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7 दिन बस में गुजारी रात, मांग कर खाया खाना

Sun, 27 Dec 2015 07:30 PM IST
Updated Sun, 27 Dec 2015 07:30 PM IST
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12 people come from dubai tell there story

यूपी में देवरिया जिले के 12 युवक सपने लेकर संयुक्त अरब अमीरात गए। पर, वहां जो कुछ झेला, सपने पीछे छूट गए, बड़ा मकसद हो गया घर वापसी। एजेंट से तो धोखा मिला ही, भारतीय वाणिज्य दूतावास से भी मदद नहीं मिली।

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किसी के परिवार ने इधर-उधर से पैसों का बंदोबस्त करके तो किसी ने खेत बेचकर उन्हें पैसे भेजे, ताकि वे अपने घर लौट सकें। शुक्रवार को ये युवक लखनऊ एयरपोर्ट पर पहुंचे तो उनकी जुबां पे तौबा था, तो सलामत वतन वापसी के लिए ईश्वर का शुक्रिया।
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पीड़ितों में शामिल भुवनेश्वर मिश्रा ने बताया कि कुछ समय पहले लखनऊ के कुछ एजेंट्स से उनका संपर्क हुआ। इन एजेंटों ने दुबई में काम दिलाने का वादा किया। इसकी एवज में 70 हजार रुपये फीस मांगी गई।
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मेरे समेत देवरिया के आसपास के क्षेत्रों के 12 लोगों ने रुपये दिए और 9 महीने पहले दुबई पहुंचे। यहां से हमें ओमान बॉर्डर के पास किसी कंस्ट्रक्शन साइट पर ले जाया गया। वहां हमसे निर्माण से जुड़ा काम कराया जाता।

एक अन्य पीड़ित अरुण मिश्रा ने बताया कि भारत से भेजते समय एजेंट्स ने उन्हें साढ़े चार हजार दीनार वेतन मिलने की बात कही थी। लेकिन नौ महीने काम करने के दौरान केवल इतना पैसा दिया गया कि हम भोजन और रहने का बंदोबस्त कर सकें।

घर लौटने तक के लिए नहीं बचा पैसा, मांगकर खाया खाना

12 people come from dubai tell there story

इसके अलावा अन्य जरूरतों के लिए घर से पैसा मंगवाना पड़ता। ऐसे हालात में काम करते हुए हम सबने तय किया अपने देश लौटेंगे। यह बात कंपनी को बताई तो उसने वेतन रोक कर काम से निकाल दिया। बेकार होने के बाद हमने देश लौटना चाहा, लेकिन हमारे पास इतना पैसा नहीं था।

बचे-खुचे रुपयों से हमने दुबई पहुंचने का प्रयास किया, लेकिन पैसे कम पड़ गए। इस बीच वाणिज्य दूतावास में फोन किया तो उन्होंने कहा कि दुबई आकर बात कीजिए। मिश्रा कहते हैं कि हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि दुबई जा पाते या कहीं रुक सकते।

जिस एजेंट ने काम दिलवाया था, उसने इमिग्रेशन और वर्क परमिट के दस्तावेज में गड़बड़ की थी, जिसकी वजह से कोई हमें रखने या काम देने को तैयार नहीं हुआ। नतीजतन बसों में सफर करते हुए हमने रात गुजारी। खाने को पैसा नहीं था, इसलिए दूसरे लोगों से मांग कर खाना खाते।

इसी दौरान वहां के एक अखबार के पत्रकार से संपर्क हुआ, जिसने घर पर बात करवाई। परिवारवालों ने जैसे-तैसे पैसों को जुगाड़ किया। कुछ के परिवार को तो जमीन तक बेचनी पड़ी। अपने मददगारों के जरिये हमने टिकट खरीदे और लौटे।

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