यूपी के चार जिलों में एक महीने में 125 बच्चों की मौत, कहीं लापरवाही तो कहीं संसाधनों की कमी
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गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज और फर्रुखाबाद के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में बच्चों की मौत ने पूरे देश का हिलाकर रख दिया है। अवध क्षेत्र के विभिन्न जिलों के सरकारी अस्पतालों में विगत एक माह में हुई बच्चों की मौत के आंकड़े भी परेशान करने वाले हैं। कहीं न कहीं संसाधनों की कमी और लापरवाही को इन मौतों की वजह माना जा सकता है।
सरकारी आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि अकेले बहराइच जिले में ही अगस्त महीने में 63 बच्चों की मौत हुई है। इनमें 57 मौतें तो जिला अस्पताल में उपचार के दौरान हुई, जबकि 6 बच्चों की मौत पीएचसी-सीएचसी में हुई। डॉक्टर बताते हैं कि आधी मौतें बर्थ एक्सपीसिया व अन्य संक्रामक रोगों से हुई हैं।
जबकि गंभीर नन्हें रोगियों के इलाज के लिए जिला अस्पताल में बाल पीआईसीयू स्थापित है। यहां पर छह डॉक्टरों की तैनाती का मानक है, लेकिन एक भी डॉक्टर तैनात नहीं है। उधर, गोंडा जिले में एक माह के भीतर 24 बच्चों की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई है, इनमें 24 नवजात थे।
हालांकि स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि मरने वाले ज्यादातर बच्चे कम उम्र के थे और उनका वजन काफी कम था। वहीं दूसरी ओर जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में भर्ती बच्चों की मौत के मामले में कोई जिम्मेदार डॉक्टर मुंह खोलने को भी तैयार नहीं है।
इन जिलों में हुईं इतनी मौतें
सीतापुर जिले में 20 जुलाई से 21 अगस्त के बीच 31 नवजात बच्चों ने जान गवां दी। जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू (नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई) में पिछले माह 31 नवजात बच्चों की मौत हो चुकी है। इनकी मौत प्रसव के पांच दिन के अंदर हुई है।
इन्हें सांस लेने में तकलीफ, कम वजन व पीलिया जैसी समस्याएं थीं। जनपद में नवजात की जान बचाने के लिए केवल महिला चिकित्सालय में ही व्यवस्था है।
वहीं, फैजाबाद जिले में 15 दिनों में सरकारी अस्पताल में इलाज के दौरान 7 बच्चों की मौत हुई है। हालांकि फैजाबाद के महिला चिकित्सालय के सीएमएस डॉ एसएन शुक्ला कह रहे हैं कि यदि इन मामलों में लापरवाही मिली तो कार्रवाई जरूर होगी।
रायबरेली जिला अस्पताल ने तो अपनी कमियों पर पर्दा डालने के लिए बच्चों के जन्म और मृत्यु के आंकड़े देने से ही इनकार कर दिया। अंबेडकरनगर, सुल्तानपुर, श्रावस्ती जिलों की भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है।