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ऐतिहासिक धरोहरों पर चढ़ी उपेक्षा की परतें

Lucknow Bureau Updated Tue, 17 Apr 2018 09:48 PM IST
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बहराइच। बहराइच, ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व की दृष्टि से समृद्ध है। जिले में पुरखों ने हमारे लिए समृद्ध विरासत छोड़ी। यहां ऐतिहासिक घंटाघर प्रदेश का सबसे बड़ा घंटाघर है।
स्वतंत्रता आंदोलन का गवाह बौंडी किला हमें विरासत में मिला है। स्टील गंज तालाब और पयागपुर का तस्वीर घर समृद्ध धरोहर की कहानी बयां कर रहा है।

लेकिन इन धरोहरों को प्रशासनिक उपेक्षा की नजर लगी हुई है। बुलंद इमारतें जर्जर हैं। सैय्यद सलार मसउद गाजी की दरगाह ऐसी धरोहर है, जो आज भी बुलंदी बयां कर रही है।

लेकिन यह तब संभव हुआ जब वक्फ की संपत्ति घोषित हुई। ऐसे ही हालात रहे और धरोहरों पर चढ़ी उपेक्षा की परतों को नहीं हटाया गया तो आने वाली पीढ़ी धरोहरों को सिर्फ इतिहास के पन्नों में देख सकेगी।

प्रदेश का सबसे ऊंचा है घंटाघर
शहर के मध्य स्थापित घंटाघर ऐतिहासिक है। इसे उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा घंटाघर माना जाता है। इसका निर्माण वर्ष 1909 में हुआ था। जान होस्टिंग ने इसकी नींव रखी थी।

पांच वर्ष तक इसका निर्माण चला। वर्ष 1914 में ब्रिटिश हुकूमत के कमिश्नर क्लार्क ने घंटाघर का उद्घाटन किया था। इसके चारों सिरों पर घड़ी लगी है, जिसके घंटे की आवाज एक किमी दूर तक सुनाई देती थी।

वर्ष 1967 में पालिका अध्यक्ष मनमोहन दास ने घंटाघर पार्क को मनमोहक रुप देने के लिए पौधे लगवाए। इसके बाद 1976 में तत्कालीन डीएम रवि मोहन सेठी ने पार्क का जीर्णोद्धार करते हुए पार्क के मुख्य गेट के सामने फौव्वारा लगवाया था। लेकिन देखरेख के अभाव में सबकुछ बदहाल है।

1857 के आंदोलन का गवाह है बौंडी किला
जिले की एतिहासिक धरोहरों में चहलारी नरेश राजा बलभद्र सिंह व बौंडी नरेश हरदत्त सिंह सवाई की रियासत का नाम सबसे पहले आता है।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 7 फरवरी 1856 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध प्रांत को अपने अधिकार में ले लिया था। इससे यहां विद्रोह की चिंगारी भड़क गई थी।

जब धर पकड़ शुरु हो गई तो अंग्रेजों से बचने के लिए बेगम हजरत महल ने अपने पुत्र बिराजिस कदर के साथ बौंडी किले में शरण लिया था।

बौंडी का किला आजादी के आंदोलन से जुड़ा है। लेकिन संरक्षण के अभाव में उपेक्षित है। किले के समीप से ही घाघरा नदी बह रही है। लेकिन सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं किया गया है।

विदेशों तक फैली है दरगाह की ख्याति
शहर स्थित सैय्यद सलार मसूद गाजी की दरगाह की ख्याति विदेशों तक फैली हुई है। प्रति वर्ष यहां जेठ माह में लगने वाले मेले में करोड़ों जायरीन मत्था टेकने पहुंचते हैं।

इसका निर्माण फिरोज शाह तुगलक व मोहम्मद शाह तुगलक ने कराया था। इस बार यहां गाजी का 1013वां उर्स मनाया जाएगा। दरगाह परिसर में निर्मित कदम रसूल, नाल दरवाजा, संगी किला, बावली कुआं मुगल सभ्यता का नायाब तोहफा हैं। वक्फ 19 की इस संपत्ति से प्रति वर्ष करोड़ों रुपये की कमाई होती हैै।

लेकिन सरकार की तरफ से इसे अभी पर्यटक स्थल घोषित नहीं किया गया है। इससे दरगाह का पूर्ण रुप से विकास भी नहीं हो पा रहा है।

तस्वीर घर की तस्वीर बदहाल
रियासतों में पयागपुर रियासत काफी समृद्ध रही है। वर्ष 1915 में राजा विंदेश्वरी प्रताप सिंह ने पिता भूपेंद्र विक्रम सिंह की स्मृति में तस्वीर घर का निर्माण कराया था।

अष्टकोणीय, आठ स्तंभों पर बना गुंबददार यह तस्वीर घर पश्चिमी शैली का अनूठा नमूना है। स्तंभों पर नक्काशी है। ऐसा माना जाता है कि इसका निर्माण विक्टोरिया पैलेस से मिलता-जुलता है।

दो दशक पूर्व तक इस घर में राजपरिवार के पुरखों के तस्वीर लगी थी और राजा भूपेंद्र सिंह की प्रतिमा स्थापित कराई गई थी। राजपरिवार की वीरगाथाओं का बखान इस घर में मिलता था। लेकिन देखरेख के अभाव में सिर्फ प्रतिमा शेष रह गई है।

संरक्षण बिन बेहाल है स्टीलगंज तालाब
ब्रितानिया हुकूमत के दौरान वर्ष 1840 में जनपद सूखे का दंश झेल रहा था। उस समय जिले के विभिन्न स्थानों पर तालाब व कुंए खुदवाए गए।

तभी राजा नानपारा व बलरामपुर के सहयोग से जार्ज ब्लू स्टील ने शहर के मध्य 25 एकड़ जमीन में तालाब खुदवाया। इसी के चलते इसका नाम स्टीलगंज तालाब पड़ा। इस तालाब में विदेशी पक्षी प्रवास करते थे।

वर्ष 1976 में तत्कालीन डीएम रवि मोहन सेठी ने इस तालाब को मिनी चिड़ियाघर के रुप में तब्दील कर सौंदर्यीकरण कराया। लेकिन उनके स्थानांतरण के बाद स्टीलगंज तालाब को उपेक्षा की नजर लग गई।

वर्ष 2006 में प्रदेश सरकार के तत्कालीन श्रम मंत्री डॉ. वकार अहमद शाह ने इसके सौंदर्यीकरण के लिए योजना तैयार करवाई। 2011 में नगर पालिका अध्यक्ष तेजे खां ने तालाब का सौंदर्यीकरण कराया।

पुरातत्व विभाग को लिखेंगे पत्र
जनपद में ऐतिहासिक धरोहरों का महत्व अहम है। यहां के कई स्थान संरक्षित करने योग्य हैं। उनके संरक्षण के उचित कदम उठाए जा रहे हैं।

संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग को भी पत्र भेजा जाएगा। जिससे जिले की सभी ऐतिहासिक धरोहरों को पूरी तरह से सुरक्षित और संरक्षित किया जा सके। जनसहयोग भी आवश्यक है।
-राम सुरेश वर्मा, अपर जिलाधिकारी, बहराइच

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