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बीच रास्ते दगा दे रहीं रोडवेज की खटारा बसें
Updated Wed, 06 Sep 2017 12:48 AM IST
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बीच रास्ते दगा दे रहीं रोडवेज की खटारा बसें
रायबरेली। रोज करीब 25 हजार मुसाफिर जिले की रोडवेज बसों से सफर करते हैं। मगर रायबरेली रोडवेज की अधिकतर बसें पुरानी हैं। रंग-रोगन और थोड़ी बहुत मरम्मत के बाद इन्हें सड़कों पर उतार दिया जाता है, जबकि इनमें से कई बीच रास्ते ही दगा दे जाती है। कब कहां पर खड़ी हो जाएं, इसका कोई भरोसा नहीं है। खासकर पॉकेट रूटों पर अधिक दिक्कत आ रही है। समय से बसों के न पहुंचने पर यात्रियों को मजबूरन डग्गामार वाहनों की सवारी करनी पड़ रही है। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के रायबरेली डिपो में मौजूदा समय में 169 बसों का संचालन किया जा रहा है। इसमें 93 रोडवेज डिपो की खुद की बसें हैं, जबकि 76 बसें अनुबंधित हैं।
लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, दिल्ली जैसे प्रमुख जिलों के लिए जो बसें चलाई जाती हैं, उनकी कंडीशन तो ठीक है, लेकिन पॉकेट रूटों पर चलने वाली ज्यादातर बसें खटारा हैं। डलमऊ, सरेनी, खीरों, सलोन, शिवगढ़ आदि रूटों पर चलाई जाने वाली बसें खटारा हैं। ये बसें अक्सर खराब हो कर जहां-तहां खड़ी हो जाती हैं। वहीं डग्गामार वाहनों में यात्रियों को भूसे की तरह भरा जाता है। कब मुसाफिर हादसे का शिकार हो जाएं, इसका भरोसा नहीं। यह हाल तब है, जब डिपो की ओर से यात्रियों से किराया तो बराबर लिया जाता है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर कंजूसी बरती जाती है।
संविदा चालक-परिचालकों का ही भरोसा
रायबरेली डिपो चालकों व परिचालकों की कमी से जूझ रहा है। यदि संविदा चालक और परिचालक न हों तो गाड़ियों का संचालन नामुमकिन हो जाए। स्टेशन अधीक्षक अशोक त्रिपाठी के मुताबिक रेगुलर चालकों की संख्या 41 है, जबकि संविदा चालकों की संख्या 169 है। वहीं रेगुलर परिचालक 58 और संविदा परिचालक 271 हैं। संविदा चालकों व परिचालकों की तैनाती की वजह से बसों के संचालन में कोई दिक्कत नहीं आती है।
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ठीक ढंग से होता बसों का संचालन : आरपी सिंह
सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक आरपी सिंह का कहना है कि रायबरेली डिपो कोई बस खटारा नहीं है। अधिकतर बसें नई हैं। बसों का संचालन ठीक तरीके से होता है। यात्रियों को बेहतर सुविधा दी जाती है। यदि कोई मुसाफिर किसी बात की शिकायत करता है तो उसे दूर कराया जाता है।
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रायबरेली। रोज करीब 25 हजार मुसाफिर जिले की रोडवेज बसों से सफर करते हैं। मगर रायबरेली रोडवेज की अधिकतर बसें पुरानी हैं। रंग-रोगन और थोड़ी बहुत मरम्मत के बाद इन्हें सड़कों पर उतार दिया जाता है, जबकि इनमें से कई बीच रास्ते ही दगा दे जाती है। कब कहां पर खड़ी हो जाएं, इसका कोई भरोसा नहीं है। खासकर पॉकेट रूटों पर अधिक दिक्कत आ रही है। समय से बसों के न पहुंचने पर यात्रियों को मजबूरन डग्गामार वाहनों की सवारी करनी पड़ रही है। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के रायबरेली डिपो में मौजूदा समय में 169 बसों का संचालन किया जा रहा है। इसमें 93 रोडवेज डिपो की खुद की बसें हैं, जबकि 76 बसें अनुबंधित हैं।
लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, दिल्ली जैसे प्रमुख जिलों के लिए जो बसें चलाई जाती हैं, उनकी कंडीशन तो ठीक है, लेकिन पॉकेट रूटों पर चलने वाली ज्यादातर बसें खटारा हैं। डलमऊ, सरेनी, खीरों, सलोन, शिवगढ़ आदि रूटों पर चलाई जाने वाली बसें खटारा हैं। ये बसें अक्सर खराब हो कर जहां-तहां खड़ी हो जाती हैं। वहीं डग्गामार वाहनों में यात्रियों को भूसे की तरह भरा जाता है। कब मुसाफिर हादसे का शिकार हो जाएं, इसका भरोसा नहीं। यह हाल तब है, जब डिपो की ओर से यात्रियों से किराया तो बराबर लिया जाता है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर कंजूसी बरती जाती है।
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संविदा चालक-परिचालकों का ही भरोसा
रायबरेली डिपो चालकों व परिचालकों की कमी से जूझ रहा है। यदि संविदा चालक और परिचालक न हों तो गाड़ियों का संचालन नामुमकिन हो जाए। स्टेशन अधीक्षक अशोक त्रिपाठी के मुताबिक रेगुलर चालकों की संख्या 41 है, जबकि संविदा चालकों की संख्या 169 है। वहीं रेगुलर परिचालक 58 और संविदा परिचालक 271 हैं। संविदा चालकों व परिचालकों की तैनाती की वजह से बसों के संचालन में कोई दिक्कत नहीं आती है।
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ठीक ढंग से होता बसों का संचालन : आरपी सिंह
सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक आरपी सिंह का कहना है कि रायबरेली डिपो कोई बस खटारा नहीं है। अधिकतर बसें नई हैं। बसों का संचालन ठीक तरीके से होता है। यात्रियों को बेहतर सुविधा दी जाती है। यदि कोई मुसाफिर किसी बात की शिकायत करता है तो उसे दूर कराया जाता है।