{"_id":"5b76a77142c79242c85cf378","slug":"know-about-the-favorite-dishes-of-atal-bihari-vajpayee","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"खाने पीने के शौकीन अटल बिहारी वाजपेयी को मिल-बांट कर खाने में आता था मजा","category":{"title":"Lifestyle","title_hn":"लाइफ स्टाइल","slug":"lifestyle"}}
खाने पीने के शौकीन अटल बिहारी वाजपेयी को मिल-बांट कर खाने में आता था मजा
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
Updated Fri, 17 Aug 2018 07:51 PM IST
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atal bihari vajpayee
बात कोई दो दशक पहले की है। आगरा में वाजपेयी-मुशर्रफ शिखर वार्ता का आयोजन हुआ था। मेजबान और मेहमान के खाने-पीने के बंदोबस्त का जिम्मा मेरे मित्र जिग्स कालरा को सौंपा गया था। मेनू बड़ी सावधानी से तैयार किया गया। जिग्स ने मुझे खबरदार किया, "गुरू! वाजपेयी जी खाने के जबरदस्त शौकीन हैं- कुछ कसर न रह जाए। फिर मुल्क की इज़्जत का भी सवाल है। पाकिस्तानियों को नाज है अपनी लाहौर की खाऊ गली पर। हमें उन्हें यह जतलाना है कि सारा बेहतरीन खाना मुहाजिरों के साथ सरहद पार नहीं चला गया। इसके अलावा कुछ नुमाइश साझा विरासत की भी होनी चाहिए।"
ख़ुशकिस्मती यह थी कि पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी पसंद-नापसंद थोपने का हठ नहीं पाला। बस शर्त रखी कि खाने का जायका नायाब होना चाहिए। इस बात का हमारी पूरी टीम को गर्व है कि जो भी तश्तरियां उस गुप्त वार्ता वाले कमरे में भेजी जातीं, वह खाली लौटती थीं। लाने ले-जाने वाले मजाक करते थे कि मुशर्रफ तो तनाव में लगते हैं पर पंडित जी निर्विकार भाव से संवाद को भी गतिशील रखते हैं और चबैना भी निबटा रहे हैं। वाजपेयी जी का अच्छा खाने-पीने का शौक मशहूर था। वह कभी नहीं छिपाते थे कि वह मछली-मांस चाव से खाते हैं।
शाकाहार को लेकर जरा भी हठधर्मी या कट्टरपंथी नहीं थे। दक्षिण दिल्ली में ग्रेटर कैलाश-2 में उनका प्रिय चीनी रेस्तरां था जहां वह प्रधानमंत्री बनने से पहले अकसर दिख जाते थे। पुराने भोपाल में मदीना के मालिक बड़े मियां फख से बताते थे कि वह वाजपेयी जी का पसंदीदा मुर्ग़ मुसल्लम पैक करवा कर दिल्ली पहुंचवाया करते थे।
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ख़ुशकिस्मती यह थी कि पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी पसंद-नापसंद थोपने का हठ नहीं पाला। बस शर्त रखी कि खाने का जायका नायाब होना चाहिए। इस बात का हमारी पूरी टीम को गर्व है कि जो भी तश्तरियां उस गुप्त वार्ता वाले कमरे में भेजी जातीं, वह खाली लौटती थीं। लाने ले-जाने वाले मजाक करते थे कि मुशर्रफ तो तनाव में लगते हैं पर पंडित जी निर्विकार भाव से संवाद को भी गतिशील रखते हैं और चबैना भी निबटा रहे हैं। वाजपेयी जी का अच्छा खाने-पीने का शौक मशहूर था। वह कभी नहीं छिपाते थे कि वह मछली-मांस चाव से खाते हैं।
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शाकाहार को लेकर जरा भी हठधर्मी या कट्टरपंथी नहीं थे। दक्षिण दिल्ली में ग्रेटर कैलाश-2 में उनका प्रिय चीनी रेस्तरां था जहां वह प्रधानमंत्री बनने से पहले अकसर दिख जाते थे। पुराने भोपाल में मदीना के मालिक बड़े मियां फख से बताते थे कि वह वाजपेयी जी का पसंदीदा मुर्ग़ मुसल्लम पैक करवा कर दिल्ली पहुंचवाया करते थे।
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मिठाइयों के वह गजब के शौकीन थे। उनके पुराने मित्र ठिठोली करते कि ठंडाई छानने के बाद भूख खुलना स्वाभाविक है और मीठा खाते रहने का मन करने लगता है। बचपन और लड़कपन ग्वालियर में बिताने के बाद वह विद्यार्थी के रूप में कानपुर में रहे थे। भिंड मुरैना की गज्जक, जले खोए के पेड़े के साथ-साथ ठग्गू के लड्डू और बदनाम क़ुल्फी का चस्का शायद तभी उनको लगा था। कुछ और पुरानी बातें याद आती हैं। पचास साल पहले मैंने दिल्ली के रामजस कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया था। हॉस्टल के वॉर्डन प्रोफेसर कौल थे। उन्होंने मुझे छोटा भाई मान कर सस्नेह मेरा मार्गदर्शन किया। छात्रों के लिए वह और श्रीमती कौल वत्सल अभिभावक थे।
वाजपेयी जी कौल दंपति के पारिवारिक मित्र थे। जब वह उनके यहां होते तो किसी बड़े नेता की मुद्रा में नहीं होते। छात्रों के साथ अनौपचारिक तरीके से जो कुछ पकता, वे मिल-बांट कर खाते-बतियाते और ठहाके लगाते। बाद में रामजस के तत्कालीन छात्र अशोक सैकिया और शक्ति सिंह आईएएस में उत्तीर्ण होने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में पहुंचे।
मॉरीशस से आये विजय सिंह माखन से वाजपेयी जी काफी स्नेह रखते थे। उसके साथ उस द्वीप के प्रवासी भारतीय भोजन की चर्चा अकसर होती थी। मणिलाल त्रिपाठी ओडिशा से आये जो बाद में विदेश सेवा में नियुक्त हुए। उसके साथ छेनापूड को लेकर छेड़ चलती तो कभी-कभार कमला नगर के छोले भटूरों, पुरानी दिल्ली की चाट के चटकारे लिए जाते। हॉस्टल मेस के खाने की गुणवत्ता चखने से उन्हें परहेज नहीं था।
वाजपेयी जी कौल दंपति के पारिवारिक मित्र थे। जब वह उनके यहां होते तो किसी बड़े नेता की मुद्रा में नहीं होते। छात्रों के साथ अनौपचारिक तरीके से जो कुछ पकता, वे मिल-बांट कर खाते-बतियाते और ठहाके लगाते। बाद में रामजस के तत्कालीन छात्र अशोक सैकिया और शक्ति सिंह आईएएस में उत्तीर्ण होने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में पहुंचे।
मॉरीशस से आये विजय सिंह माखन से वाजपेयी जी काफी स्नेह रखते थे। उसके साथ उस द्वीप के प्रवासी भारतीय भोजन की चर्चा अकसर होती थी। मणिलाल त्रिपाठी ओडिशा से आये जो बाद में विदेश सेवा में नियुक्त हुए। उसके साथ छेनापूड को लेकर छेड़ चलती तो कभी-कभार कमला नगर के छोले भटूरों, पुरानी दिल्ली की चाट के चटकारे लिए जाते। हॉस्टल मेस के खाने की गुणवत्ता चखने से उन्हें परहेज नहीं था।
लखनऊ और बनारस से कोई पहुंचता तो वह खाने-पीने की कोई सौगात उनके लिए लाना न भूलता। जो कुछ हाथ लगता उसे मिल-बांट कर खाने में ही उन्हें रस आता था। आज जब उनकी स्मृति शेष है तब यह कसक भी महसूस होती है कि आज खान-पान को लेकर कितनी आशंकाएं हमें भयभीत कर रही हैं और कैसे अपनी बहुलवादी विरासत का क्षय हम चुपचाप देख रहे हैं।
ज़ुबान बंद रखने का वक़्त नहीं-आखिर ज़ायका भी ज़ुबान पर ही चढ़ता है। हमारी भारतीय पहचान का अभिन्न अंग भाषाओं की विविधता नहीं बल्कि खान-पान की विविधता का सह-अस्तित्व है। वाजपेयी जी का खाने पीने का शौक मेरी समझ में पेटू भोजन सरीखा नहीं था बल्कि संवेदनशील पारखी कला, रसिक वाला और हिंदुस्तान की समन्वयात्मक इंद्रधनुषी संस्कृति का प्रतिबिंबित था। सराहनीय और अनुकरणीय।
ज़ुबान बंद रखने का वक़्त नहीं-आखिर ज़ायका भी ज़ुबान पर ही चढ़ता है। हमारी भारतीय पहचान का अभिन्न अंग भाषाओं की विविधता नहीं बल्कि खान-पान की विविधता का सह-अस्तित्व है। वाजपेयी जी का खाने पीने का शौक मेरी समझ में पेटू भोजन सरीखा नहीं था बल्कि संवेदनशील पारखी कला, रसिक वाला और हिंदुस्तान की समन्वयात्मक इंद्रधनुषी संस्कृति का प्रतिबिंबित था। सराहनीय और अनुकरणीय।