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करोड़ों खर्च फिर भी बांध पर बीत रही बाढ़ पीड़ितों की जिंदगी
Updated Sat, 30 Jun 2018 11:48 PM IST
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करोड़ों खर्च फिर भी बांध पर बीत रही बाढ़ पीड़ितों की जिंदगी
बाराबंकी। बाढ़ की विभीषिका से बचाने के लिए बांध की मरम्मत के नाम पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं लेकिन इसका लाभ बाढ़ प्रभावित गांवों के लोगों को नहीं मिल रहा है।
आज भी दौ सौ से अधिक परिवार बांध पर गुजर-बसर कर रहे हैं। इस बार भी पीड़ितों का बाढ़ से बचाने के जो इंतजाम किए जा रहे हैं वह नाकाफी दिखाई दे रहे हैं जबकि मानसून ने लगभग दस्तक दे दी है।
बहराइच, गोंडा और बाराबंकी जिले की सैकड़ों ग्राम पंचायतों को बाढ़ की विभीषिका से बचाने के लिए जिस एल्गिन चरसड़ी तटबंध का निर्माण कराया गया था वो लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा।
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दस वर्षों में ये तीन बार कट चुका है। इस पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये मरम्मत के नाम पर पानी की तरह बहा दिए जाते हैं लेकिन उसका फायदा बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के लोगों को नहीं मिल पाता है।
घाघरा की एक ठोकर लगते ही किसानों के खून पसीने की कमाई तबाह हो जाती है। लोग घर व जमीन छोड़ बांध पर गुजर-बसर करने को विवश हो जाते हैं। दो सौ से अधिक परिवार आज भी बांध पर ठिकाना बनाए हुए हैं।
इन्हें एक अदद सरकारी आवास भी मुहैया नहीं हो सका है। बरसात का मौसम आते ही यहां के लोगों को एकबार फिर बाढ़ की चिंता सताने लगी है। अभी तक बांध की मरम्मत का कार्य पूरा नहीं हो सका है।
जबकि मानसून ने दस्तक दे दी है। ऐसे में बांध की मरम्मत कैसे होगी, ये चिंता ग्रामीणों को सता रही है। मगर अफसर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।
गैर जनपद के साथ ही बाराबंकी के चार गांव की लगभग दस हजार आबादी बाढ़ खंड की उदासीनता से एक बार फिर भारी समस्याओं से जूझेगी।
बाढ़ से सुरक्षा के लिए करीब 52 किलोमीटर लंबे इस बांध के निर्माण पर 7.5 करोड़ रुपये खर्च आया था। जिसकी मरम्मत और क्षेत्र को बाढ़ से बचाने के लिए अब तक लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं।
इस वर्ष फिर करीब 90 करोड़ रुपये बांध के लिए जारी किए गए, जिसमें बांस गांव के कटे तटबंध को बनाने के साथ ही करीेब पांच किलोमीटर का नया बांध बनना था। इसमें से तीन किलोमीटर बांध बनकर तैयार हो गया है।
यह बांध बाराबंकी के बेहटा से गोंडा के काशीपुर तक बनना है। एक बार फिर बांध मजबूत बनाने की कवायद तेज हो गई है। पहले कटान रोकने के लिए जीओ ट्यूब सहित ब्रिकरोरा, बालू की बोरियां, बल्ली, पायलिंग के साथ पेड़ पौधे व घासफूस तक किनारों पर डाला जाता था।
मगर इस बार बांध के किनारों की पत्थरों से पिचिंग की जा रही है। कोई जिम्मेदार अभी भी ये कहने को तैयार नहीं कि बांध सुरक्षित है और अब बाढ़ से कोई खतरा नहीं।
घाघरा का पानी भी धीरे-धीरे बढ़ना शुरू हो चुका है। ऐसे में जिम्मेदार कुछ बोलने को तैयार नहीं है।
एडीएम संदीप कुमार गुप्ता का कहना है कि, बाढ़ से लोगों को बचाने के लिए बाढ़ खंड विभाग बंधे पर कार्य करा रहा है।
जिलाधिकारी द्वारा समय-समय पर इसका निरीक्षण भी किया जाता है। निर्माण कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं। जिससे इस बार बाढ़ का असर जिले की जनता पर न पड़े।
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बाराबंकी। बाढ़ की विभीषिका से बचाने के लिए बांध की मरम्मत के नाम पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं लेकिन इसका लाभ बाढ़ प्रभावित गांवों के लोगों को नहीं मिल रहा है।
आज भी दौ सौ से अधिक परिवार बांध पर गुजर-बसर कर रहे हैं। इस बार भी पीड़ितों का बाढ़ से बचाने के जो इंतजाम किए जा रहे हैं वह नाकाफी दिखाई दे रहे हैं जबकि मानसून ने लगभग दस्तक दे दी है।
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बहराइच, गोंडा और बाराबंकी जिले की सैकड़ों ग्राम पंचायतों को बाढ़ की विभीषिका से बचाने के लिए जिस एल्गिन चरसड़ी तटबंध का निर्माण कराया गया था वो लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा।
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दस वर्षों में ये तीन बार कट चुका है। इस पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये मरम्मत के नाम पर पानी की तरह बहा दिए जाते हैं लेकिन उसका फायदा बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के लोगों को नहीं मिल पाता है।
घाघरा की एक ठोकर लगते ही किसानों के खून पसीने की कमाई तबाह हो जाती है। लोग घर व जमीन छोड़ बांध पर गुजर-बसर करने को विवश हो जाते हैं। दो सौ से अधिक परिवार आज भी बांध पर ठिकाना बनाए हुए हैं।
इन्हें एक अदद सरकारी आवास भी मुहैया नहीं हो सका है। बरसात का मौसम आते ही यहां के लोगों को एकबार फिर बाढ़ की चिंता सताने लगी है। अभी तक बांध की मरम्मत का कार्य पूरा नहीं हो सका है।
जबकि मानसून ने दस्तक दे दी है। ऐसे में बांध की मरम्मत कैसे होगी, ये चिंता ग्रामीणों को सता रही है। मगर अफसर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।
गैर जनपद के साथ ही बाराबंकी के चार गांव की लगभग दस हजार आबादी बाढ़ खंड की उदासीनता से एक बार फिर भारी समस्याओं से जूझेगी।
बाढ़ से सुरक्षा के लिए करीब 52 किलोमीटर लंबे इस बांध के निर्माण पर 7.5 करोड़ रुपये खर्च आया था। जिसकी मरम्मत और क्षेत्र को बाढ़ से बचाने के लिए अब तक लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं।
इस वर्ष फिर करीब 90 करोड़ रुपये बांध के लिए जारी किए गए, जिसमें बांस गांव के कटे तटबंध को बनाने के साथ ही करीेब पांच किलोमीटर का नया बांध बनना था। इसमें से तीन किलोमीटर बांध बनकर तैयार हो गया है।
यह बांध बाराबंकी के बेहटा से गोंडा के काशीपुर तक बनना है। एक बार फिर बांध मजबूत बनाने की कवायद तेज हो गई है। पहले कटान रोकने के लिए जीओ ट्यूब सहित ब्रिकरोरा, बालू की बोरियां, बल्ली, पायलिंग के साथ पेड़ पौधे व घासफूस तक किनारों पर डाला जाता था।
मगर इस बार बांध के किनारों की पत्थरों से पिचिंग की जा रही है। कोई जिम्मेदार अभी भी ये कहने को तैयार नहीं कि बांध सुरक्षित है और अब बाढ़ से कोई खतरा नहीं।
घाघरा का पानी भी धीरे-धीरे बढ़ना शुरू हो चुका है। ऐसे में जिम्मेदार कुछ बोलने को तैयार नहीं है।
एडीएम संदीप कुमार गुप्ता का कहना है कि, बाढ़ से लोगों को बचाने के लिए बाढ़ खंड विभाग बंधे पर कार्य करा रहा है।
जिलाधिकारी द्वारा समय-समय पर इसका निरीक्षण भी किया जाता है। निर्माण कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं। जिससे इस बार बाढ़ का असर जिले की जनता पर न पड़े।