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लखनऊ के 23 प्रतिशत रीयल एस्टेट प्रोजेक्ट ‘रेड’, संपत्ति खरीदने को सुरक्षित नहीं
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23 प्रतिशत आवासीय योजनाओं में संपत्ति खरीदना जोखिम भरा
राजधानी के सिर्फ 35 प्रतिशत प्रोजेक्ट ही ग्रीन कोड वाले
कुल प्रोजेक्ट शामिल - 781
रेड प्रोजेक्ट - 184
ग्रीन प्रोजेक्ट - 278
ऑरेंज प्रोजेक्ट - 319
अतुल भारद्वाज
राजधानी में आवासीय योजनाओं में संपत्ति खरीदना चाहते हैं तो जरा संभलकर। शहर में 23.6 फीसदी योजनाओं की संपत्तियां ऐसी हैं जिनको खरीदना आपके सपने और पैसे दोनों की बर्बादी कर सकता है। वहीं 40.8 फीसदी प्रोजेक्ट ऐसे हैं जिनमें कम जोखिम है। 35.6 फीसदी योजनाओं की संपत्तियों में निवेश ही सुरक्षित है। रेरा ने संपत्तियों को जोखिम के आधार उन्हें रेड, ऑरेंज और ग्रीन कलर कोडिंग दी है। अगर आप भी संपत्तियां खरीदना चाहते हैं तो इसे जरूर देखें।
रेरा की रिपोर्ट के मुताबिक कलर कोडिंग में उन प्रोजेक्टों को शामिल किया गया है जो कि रेरा में पंजीकृत हैं। रिपोर्ट के मुताबिक लखनऊ के कुल 781 पंजीकृत योजनाओं में 23.6 प्रतिशत को रेड कोड दिया गया है। वहीं कम जोखिम वाले 40.8 प्रतिशत रीयल एस्टेट प्रोजेक्टों को ऑरेंज कोड दिया गया है। इनमें सरकारी संस्थाओं के अलावा निजी बिल्डर भी शामिल हैं। कुल 781 प्रोजेक्टों का आकलन रेरा की तकनीकी टीम ने किया है। इसमें 184 रीयल एस्टेट प्रोजेक्ट रेड कोड वाले हैं। वहीं 319 प्रोजेक्टों को ऑरेंज कोड दिया गया है। केवल 278 प्रोजेक्ट ऐसे हैं जिनको ग्रीन कोड मिला है।
हम कैसे जानें कौन सी प्रॉपर्टी सुरक्षित
इसके लिए पूरी रिपोर्ट को रेरा की वेबसाइट पर अपलोड किया जा रहा है, जिससे लोग संपत्ति खरीदने से पहले एक बार उस प्रोजेक्ट के बारे में जान सकें। प्रोजेक्ट के नाम या विकासकर्ता के नाम से प्रोजेक्ट को सर्च किया जा सकता है। प्रोजेक्ट की जरूरी जानकारी भी कलर कोड के साथ ही वहां मिल जाएगी।
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इस तरह की गई कलर कोडिंग
रेरा के सचिव अबरार अहमद ने बताया कि तकनीकी टीम ने प्रोजेक्ट की विकासकर्ता की ओर से उपलब्ध कराई गई तिमाही रिपोर्ट, उसके स्वीकृत ले-आउट, वित्तीय व भौतिक प्रगति, रेरा में शिकायतों को आधार बनाते हुए प्रोजेक्टों की कलर कोडिंग की है। ग्रीन कोड या रंग का मतलब है कि प्रोजेक्ट की प्रगति बेहतर है। उसमें बिल्डर पारदर्शिता के साथ रेरा के साथ सूचनाएं साझा कर रहा है। यहां संपत्ति खरीदने की सलाह दी जा सकती है। ऑरेंज कोड का मतलब है कि जरूरी सूचनाएं साझा नहीं की गई हैं। इसका मतलब है कि बिल्डर प्रोजेक्ट के विकास को लेकर पारदर्शी नहीं है। ले-आउट जैसी जरूरी प्रक्रिया पूरी होने के चलते यहां संपत्ति खरीदना अपेक्षाकृत सुरक्षित हो सकता है। रेड कोड बिल्डर की ओर से समय पर सूचनाएं नहीं देने और शिकायतें मिलने की वजह से दिया गया है। अधिकांश के ले-आउट भी सक्षम संस्था से स्वीकृत नहीं कराए गए हैं।
बड़े बिल्डर भी रेड कोड में
रेरा ने जिन प्रोजेक्टों को रेड कोड दिया है, उनमें शहर के कई बड़े बिल्डरों के प्रोजेक्ट भी हैं। इनमें हाईटेक टाउनशिप, बहुमंजिला अपार्टमेंट प्रोजेक्ट तक शामिल हैं। ऐसे में संपत्ति खरीदने से पहले रेरा के कलर कोड जरूर देख लें। केवल बिल्डर के नाम और लोकेशन पर बिल्कुल भरोसा न करें।
एलडीए, आवास विकास तक रेड कोड में
रेरा की रिपोर्ट को देखें तो एलडीए और आवास विकास परिषद तक के प्रोजेक्ट को रेड कोड मिला हुआ है। इनमें अधिकांश प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री आवास, ईडब्ल्यूएस, एलआईजी वर्ग वाले हैं। एलडीए की बसंतकुंज योजना के भूखंड परियोजना और बहुमंजिला ऐशबाग टावर को भी रेड कोड मिला है। यहां विकास कार्य बहुुत धीमा है और रिपोर्ट भी जमा नहीं हैं। वहीं आवास विकास परिषद के अमलतास, प्रधानमंत्री आवास जैसे प्रोजेक्ट को रेड कोड मिला है। एलडीए के 35 प्रोजेक्टों में से 10 को रेड मिला है। वहीं आवास विकास परिषद के 47 में से नौ प्रोजेक्ट रेड में हैं।
रेरा के आने के बाद भी नहीं सुधरे बिल्डर
रेरा के आने के बाद उम्मीद थी कि बिल्डर अपने खरीदारों के लिए ईमानदार बनेंगे। लेकिन, रेरा की कलर कोडिंग ने आईना दिखाने का काम किया है। केवल 35.6 प्रतिशत प्रोजेक्टों के ही ग्रीन होने का मतलब यही है कि बिल्डर अब भी पारदर्शिता से काम करने के लिए तैयार नहीं हैं।
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राजधानी के सिर्फ 35 प्रतिशत प्रोजेक्ट ही ग्रीन कोड वाले
कुल प्रोजेक्ट शामिल - 781
रेड प्रोजेक्ट - 184
ग्रीन प्रोजेक्ट - 278
ऑरेंज प्रोजेक्ट - 319
अतुल भारद्वाज
राजधानी में आवासीय योजनाओं में संपत्ति खरीदना चाहते हैं तो जरा संभलकर। शहर में 23.6 फीसदी योजनाओं की संपत्तियां ऐसी हैं जिनको खरीदना आपके सपने और पैसे दोनों की बर्बादी कर सकता है। वहीं 40.8 फीसदी प्रोजेक्ट ऐसे हैं जिनमें कम जोखिम है। 35.6 फीसदी योजनाओं की संपत्तियों में निवेश ही सुरक्षित है। रेरा ने संपत्तियों को जोखिम के आधार उन्हें रेड, ऑरेंज और ग्रीन कलर कोडिंग दी है। अगर आप भी संपत्तियां खरीदना चाहते हैं तो इसे जरूर देखें।
रेरा की रिपोर्ट के मुताबिक कलर कोडिंग में उन प्रोजेक्टों को शामिल किया गया है जो कि रेरा में पंजीकृत हैं। रिपोर्ट के मुताबिक लखनऊ के कुल 781 पंजीकृत योजनाओं में 23.6 प्रतिशत को रेड कोड दिया गया है। वहीं कम जोखिम वाले 40.8 प्रतिशत रीयल एस्टेट प्रोजेक्टों को ऑरेंज कोड दिया गया है। इनमें सरकारी संस्थाओं के अलावा निजी बिल्डर भी शामिल हैं। कुल 781 प्रोजेक्टों का आकलन रेरा की तकनीकी टीम ने किया है। इसमें 184 रीयल एस्टेट प्रोजेक्ट रेड कोड वाले हैं। वहीं 319 प्रोजेक्टों को ऑरेंज कोड दिया गया है। केवल 278 प्रोजेक्ट ऐसे हैं जिनको ग्रीन कोड मिला है।
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हम कैसे जानें कौन सी प्रॉपर्टी सुरक्षित
इसके लिए पूरी रिपोर्ट को रेरा की वेबसाइट पर अपलोड किया जा रहा है, जिससे लोग संपत्ति खरीदने से पहले एक बार उस प्रोजेक्ट के बारे में जान सकें। प्रोजेक्ट के नाम या विकासकर्ता के नाम से प्रोजेक्ट को सर्च किया जा सकता है। प्रोजेक्ट की जरूरी जानकारी भी कलर कोड के साथ ही वहां मिल जाएगी।
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इस तरह की गई कलर कोडिंग
रेरा के सचिव अबरार अहमद ने बताया कि तकनीकी टीम ने प्रोजेक्ट की विकासकर्ता की ओर से उपलब्ध कराई गई तिमाही रिपोर्ट, उसके स्वीकृत ले-आउट, वित्तीय व भौतिक प्रगति, रेरा में शिकायतों को आधार बनाते हुए प्रोजेक्टों की कलर कोडिंग की है। ग्रीन कोड या रंग का मतलब है कि प्रोजेक्ट की प्रगति बेहतर है। उसमें बिल्डर पारदर्शिता के साथ रेरा के साथ सूचनाएं साझा कर रहा है। यहां संपत्ति खरीदने की सलाह दी जा सकती है। ऑरेंज कोड का मतलब है कि जरूरी सूचनाएं साझा नहीं की गई हैं। इसका मतलब है कि बिल्डर प्रोजेक्ट के विकास को लेकर पारदर्शी नहीं है। ले-आउट जैसी जरूरी प्रक्रिया पूरी होने के चलते यहां संपत्ति खरीदना अपेक्षाकृत सुरक्षित हो सकता है। रेड कोड बिल्डर की ओर से समय पर सूचनाएं नहीं देने और शिकायतें मिलने की वजह से दिया गया है। अधिकांश के ले-आउट भी सक्षम संस्था से स्वीकृत नहीं कराए गए हैं।
बड़े बिल्डर भी रेड कोड में
रेरा ने जिन प्रोजेक्टों को रेड कोड दिया है, उनमें शहर के कई बड़े बिल्डरों के प्रोजेक्ट भी हैं। इनमें हाईटेक टाउनशिप, बहुमंजिला अपार्टमेंट प्रोजेक्ट तक शामिल हैं। ऐसे में संपत्ति खरीदने से पहले रेरा के कलर कोड जरूर देख लें। केवल बिल्डर के नाम और लोकेशन पर बिल्कुल भरोसा न करें।
एलडीए, आवास विकास तक रेड कोड में
रेरा की रिपोर्ट को देखें तो एलडीए और आवास विकास परिषद तक के प्रोजेक्ट को रेड कोड मिला हुआ है। इनमें अधिकांश प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री आवास, ईडब्ल्यूएस, एलआईजी वर्ग वाले हैं। एलडीए की बसंतकुंज योजना के भूखंड परियोजना और बहुमंजिला ऐशबाग टावर को भी रेड कोड मिला है। यहां विकास कार्य बहुुत धीमा है और रिपोर्ट भी जमा नहीं हैं। वहीं आवास विकास परिषद के अमलतास, प्रधानमंत्री आवास जैसे प्रोजेक्ट को रेड कोड मिला है। एलडीए के 35 प्रोजेक्टों में से 10 को रेड मिला है। वहीं आवास विकास परिषद के 47 में से नौ प्रोजेक्ट रेड में हैं।
रेरा के आने के बाद भी नहीं सुधरे बिल्डर
रेरा के आने के बाद उम्मीद थी कि बिल्डर अपने खरीदारों के लिए ईमानदार बनेंगे। लेकिन, रेरा की कलर कोडिंग ने आईना दिखाने का काम किया है। केवल 35.6 प्रतिशत प्रोजेक्टों के ही ग्रीन होने का मतलब यही है कि बिल्डर अब भी पारदर्शिता से काम करने के लिए तैयार नहीं हैं।