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जरा ध्यान दें: आपके भी बच्चे में है टालमटोल की आदत... 21 दिन में ऐसे लाएं बदलाव; शोध में हैरान करने वाले नतीजे

Thu, 19 Dec 2024 01:22 PM IST
भूपेन्द्र सिंह अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: भूपेन्द्र सिंह Updated Thu, 19 Dec 2024 01:22 PM IST
सार

टालमटोल की समस्या से पीड़ित 23 छात्रों को यह थेरेपी दी गई। 21 दिनों के सत्र में रोजाना 50 मिनट उन्हें कई काम दिए गए। इससे उनके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव आया। इसकी पुष्टि उनके अभिवावकों और मित्रों ने भी की।

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21 days of therapy for 23 students suffering from procrastination showed positive changes in their behavior
child - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

क्या आप भी बच्चों की टालमटोल की आदत से परेशान हैं? आप इस व्यवहार को मनोविज्ञान की प्रसिद्ध संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (सीबीटी) से आसानी से बदल सकते हैं। लविवि के एक शोध में सामने आया कि 21 दिन में ऐसे लोगों में सकारात्मक बदलाव आ जाता है।

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लखनऊ विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग की शोधार्थी जया मिश्रा ने अध्ययन में पाया कि सीबीटी के 21 दिनों के सत्र में दिए गए परामर्श से टाल-मटोल और तर्कहीन विश्वासों से निजात पाया जा सकता है। अध्ययन में दो सौ छात्रों को शामिल किया गया। टालमटोल की समस्या से पीड़ित 23 छात्रों को यह थेरेपी दी गई। इससे उनके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव आया। इसकी पुष्टि उनके अभिवावकों और मित्रों ने भी की।
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मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष और शोध निर्देशक डॉ. अर्चना शुक्ला के मुताबिक, टाल-मटोल की आदत खुद को नुकसान पहुंचाती है। भारत में यह सभी आयु समूहों में पाया जाता है। इससे सबसे अधिक प्रभावित होने वाला समूह युवाओं का है। 

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मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है असर

अल्बर्सन एट अल के 2022 में हुए सर्वेक्षण से सामने आया है कि मोबाइल फोन की लत, शारीरिक निष्क्रियता, कोविड के बाद छात्रों में टालमटोल की आदत बढ़ी है। डुरु और बाल्किस के 2017 में हुए शोध से पता चलता है कि 92% भारतीय छात्र टालमटोल करते हैं। उनमें से 62% अक्सर ऐसा करते हैं। इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।

सकारात्मक सोच ने दूर की नकारात्मकता

प्रो. अर्चना के मुताबिक, सीबीटी के परामर्श सत्रों में टालमटोल और तर्कहीन विश्वासों में उलझे छात्रों के नकारात्मक विचारों को सकारात्मक विचारों में बदलने का प्रयास किया गया। इसमें बच्चों को जो छेरेपी दी गईं उनमेंं प्रमुख-

  • खुद को पुरस्कार देने,
  • काम के लिए समय निर्धारित करने,
  • कार्य की ग्रेडिंग करने,
  • प्राइम टाइम
  • प्राइम लोकेशन पहचानने जैसे कार्य दिए गए।

इसे उन्होंने बड़ी ही आसानी से खुद पर लागू किया। 21 दिनों के सत्र में रोजाना 50 मिनट उन्हें ये काम दिए गए।

लक्षण होने पर मनोवैज्ञानिक की लें सलाह

टालमटोल के व्यवहार से पीड़ित लोगों को तत्काल मनोवैज्ञानिक से संपर्क करना चाहिए। इससे समय रहते उनके व्यवहार और आदतों में परिवर्तन लाने का काम किया जा सकता है।

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