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'खून से लथपथ, पर बिछाते रहे सिग्निलिंग के तार ', जांबाजों ने लिखी शौर्य की कुछ ऐसी ही गाथा
Fri, 26 Jul 2019 04:33 PM IST
Amulya Rastogi
नीरज ‘अम्बुज’, अमर उजाला लखनऊ
नीरज ‘अम्बुज’, अमर उजाला लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Fri, 26 Jul 2019 04:33 PM IST
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कारगिल विजय दिवस
- फोटो : amar ujala
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26 जुलाई, 1999 को भारतीय सेना ने कारगिल को पाकिस्तानी घुसपैठियों के कब्जे से पूरी तरह मुक्त करा लिया था। इस ‘ऑपरेशन विजय’ में कई मांओं ने अपने बेटों की कुर्बानियां दीं तो कईयों की मांग का सिंदूर मिट गया। बहनों की राखियों को कलाइयां नहीं मिली तो कई बच्चों पिता के साये से महरूम हो गए। पर, कारगिल के जांबाजों ने देशप्रेम की ऐसी इबारतें लिखीं, जो शताब्दियों तक याद रखी जाएंगी।
‘जो चाहा, कर दिखाया, ऐसा था शौर्य व पराक्रम’
कैप्टन मनोज पांडेय
- फोटो : amar ujala
कैप्टन मनोज पांडेय
रेजीमेंट : 11 गोरखा राइफल्स
शहादत : 3 जुलाई, 1999
‘अगर अपनी बहादुरी साबित करने से पहले मेरे सामने मौत भी आ गई तो मैं उसे खत्म कर दूंगा। यह सौगंध है मेरी...।’
कैप्टन मनोज पांडेय को कारगिल युद्ध का मुख्य नायक कहना गलत नहीं होगा। 4 मई, 1999 को उन्हें कारगिल में भारतीय चौकियों को खाली करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। वह पांच नंबर प्लाटून का नेतृत्व कर रहे थे। कैप्टन पांडेय बटालिक सेक्टर में दुश्मनों पर जीत हासिल करते हुए आगे बढ़ रहे थे। उन्हें खालूबार तक हर पोस्ट को जीतने के ऑर्डर थे। इस दौरान उन्हें भयंकर गोलीबारी का सामना करना पड़ा, पर वह आगे बढ़ते गए। उन्होंने दुश्मनों के चार बंकरों को नेस्तनाबूद कर दिया। इसी दौरान दुश्मन की गोली का शिकार हो गए।
कैप्टन मनोज पांडेय लखनऊ के एकलौते सैन्य अधिकारी रहे, जिन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया। वह इस लिहाज से भी खुशनसीब थे कि सेना में भर्ती होने के महज दो साल बाद ही उन्हें अपने शौर्य व पराक्रम का परिचय देने का मौका मिल गया। उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद कैप्टन मनोज पांडेय राष्ट्रीय रक्षा अकादमी गए, जहां से 1997 में गोरखा राइफल्स में कमीशंड हुए।
रेजीमेंट : 11 गोरखा राइफल्स
शहादत : 3 जुलाई, 1999
‘अगर अपनी बहादुरी साबित करने से पहले मेरे सामने मौत भी आ गई तो मैं उसे खत्म कर दूंगा। यह सौगंध है मेरी...।’
कैप्टन मनोज पांडेय को कारगिल युद्ध का मुख्य नायक कहना गलत नहीं होगा। 4 मई, 1999 को उन्हें कारगिल में भारतीय चौकियों को खाली करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। वह पांच नंबर प्लाटून का नेतृत्व कर रहे थे। कैप्टन पांडेय बटालिक सेक्टर में दुश्मनों पर जीत हासिल करते हुए आगे बढ़ रहे थे। उन्हें खालूबार तक हर पोस्ट को जीतने के ऑर्डर थे। इस दौरान उन्हें भयंकर गोलीबारी का सामना करना पड़ा, पर वह आगे बढ़ते गए। उन्होंने दुश्मनों के चार बंकरों को नेस्तनाबूद कर दिया। इसी दौरान दुश्मन की गोली का शिकार हो गए।
कैप्टन मनोज पांडेय लखनऊ के एकलौते सैन्य अधिकारी रहे, जिन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया। वह इस लिहाज से भी खुशनसीब थे कि सेना में भर्ती होने के महज दो साल बाद ही उन्हें अपने शौर्य व पराक्रम का परिचय देने का मौका मिल गया। उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद कैप्टन मनोज पांडेय राष्ट्रीय रक्षा अकादमी गए, जहां से 1997 में गोरखा राइफल्स में कमीशंड हुए।
शहीद कैप्टन मनोज पांडेय के माता-पिता
- फोटो : amar ujala
गोमतीनगर निवासी कैप्टन मनोज पांडेय के पिता गोपीचंद पांडेय बताते हैं कि बेटे की शहादत पर कैप्टन मनोज पांडेय चौराहा बनाया गया है, लेकिन यहां कार्यक्रम के दौरान जाम के हालात पैदा हो जाते हैं। हम चाहते हैं कि सरकार ऐसी व्यवस्था करे, जिससे बगैर व्यवधान कार्यक्रम कराए जा सकें। कैप्टन मनोज पांडेय के परिजनों ने बताया कि सर्विस सेलेक्शन बोर्ड का साक्षात्कार था। जब उनसे पूछा गया कि फौज क्यों जॉइन करना चाहते हैं तो उन्होंने जवाब दिया कि परमवीर चक्र हासिल करना है और उन्होंने परमवीर चक्र हासिल भी किया, लेकिन मरणोपरांत।
सकारात्मक है सरकार का रवैया
पिता गोपीचंद पांडेय कहते हैं कि केंद्र सरकार ने जिस तेजी से पाकिस्तान को उसकी ही भाषा में जवाब दिया, वह सराहनीय है। सर्जिकल स्ट्राइक कर अपनी ताकत का लोहा मनवा दिया। आतंकियों को पनाह देने वाले पाकिस्तान की चूलें हिली हुई हैं। ऐसेे ही जज्बे की सरकारों से उम्मीद रहती है।
सकारात्मक है सरकार का रवैया
पिता गोपीचंद पांडेय कहते हैं कि केंद्र सरकार ने जिस तेजी से पाकिस्तान को उसकी ही भाषा में जवाब दिया, वह सराहनीय है। सर्जिकल स्ट्राइक कर अपनी ताकत का लोहा मनवा दिया। आतंकियों को पनाह देने वाले पाकिस्तान की चूलें हिली हुई हैं। ऐसेे ही जज्बे की सरकारों से उम्मीद रहती है।
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मेजर रितेश शर्मा
- फोटो : amar ujala
मेजर रितेश शर्मा
रेजीमेंट : 17 जाट रेजीमेंट
शहादत : 6 अक्तूबर 1999
‘देश मेरे लिए सर्वोपरि था, है और हमेशा रहेगा। देश पर कुर्बान होना सौभाग्य की बात है। मौका आने पर मैं इससे पीछे नहीं हटूंगा।’
मेजर रितेश शर्मा ने कारगिल विजय के बाद साथी जवानों की वीरता की कहानियां लोगों को सुनाईं। खुद अदम्य साहस का परिचय देते हुए कारगिल में दुश्मनों को खदेड़ा और जीत के नायक बने। वह ला-मार्टीनियर कॉलेज के छात्र रहे और 9 दिसम्बर, 1995 को सेना में भर्ती हुए। ड्यूटी के दौरान वह मई, 1999 में 15 दिनों की छुट्टी लेकर लखनऊ अपने घर आए थे। इसी दौरान उन्हें कारगिल युद्ध की सूचना मिली। बताया गया कि जवानों की पेट्रोलिंग टुकड़ी गई थी, जिसकी कोई जानकारी नहीं मिली।
इससे पहले कि रेजीमेंट उन्हें बुलाती, वह बगैर बुलाए ही ड्यूटी पर पहुंच गए। चूंकि, जाट रेजीमेंट पहले ही कारगिल की ओर कूच कर चुकी थी, इसलिए मेजर रितेश ने यूनिट के साथ दुश्मनों से मोर्चा लेते हुए चोटी पर तिरंगा फहरा दिया था। इसी क्रम में दो और चोटियों पर भी फतह हासिल की। पर, मश्कोह घाटी जीतते हुए वह घायल हो गए। उन्हें बेस कैंप में लाया गया और कमान कैप्टन अनुज नैयर को सौंप दी गई, जो कारगिल में शहीद हो गए। मश्कोह घाटी में तिरंगा फहराने के कारण ही 17 जाट रेजीमेंट को मश्कोह सेवियर का खिताब भी दिया गया।
कारगिल के बाद 25 सितम्बर, 1999 को कुपवाड़ा में आतंकी ऑपरेशन के दौरान मेजर शर्मा खाई में गिर गए थे, जिसके बाद अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। बेटे की स्मृति में पिता की ओर से स्कॉलरशिप व मेडल दिए जाते हैं। इंदिरानगर के जनकल्याण आंख अस्पताल में टॉपर्स को गोल्ड मेडल, आरएलबी स्कूल में हजार रुपये की छात्रवृत्ति हर साल दी जाती है।
रेजीमेंट : 17 जाट रेजीमेंट
शहादत : 6 अक्तूबर 1999
‘देश मेरे लिए सर्वोपरि था, है और हमेशा रहेगा। देश पर कुर्बान होना सौभाग्य की बात है। मौका आने पर मैं इससे पीछे नहीं हटूंगा।’
मेजर रितेश शर्मा ने कारगिल विजय के बाद साथी जवानों की वीरता की कहानियां लोगों को सुनाईं। खुद अदम्य साहस का परिचय देते हुए कारगिल में दुश्मनों को खदेड़ा और जीत के नायक बने। वह ला-मार्टीनियर कॉलेज के छात्र रहे और 9 दिसम्बर, 1995 को सेना में भर्ती हुए। ड्यूटी के दौरान वह मई, 1999 में 15 दिनों की छुट्टी लेकर लखनऊ अपने घर आए थे। इसी दौरान उन्हें कारगिल युद्ध की सूचना मिली। बताया गया कि जवानों की पेट्रोलिंग टुकड़ी गई थी, जिसकी कोई जानकारी नहीं मिली।
इससे पहले कि रेजीमेंट उन्हें बुलाती, वह बगैर बुलाए ही ड्यूटी पर पहुंच गए। चूंकि, जाट रेजीमेंट पहले ही कारगिल की ओर कूच कर चुकी थी, इसलिए मेजर रितेश ने यूनिट के साथ दुश्मनों से मोर्चा लेते हुए चोटी पर तिरंगा फहरा दिया था। इसी क्रम में दो और चोटियों पर भी फतह हासिल की। पर, मश्कोह घाटी जीतते हुए वह घायल हो गए। उन्हें बेस कैंप में लाया गया और कमान कैप्टन अनुज नैयर को सौंप दी गई, जो कारगिल में शहीद हो गए। मश्कोह घाटी में तिरंगा फहराने के कारण ही 17 जाट रेजीमेंट को मश्कोह सेवियर का खिताब भी दिया गया।
कारगिल के बाद 25 सितम्बर, 1999 को कुपवाड़ा में आतंकी ऑपरेशन के दौरान मेजर शर्मा खाई में गिर गए थे, जिसके बाद अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। बेटे की स्मृति में पिता की ओर से स्कॉलरशिप व मेडल दिए जाते हैं। इंदिरानगर के जनकल्याण आंख अस्पताल में टॉपर्स को गोल्ड मेडल, आरएलबी स्कूल में हजार रुपये की छात्रवृत्ति हर साल दी जाती है।
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कारगिल विजय दिवस
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पिता बोले- न हो शहीद के नाम पर बने पार्क की दुर्दशा
इंदिरानगर में मेजर रितेश शर्मा के नाम पर एक पार्क बनवाया गया है, पर वह देखरेख के अभाव में दुर्दशा का शिकार हो रहा है। इंदिरानगर सेक्टर 20 में रहने वाले मेजर रितेश शर्मा के पिता सत्यप्रकाश शर्मा व मां दीपा शर्मा अपने स्तर पर पार्क की देखरेख करती हैं। पार्क की बाउंड्री से लेकर लाइट तक खराब है। पर, नगर निगम प्रशासन से बार-बार शिकायत के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हो रही है, जिसे लेकर आसपास के लोगों में भी खासी नाराजगी है।