आखिर चीनी व्यंजनों का स्वाद क्यों चढ़ गया भारतीयों की जुबान पर?
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यूं तो चीनी बौद्ध शिक्षा की तलाश में सदियों से भारत का दौरा करते रहे हैं। यांग ताई चॉ पहले ऐसे चीनी थे, जो बेहतर भौतिक संभावनाओं के लिए भारत आए थे। पहली बार 1778 में यांग कोलकाता आए। कोलकाता उस समय ब्रिटिश भारत की राजधानी हुआ करता था और चीन से सबसे आसानी से पहुंचे जाने वाला महानगरीय क्षेत्र था।
दरअसल, उन सालों में, यांग जैसे कई लोग आए, जिनमें ज्यादातर हक्कास (हक्का हान वो चीनी लोग हैं जिनके पैतृक घर मुख्य रूप से गुआंगडोंग, फुजियान, जियांग्शी, ग्वांग्शी, सिचुआन, हुनान, झेजियांग, हैनान और गुइझो के हक्का-भाषी प्रांतीय क्षेत्रों में हैं) थे और 20 वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में कोलकाता में एक चाइनाटाउन विकसित हुआ था और यह उद्यम संपन्न क्षेत्र बन गया।
चीनी लोगों ने दंत चिकित्सकों, टेनरी मालिकों, सॉस निर्माताओं, ब्यूटीशियन और जूते की दुकान जैसे कई क्षेत्रों में सेवाएं दी, लेकिन जो प्रसिद्धि चीनी व्यंजनों को भारत में मिली वो सबके सामने है।
जैसा कि सभी अप्रवासी समुदाय करते हैं, चीनी लोग भी भारतीय संवेदनाओं और विश्वास को समझ गए। इतना ही नहीं, उन्होंने हमारे देवी-देवताओं में से एक काली को भी अपना मान लिया और भोग में नूडल्स, चॉप सुय, चावल और सब्जी के व्यंजन को एकता की निशानी के रूप में अर्पित किया, तो भोजन के साथ चीन-भारतीय सांस्कृतिक संलयन शुरू हुआ।
कहां खुला था पहला इंडो चीनी रेस्तरां?
लगभग 85 साल पहले, भारतीय पाक कला की दुनिया एक नये व्यंजन से प्रभावित हुई थी। पहला इंडो चीनी रेस्तरां 'एओ चिउ' कोलकाता में खुला। स्वादिष्ट और मसालेदार व्यंजन भारतीयों के मुंह लग चुका था। नये रेस्तरां पूरे कोलकाता में मशहूर हुए जो अनोखे नामों के साथ नए व्यंजन पेश करते थे जैसे की अगस्त के मून रोल्स और फिएरी ड्रैगन चिकन। चीनी व्यंजन का स्वाद भारत के हर छोटे शहर में फैल चुका था।
दरअसल, ये विदेशी व्यंजनों के लिए बड़ी उपलब्धि थी। भारतीय के मसाले और चीन की पाक कला से बने नये व्यंजन का मेल सिर्फ बड़े और छोटे रेस्त्रां द्वारा ही नहीं परोसा जाता था, बल्कि ठेले के मालिकों, हाईवे फूड स्टालों और मोबाइल चाउ मीन वैन द्वारा भी परोसा जा रहा था। मुंबई स्ट्रीट फूड में आज भी "चीनी भेल" और "सिचुआन डोसा" के चीनी संस्करण मिलते हैं।
ऐसा क्या है जो चीनी व्यंजन को इतना लोकप्रिय बनाता है? उत्तर है भारतीय पाक कला का मेल। ये जानने के बाद कि भारतीयों को मसालेदार, तैलीय चीजें पसंद हैं चीनियों ने अपने ही व्यंजन में भारतीय मसालों का तड़का लगाया और एक शानदार संयोजन तैयार हुआ।
पनीर चीनी मसालों के साथ सिचुआन पनीर में बदल गया। चिकन करी को चिली चिकन का रूप दे दिया गया। आलू भिंडी को एक मीठे और मसालेदार टमाटर की सूखी चटनी में भिंडी के साथ कुंग पाओ बना दिया गया जो भूख और जिज्ञासा दोनों शांत कर दे। कालीमिर्च चिकन ने लोगों को दक्षिण भारतीय शैली के फ्राइड चिकन की याद दिला दी।
ऐसे ही मांसाहारी पकोड़े भी बनाए गए जिसे चिकन, भेड़ और झींगा की स्टफिंग के साथ मंचूरियन का नाम दिया गया। चूंकि एक भारतीय परिवार में कोई न कोई शाकाहारी जरूर होता है, मंचूरियन में गोभी भी स्टफ कर दी गई।
लेकिन एक मिनट मंचूरियन? क्या वह भी एक डिश है? चीन में नहीं लेकिन भारत में, यह व्यावहारिक रूप से चीनी भोजन का पर्याय है। आज मंचूरियन भारत के लगभग हर मेनू में पाया जाता है जो देश में चीनी भोजन परोसता है। चीनी व्यंजनों पर भारत में जो प्रयोग किए गए वो कितने प्रसिद्ध हैं इसका जवाब हर भारतीय के पास है।
कई ऐसी सामग्री है जो भारतीय चीनी भोजन को असली चीनी भोजन से अलग करती है। जबकि खाना पकाने के तरीके समान हैं, लेकिन जो स्टफिंग होती है वह काफी अलग है। स्थानीय रूप से उपलब्ध सब्जियों और मीट के उपयोग के अलावा, यह गरम मसालों, ग्रेवी को गाढ़ा और कोटिंग के लिए मकई का आटा, "चीनी" को बढ़ाने के लिए मोनोसोडियम ग्लूटामेट का उपयोग भारत में किया जाता है। स्वाद, मिर्च, लहसुन और अदरक की अधिकता और सोया सॉस का उपयोग भारतीय चीनी भोजन को विशेष स्वाद देता है।