याशित तौर पर 28 सीटें मिलीं।
अब उन्हें लगता है कि वे इससे ज्यादा डिजर्व करते हैं। 49 दिन में उन्होंने कई काम किए हैं लेकिन अभी बहुत कुछ किया जा सकता था।
डॉ. शुक्ला मानते हैं कि लोकसभा चुनाव न होते तो शायद दिल्ली की सियासी तसवीर इतनी जल्दी न बदलती। दिल्ली से बाहर ‘आप’ इफेक्ट नजर नहीं आएगा। तीसरी ताकत बनने का ‘आप’ का चांस धूमिल होता दिख रहा है।
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नरेन्द्र देव कृषि विश्वविद्यालय फैजाबाद के एसोसिएट प्रोफेसर और किसान नेता डॉ. अरविंद कुमार सिंह की राय इससे एकदम जुदा है।
बस्ती निवासी डॉ. सिंह कहते हैं कि केजरीवाल का स्टैंड एकदम ठीक है। इस्तीफा नहीं देते तो उनकी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम जमींदोज हो जाती।
उन्होंने भ्रष्टाचारी कांग्रेस और भाजपा को बेनकाब कर दिया। दोनों दलों ने जनलोकपाल के मुद्दे पर ‘आप’ के खिलाफ मिलकर वोटिंग की।
सदन में ‘आप’ सरकार के पक्ष में 27 और विरोध में 42 वोट पड़े थे। यानी सरकार अल्पमत में आ गई थी। ऐसे में केजरीवाल ने इस्तीफा देकर न केवल नैतिक वरन संवैधानिक दायित्वों की भी पूर्ति की है।
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वह मानते हैं कि केजरीवाल ने सरकार को शहीद करके ‘आप’ की मौजूदगी का औचित्य बढ़ा दिया है। दिल्ली, एनसीआर और मेट्रोपोलिटन शहरों ही नहीं कुछ राज्यों में भी ‘आप’ का आधार बढ़ेगा।