अटल के गढ़ में दिलचस्प होगा मामला
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कई दिनों से चल रही अटकल आखिरकार खत्म हो गई और भाजपा ने राजनाथ को लखनऊ सीट के लिए चुन लिया। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी पहले ही उतार रखे हैं।
अब सिर्फ आम आदमी पार्टी का उम्मीदवार आना बाकी है। आप की तरफ से लालबहादुर शास्त्री के पौत्र आदर्श शास्त्री के नाम की चर्चा है।
सियासी बिसात में बाजी कौन जीतता है, यह नतीजों के बाद पता चलेगा। पर, जो चेहरे मैदान में हैं, उनके चलते यहां का मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है।
भगवा गढ़ में समाजवादी झंडा
मामला क्यों न हो दिलचस्प, इसकी वजह भी है। पिछले पांच वर्षों में राजधानी की सियासी तस्वीर ही नहीं बदल चुकी है बल्कि राजनीतिक समीकरण भी काफी हद तक बदल चुके हैं।
भगवा गढ़ माने जाने वाली इस सीट पर विधानसभा चुनाव में समाजवादी झंडा लहरा चुका है।
राजधानी के शहरी व ग्रामीण इलाके को मिलाकर विधानसभा की नौ सीटों में से इस समय सात पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है।
शेष दो में एक से भाजपा के कलराज मिश्र और एक से कांग्रेस की डॉ. रीता बहुगुणा जोशी विधायक हैं जो इस चुनाव में भी उम्मीदवार हैं।
जोशी लोकसभा का पिछला चुनाव भी यहीं से कांग्रेस से लड़ी थी और सिर्फ 38000 वोटों से चुनाव हारी थी।
विधानसभा चुनाव में न सिर्फ भाजपा को झटका लगा था बल्कि बसपा उस समय सत्तारूढ़ बसपा का भी सफाया हो गया था। बसपा के कब्जे वाली सरोजनीनगर, बख्शी का तालाब और मलिहाबाद सीटें भी सपा ने छीन ली थी।
राजधानी के सामाजिक समीकरण
लखनऊ के अतीत के नतीजों पर नजर डालें तो अब तक हुए चुनाव में तीन मौकों को छोड़कर हमेशा यहां से ब्राह्मण चेहरे को ही प्रतिनिधित्व मिला है।
शायद यही वजह है कि इस बार सपा, बसपा और कांग्रेस ने इन्हीं समीकरणों के मद्देनजर अपने-अपने उम्मीदवार ब्राह्मण उतारे हैं।
समाजवादी पार्टी से डॉ. अशोक वाजपेयी, कांग्रेस से रीता बहुगुणा जोशी और बसपा से नकुल दुबे मैदान में हैं।
ब्राह्मण चेहरों का मतलब
दरअसल, राजधानी की चुनावी इतिहास बताता है कि पहले यहां ब्राह्मण व मुस्लिम वोटों के समीकरणों से कांग्रेस जीतती रही।
फिर 1991 में राम मंदिर आंदोलन के बाद समीकरण बदले और ब्राह्मण, वैश्य व कायस्थ वोटों के गठजोड़ से भाजपा का चुनावी सफर सफलतापूर्वक चलता रहा।
विधानसभा के चुनाव में सपा की सफलता के पीछे भी यही समीकरण दिखे। उसने दो ब्राह्मण चेहरे उतारे। यह दोनों तो जीत ही गए बल्कि पांच अन्य सीटों पर भी उसे इसका लाभ मिला।
शायद इसी को देखते हुए तीनों दलों ने ब्राह्मण चेहरों पर दांव लगाया है। राजनाथ के आने के बाद सिर्फ वही एक क्षत्रिय चेहरा हैं।
ऐसी स्थिति में उन्हें अपनी जीत के लिए इन्हीं समीकरणों में से अपने लिए जगह तलाशनी होगी।
मुश्किलें और चुनौतियां
मुश्किलों व चुनौतियों पर नजर दौड़ाएं तो तस्वीर थोड़ा और दिलचस्प हो जाती है। सभी के सामने कुछ न कुछ मुश्किलें व चुनौतियां दिख रही हैं।
समाजवादी पार्टी का भले ही यहां विधानसभा की सात सीटों पर कब्जा हो। पर, पिछले दो वर्षों में स्थितियां काफी बदल चुकी हैं। इस बार बसपा सरकार के खिलाफ गुस्से का कोई लाभ उसे नहीं मिलने वाला।
बसपा की बात करें तो वह ब्राह्मण व दलित वोटों पर ही भरोसा कर सकती है। डॉ. रीता बहुगुणा जोशी भी ब्राह्मण वोटों में सेंध लगाएंगी।
पर, सिर्फ ब्राह्मण वोटों की बदौलत कुछ कर पाना उनके लिए भी मुश्किल होगा। ऐसी स्थिति में यहां का ब्राह्मण वोट किसी एक के पाले में जाने की संभावना नहीं दिख रही है।
भाजपा के उम्मीदवार राजनाथ सिंह के लिए यही मुश्किल होगी कि भाजपा का परंपरागत यह मतदाता पूरी तरह उनके पक्ष में नहीं रहेगा।
यह स्थिति भी
यह बात अब ढकी-छिपी नहीं रह गई है कि सिंह को लेकर लालजी टंडन बहुत प्रसन्न नहीं है।
डॉ. जोशी के साथ जिस तरह का बरताव हुआ है, उसकी प्रतिक्रिया यहां के उत्तराखंडी समाज में ही नहीं बल्कि ब्राह्मण मतदाताओं में हो सकती है।
स्वाभाविक है कि सिंह को अपना चुनाव खड़ा करने से पहले इन स्थितियों से भी निपटना पड़ेगा। लखनऊ में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 4.50 लाख है।
इस समय ऐसी कोई स्थिति नहीं है जिससे मुसलमानों को किसी के पक्ष में ध्रुवीकरण दिख रहा है। हेमवती नंदन बहुगुणा को लेकर मुसलमानों के बीच जिस तरह की लोकप्रियता रही है।
उसको देखते हुए राजधानी के मुसलमानों को उनकी पुत्री डॉ. रीता बहुगुणा जोशी के तरफ जाने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है। ऐसा हुआ तो सिंह के लिए कठिनाई और बढ़ेगी।
हालांकि राजनाथ की सहज सुलभता और मिलनसार होने के गुण की अनदेखी नहीं की जा सकती है।
वह अपने धुर विरोधियों के यहां भी सहजता से पहुंचने के लिए जाने जाते हैं। मुख्यमंत्री के नाते मुलायम सिंह यादव के यहां अचानक पहुंचकर लड्डू खिलाने वाली घटना सभी को याद होगी।