फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Lifestyle ›   Know what happened when Homophobic, lesbian, gay, or bisexual people discover their own language

हिंदी-अंग्रेजी नहीं इस भाषा में बात करते थे समलैंगिक, इज्जतदार लोगों की अनदेखी पर खो गया अस्तित्व

Thu, 06 Sep 2018 06:31 PM IST
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला Updated Thu, 06 Sep 2018 06:31 PM IST
विज्ञापन
Know what happened when Homophobic, lesbian, gay, or bisexual people discover their own language
सेक्स, क़ुदरती और जिस्मानी जरूरत है। ये नस्ल बढ़ाने का भी जरिया है। हम यही समझते आए हैं कि इंसानी नस्ल बढ़ाने के लिए मर्द और औरत के बीच ही यौन संबंध होना चाहिए। इसके अलग अगर कोई जिस्मानी रिश्ता बनाता है तो वो जुर्म हो जाता है। समाज उन्हें मुजरिम मान बैठता है। समलैंगिकता भी क़ुदरत ही की देन है। लेकिन समाज की नजर में अपराध है।
विज्ञापन


इंसान अपनी बहुत-सी ख़्वाहिशों का गला घोंट सकता है। कुछ हद तक अपने आप पर नियंत्रण भी रख सकता है। लेकिन सेक्स जैसी शरीर की कुछ ऐसी क़ुदरती जरूरतें, जिन पर वो चाह कर भी काबू नहीं रख सकता। समलैंगिकता भी उसी में से एक है। एक-दूसरे के लिए उनके जज़्बात और ख़्वाहिशें भी ऐसी ही होती हैं, जैसी किसी मर्द और औरत की एक दूसरे के लिए होती है।वो चाहकर भी अपने विपरीत लिंग की ओर आकर्षित नहीं हो सकते। अब ऐसे में वो ख़ुद क्या करें।
विज्ञापन


बीसवीं सदी की शुरुआत तक ज़्यादातर यूरोपीय देशों में समलैंगिकता जुर्म थी। अब एक तरफ तो ये जुर्म था। वहीं दूसरी तरफ समलैंगिकों के लिए क़ुदरती जरूरत। ऐसे में ब्रिटेन में समलैंगिकों ने समाज की नजरों से छुप-छुपाकर संवाद का एक दिलचस्प जरिया तलाश लिया था।
विज्ञापन
विज्ञापन

भाषा का नाम था 'पोलारी'

इसके लिए उन्होंने एक नई भाषा ईजाद कर ली। इस भाषा को सिर्फ़ समलैंगिक संबंधों की ख़्वाहिश रखने वाले ही समझ पाते थे। इस भाषा का नाम था 'पोलारी'। ये ठीक वैसा ही था जैसे ठग, चोर या अंडरवर्ल्ड के लोग अपनी अलग भाषा बोलते हैं। जानकारों का कहना है कि पोलारी भाषा अपने आप में बहुत ताकतवर थी। इस भाषा में ऐसे शब्दों का प्रयोग होता था जिनके जरिए मौके के मुताबिक पहचान को छुपाया या बताया जा सकता था। हालांकि, आज इस जबान का इस्तेमाल बहुत कम है, लेकिन जिस जमाने में ब्रिटेन में समलैंगिकता अपराध थी तब पोलारी ही उन्हें आजादी का एहसास कराती थी।

पोलारी जबान समाज के उस तबके में बोली जाती थी, जिसकी कोई इज़्जत नहीं थी। इसीलिए जबान के एतबार से इसकी अहमियत भी नहीं रही। भाषाओं को संजोने वालों ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया। नतीजा ये हुआ कि ये जबान व्यापक तौर पर बोले जाने के बावजूद लिखी नहीं गई और इस भाषा का मजबूत व्याकरण तैयार नहीं हो पाया।

कई शब्दों की नहीं सुलझी गुत्थी

भाषाओं के ब्रिटिश इतिहासकार और जानकार पॉल बेकर का कहना है कि ये भाषा कई रूपों में मौजूद थी। लेकिन समाज के इज़्जतदार लोगों ने इसकी अनदेखी की। जिसकी वजह से इसकी नोंक-पलकें ठीक नहीं हो सकीं। पॉल बेकर ने पोलारी भाषा पर बहुत काम किया है। इसके बावजूक वो पोलारी भाषा की बहुत से शब्दों की गुत्थी को सुलझा नहीं पाए। चूंकि ये जबान समाज के उस तबके में बोली जाती थी, जिसकी आवाज को हमेशा दबाया जाता था। लिहाजा इसका कोई पुख़्ता रिकॉर्ड भी नहीं रहता था। पकड़े जाने के डर से इस जबान के बोलने वाले इसे लिखने से बचते थे। सिर्फ़ अल्फ़ाज की अदायगी भर से ही काम चला लेते थे।

मिसाल के लिए 'बोना' शब्द का प्रयोग बड़े पैमाने पर होता था। इसका मतलब था 'दिलकश'। इस शब्द को सबसे पहले अठारहवीं सदी में शेक्सपियर के नाटक हेनरी फोर्थ पार्ट टू में रिकॉर्ड किया गया।

इसी तरह नाच गाकर अपना गुजारा करने वालों, वेश्याओं, सर्कस और तमाशा करने वालों के बीच 'पार्लर' शब्द का इस्तेमाल खूब होता था, जिसका मतलब है बात करना। ये शब्द इतालवी जबान से लिया गया है। इसी तरह और भी शब्द थे जो दूसरे भाषाओं से निकलकर पोलारी का हिस्सा बने थे।

कई मानते हैं इसे भाषा-विरोधी
अठारहवीं सदी तक ब्रिटेन में ऐसे शब्द सिर्फ़ समाज के पिछड़े तबके में ही बोले जाते थे। बीसवीं सदी की शुरुआत में जब संगीत हॉलों में इसका इस्तेमाल होने लगा, तो समलैंगिकों ने भी इसे अपनी बोल-चाल का हिस्सा बना लिया। भाषा के कुछ जानकार पोलारी को भाषा-विरोधी मानते हैं। उनका मानना है कि जबान आसान और सादा होनी चाहिए। असली भाषा वही है जिसे हर कोई समझ सके।लेकिन, प्रशासन के डर से पोलारी बोलने वालों ने इसमें इतने मुश्किल शब्द शामिल कर लिए कि उन्हें समझ पाना हरेक के बस की बात नहीं थी।

पोलारी की एक ख़ूबी ये भी थी कि इसमें हास्य रस शामिल था। समलैंगिक इंसान एक-दूसरे को हंसाने के लिए इसका ख़ूब इस्तेमाल करते थे। आम जबान में जिस शब्द का मतलब गंभीर होता था, पोलारी में उसी शब्द का मतलब मजाहिया होता था।

ब्रिटेन में यौन अपराध से जुड़ा कानून बनने से पहले तक माना जाता था कि पोलारी बोलने वाले ख़ुद को इस भाषा के बूते ही मजबूत करते थे। उन्हें लगता था कि उनकी जबान चूंकि दूसरे नहीं समझ पाते हैं, लिहाजा ये भाषा उन्हें डर के माहौल में निडर होकर जीने का मौका देती है। कुछ जानकारों का ये भी कहना है कि पोलारी ना सिर्फ़ ख़ुफिया भाषा होती थी बल्कि दुनिया को एक अलग नजरिए से देखने का मौका भी देती थी।
 

भारतीय समाज में था खुलापन
समलैंगिक होना या न होना किसी की पसंद नहीं हो सकता। लेकिन हैरत की बात है कि ख़ुद को तरक़्कीपसंद कहने वालों ने ही इसे जुर्म समझा। शायद इसलिए कि उनके मजहब में इसकी गुंजाइश नहीं है। लेकिन समलैंगिक होने की ख़्वाहिश भी तो कुदरती है।

समलैंगिकता को लेकर प्राचीन भारतीय समाज में काफी खुलापन था। प्राचीन भारत में इसे जुर्म नहीं माना जाता था। लेकिन जब अंग्रेज़ों ने भारत पर अपना राज कायम किया तो उन्होंने अपने समाज की सोच यहां पर थोप दी। अंग्रेज़ों के जमाने का कानून ही आज भी भारत में समलैंगिकता को जुर्म बताता है। हालांकि, अब यहां बहुत हद तक इस कानून को खत्म करने पर सहमति बन गई है।

बहरहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि पाबंदियों ने ब्रिटेन एक नई जबान के पनपने कि लिए माहौल तैयार किया। अगर थोड़ी ढील मिली होती तो शायद पोलारी भी किसी भी अन्य भाषाओं की तरह विकसित हुई होती और दुनिया एक नई भाषा बोल रही होती.
 
विज्ञापन
विज्ञापन

सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें  लाइफ़ स्टाइल से संबंधित समाचार (Lifestyle News in Hindi), लाइफ़स्टाइल जगत (Lifestyle section) की अन्य खबरें जैसे हेल्थ एंड फिटनेस न्यूज़ (Health  and fitness news), लाइव फैशन न्यूज़, (live fashion news) लेटेस्ट फूड न्यूज़ इन हिंदी, (latest food news) रिलेशनशिप न्यूज़ (relationship news in Hindi) और यात्रा (travel news in Hindi)  आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़ (Hindi News)।  

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed