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Flash back: बड़े-बड़े नेताओं को सभाओं में नसीब नहीं होती थीं कुर्सियां, यहां पढ़े- 1962 का एक वाक्या
Fri, 19 Apr 2024 02:53 PM IST
ishwar ashish
सतीश पाठक, अमर उजाला, अयोध्या
सतीश पाठक, अमर उजाला, अयोध्या
Published by: ishwar ashish
Updated Fri, 19 Apr 2024 02:53 PM IST
सार
अब भले ही जनसभाओं और रैलियों के लिए नेताओं के बड़े-बड़े मंच बनाए जाते हैं लेकिन पहले नेताओं को भी सभाओं में कुर्सियां नसीब नहीं होती थीं। 1962 में हुए चुनाव के दौरान अयोध्या जिले में पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की सभा में दिखा एक दृश्य इसका गवाह है।
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पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू।
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
गुजरे जमाने में संघर्षों के दौर से निकले नेता यूं ही सफलता के नए आयाम गढ़ते हुए बुलंदियों तक नहीं पहुंचते थे। उसके पीछे उनके त्याग, तपस्या, सरलता, सहजता जैसे कर्म भी होते थे। बड़ी सभाओं में भी बड़े-बड़े नेताओं को कुर्सियां नहीं मिलती थीं। बल्कि, धरती की गोद में बैठकर ही वह अपने सियासी जीवन की जमीन सींचते थे। जिले में 1962 में हुए चुनाव के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की एक सभा में दिखा एक दृश्य इसका गवाह है।
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वर्ष 1977 में अयोध्या से विधायक रहे जिले के वरिष्ठ नेता जयशंकर पांडेय बताते हैं कि वह 1962 में आठवीं के छात्र थे। अपने दादा व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वशिष्ठ देव पांडेय के साथ वह अधिकतर समय बिताते थे। इस बीच उनकी राजनीति में भी रुचि बढ़ने लगी। उस समय के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद से बृजवासी लाल कांग्रेस के प्रत्याशी थी। उनके चुनाव प्रचार के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू आए थे, जिन्होंने छावनी क्षेत्र के मैदान में जनसभा की थी। वह भी अपने दादा वशिष्ठ देव पांडेय के साथ जनसभा में पहुंचे।
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मंच पर प्रधानमंत्री के साथ केंद्रीय पेट्रोलियम एवं रसायन मंत्री केशवदेव मालवीय, कांग्रेस अध्यक्ष अजीत प्रसाद जैन समेत राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को ही जगह मिल सकी और मंच फुल हो गया। इसके बाद भी रेला उमड़ रहा था। जगह न मिलने पर कई बड़े नेता मंच के सामने जमीन पर ही बैठ गए और प्रधानमंत्री का उद्बोधन सुना। आज का चुनावी परिदृश्य एकदम जुदा है। पंडाल में महंगी व वीआईपी कुर्सियां, कतारबद्ध सोफे आदि से खूब सजाया जाता है। जनता के भी खाने-पीने से लेकर उन्हें सभा स्थल तक पहुंचाने के तमाम प्रबंध किए जाते हैं।