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हार्ट अटैक के बाद हो सकता है हार्ट फेल! डॉक्टर से जानें दोनों में अंतर और जरूरी सावधानियां
Tue, 06 Oct 2026 12:27 PM IST
Shruti Gaur
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Shruti Gaur
Updated Tue, 06 Oct 2026 12:27 PM IST
सार
Heart Attack vs Heart Failure: इस लेख में जानें हार्ट अटैक और हार्ट फेल में अंतर, हार्ट फेल के शुरुआती लक्षण, जोखिम, नियमित निगरानी की जरूरत और समय पर उपचार क्यों जरूरी है।
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हार्ट अटैक और हार्ट फेल में क्या है अंतर?
- फोटो : AI
विस्तार
Heart Attack vs Heart Failure: आप जैसे ही हार्ट अटैक का नाम लेते हैं, सुनने वाला काफी हद तक स्थिति का अंदाजा लगा लेता है। वहीं हार्ट फेल को लेकर लोगों में समझ अभी भी बहुत कम है। भले ही इसके नाम से जो भी अर्थ निकलता हो, लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि दिल ने काम करना बंद कर दिया है। ना ही यह हार्ट अटैक जैसा है।
हार्ट फेल होने का मतलब है कि दिल शरीर की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रभावी तरीके से ब्लड पंप करने में सक्षम नहीं रह गया है, जबकि हार्ट अटैक तब होता है, जब दिल के किसी हिस्से तक पहुंचने वाले ब्लड का रास्ता ब्लॉक हो जाता है। इस अंतर को समझना महत्वपूर्ण है, खासकर इसलिए कि हार्ट फेल की स्थिति समय के साथ धीरे-धीरे बनती है। इसके लक्षणों को अक्सर सामान्य थकान या स्वास्थ्य संबंधी किसी अन्य समस्या से जोड़कर देख लिया जाता है।
शरीर पर अलग-अलग तरह से असर डालते हैं हार्ट अटैक और हार्ट फेल
डीएनबी, एमडी (इंटर्नल मेडिसिन), एमबीबीएस, चेयरमैन, इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी, डॉ. रजनीश कपूर की माने तो हार्ट अटैक तब होता है, जब दिल के किसी हिस्से तक पहुंचने वाले ब्लड का रास्ता ब्लॉक हो जाता है। हार्ट फेल होना इससे अलग है। यह एक क्रोनिक कंडीशन (लंबे समय से चल रही स्वास्थ्य संबंधी समस्या) है, जिसमें दिल शरीर की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रभावी तरीके से ब्लड पंप करने में सक्षम नहीं रह जाता है। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि दिल ने अचानक काम करना बंद कर दिया है।
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दोनों स्थितियां एक-दूसरे से जुड़ी भी हो सकती हैं। हार्ट अटैक से दिल की मांसपेशियों को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे कुछ मामलों में आगे चलकर हार्ट फेल हो सकता है। हालांकि हार्ट फेल और भी कई कारणों से हो सकता है, जिनमें दिल को कमजोर करने वाली या नुकसान पहुंचाने वाली स्थितियां शामिल हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि हार्ट फेल के मरीज को पहले हार्ट अटैक आया हो।
भारत के लिए यह अंतर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। अनुमानतः देश में 80 लाख से 1 करोड़ लोग हार्ट फेल की स्थिति के साथ जीवन जी रहे हैं। भारत को दुनिया में हार्ट फेल से पीड़ित लोगों की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में से एक माना जाता है। फिर भी, इसे समय रहते पहचानना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसके कुछ लक्षण आम थकान या स्वास्थ्य से जुड़ी अन्य समस्याओं के लक्षण जैसे होते हैं।
लक्षणों में सुधार होने के बाद भी बिगड़ सकती है हार्ट फेल की स्थिति
हार्ट फेल एक दीर्घकालिक (क्रॉनिक) बीमारी है। इसमें कुछ समय तक मरीज की स्थिति स्थिर बनी रह सकती है, जिसके बाद ऐसे दौर भी आ सकते हैं, जब उसकी स्थिति बिगड़ने लगे। उपचार के बाद लक्षणों में सुधार हो सकता है, लेकिन हार्ट फेल की स्थिति बनी रहती है। इसलिए लगातार निगरानी और नियमित देखभाल और भी जरूरी हो जाती है।
स्थिति बिगड़ने पर परिणाम गंभीर हो सकते हैं। हार्ट फेल के कारण अस्पताल में भर्ती किए गए मरीजों पर हुए एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के एक वर्ष के भीतर लगभग 30 प्रतिशत मरीजों को दोबारा हार्ट फेल के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। हार्ट फेल होने के कारण अस्पताल में भर्ती होने के बाद जान जाने का जोखिम उन मरीजों की तुलना में लगभग छह गुना अधिक पाया गया है, जिनमें हार्ट फेल की स्थिति बिगड़ी नहीं थी।
इन आंकड़ों से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है: अस्पताल से छुट्टी मिल जाने या लक्षणों में सुधार होने का यह मतलब नहीं है कि हार्ट फेल के लिए अब देखभाल की जरूरत नहीं रही।
आसानी से नजरअंदाज हो जाते हैं लक्षण
हार्ट फेल की स्थिति को पहचानने की शुरुआत इस बात को समझने से होती है कि किन लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए। सांस फूलना, थकान, टखनों में सूजन और शारीरिक गतिविधि करने की क्षमता में कमी इसके कुछ महत्वपूर्ण लक्षण हैं। इन बदलावों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। पहले जो काम आसानी से हो जाते थे, उनमें सांस फूलने लगे, तो लोग अक्सर इसे केवल फिटनेस का मामला मान लेते हैं। लगातार बनी रहने वाली थकान को भी अक्सर व्यस्त दिनचर्या का नतीजा मान लिया जाता है।
इसलिए सबसे जरूरी बात यह है कि व्यक्ति की सामान्य स्थिति में आए बदलावों पर ध्यान दिया जाए। अगर एक मंजिल सीढ़ी चढ़ते समय अचानक सांस लेने के लिए रुकना पड़े, रोजाना की सामान्य सैर पहले से अधिक थकाने लगे या टखनों में सूजन अधिक दिखाई देने लगे, तो इन बदलावों को केवल उम्र बढ़ने या थकान का कारण मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
जब ये लक्षण लगातार बने रहें या समय के साथ बढ़ने लगें, तो उन पर ध्यान देना जरूरी है। समय रहते लक्षणों को पहचानना और सही समय पर जांच एवं डायग्नोस कराना जरूरी है, क्योंकि हार्ट फेल की स्थिति की पहचान हो जाने के बाद इसे नियंत्रित किया जा सकता है और इसकी प्रगति को धीमा किया जा सकता है।
बेहतर महसूस करने का मतलब यह नहीं है कि जोखिम खत्म हो गया है
हार्ट फेल के ट्रीटमेंट में काफी सुधार हुआ है, लेकिन जब मरीज की स्थिति स्थिर लगने लगती है, तब भी जोखिम बना रह सकता है। क्रॉनिक हार्ट फेल की स्थिति के साथ जीवन जी रहे लोगों के लिए लक्षणों में सुधार निश्चित रूप से राहत देने वाला होता है, लेकिन नियमित देखभाल और निगरानी तब भी जरूरी होती है। नियमित फॉलो-अप से इलाज कर रहे डॉक्टर को यह समझने में मदद मिलती है कि मरीज की स्थिति स्थिर है या नहीं। इससे स्थिति बिगड़ने के शुरुआती संकेतों को पहचानना आसान होता है और यह आकलन करना संभव होता है कि मौजूदा उपचार अभी भी मरीज की जरूरतों के अनुरूप है या नहीं।
एक शोध के अनुसार, उपचार के बावजूद लगभग हर 7 में से 1 मरीज को 18 महीनों के भीतर अस्पताल में भर्ती होने या जान जाने का जोखिम बना रहता है। इससे यह बात सामने आती है कि जब स्थिति स्थिर दिखाई दे रही हो, तब भी लगातार देखभाल और निगरानी जरूरी है।
इसीलिए नियमित देखभाल और निगरानी जारी रखना महत्वपूर्ण है। उपयुक्त उपचार, जिसमें जरूरत के अनुसार नई थेरेपी भी शामिल हो सकती हैं, हार्ट फेल को नियंत्रित करने, अस्पताल में भर्ती होने तथा दिल की गंभीर जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
हार्ट अटैक और हार्ट फेल के बीच अंतर को समझना दिल की सेहत के बारे में सही जानकारी रखने के लिए जरूरी है। हार्ट फेल की स्थिति के साथ जीवन जी रहे लोगों के लिए यह समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि समय के साथ इस स्थिति में बदलाव आ सकता है। लक्षणों के बिगड़ने पर ध्यान देना, समय रहते डॉक्टर से सलाह लेना, नियमित फॉलो-अप जारी रखना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार लेते रहना हार्ट फेल को नियंत्रित करने और भविष्य में होने वाली जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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हार्ट फेल होने का मतलब है कि दिल शरीर की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रभावी तरीके से ब्लड पंप करने में सक्षम नहीं रह गया है, जबकि हार्ट अटैक तब होता है, जब दिल के किसी हिस्से तक पहुंचने वाले ब्लड का रास्ता ब्लॉक हो जाता है। इस अंतर को समझना महत्वपूर्ण है, खासकर इसलिए कि हार्ट फेल की स्थिति समय के साथ धीरे-धीरे बनती है। इसके लक्षणों को अक्सर सामान्य थकान या स्वास्थ्य संबंधी किसी अन्य समस्या से जोड़कर देख लिया जाता है।
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शरीर पर अलग-अलग तरह से असर डालते हैं हार्ट अटैक और हार्ट फेल
डीएनबी, एमडी (इंटर्नल मेडिसिन), एमबीबीएस, चेयरमैन, इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी, डॉ. रजनीश कपूर की माने तो हार्ट अटैक तब होता है, जब दिल के किसी हिस्से तक पहुंचने वाले ब्लड का रास्ता ब्लॉक हो जाता है। हार्ट फेल होना इससे अलग है। यह एक क्रोनिक कंडीशन (लंबे समय से चल रही स्वास्थ्य संबंधी समस्या) है, जिसमें दिल शरीर की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रभावी तरीके से ब्लड पंप करने में सक्षम नहीं रह जाता है। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि दिल ने अचानक काम करना बंद कर दिया है।
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दोनों स्थितियां एक-दूसरे से जुड़ी भी हो सकती हैं। हार्ट अटैक से दिल की मांसपेशियों को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे कुछ मामलों में आगे चलकर हार्ट फेल हो सकता है। हालांकि हार्ट फेल और भी कई कारणों से हो सकता है, जिनमें दिल को कमजोर करने वाली या नुकसान पहुंचाने वाली स्थितियां शामिल हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि हार्ट फेल के मरीज को पहले हार्ट अटैक आया हो।
भारत के लिए यह अंतर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। अनुमानतः देश में 80 लाख से 1 करोड़ लोग हार्ट फेल की स्थिति के साथ जीवन जी रहे हैं। भारत को दुनिया में हार्ट फेल से पीड़ित लोगों की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में से एक माना जाता है। फिर भी, इसे समय रहते पहचानना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसके कुछ लक्षण आम थकान या स्वास्थ्य से जुड़ी अन्य समस्याओं के लक्षण जैसे होते हैं।
लक्षणों में सुधार होने के बाद भी बिगड़ सकती है हार्ट फेल की स्थिति
हार्ट फेल एक दीर्घकालिक (क्रॉनिक) बीमारी है। इसमें कुछ समय तक मरीज की स्थिति स्थिर बनी रह सकती है, जिसके बाद ऐसे दौर भी आ सकते हैं, जब उसकी स्थिति बिगड़ने लगे। उपचार के बाद लक्षणों में सुधार हो सकता है, लेकिन हार्ट फेल की स्थिति बनी रहती है। इसलिए लगातार निगरानी और नियमित देखभाल और भी जरूरी हो जाती है।
स्थिति बिगड़ने पर परिणाम गंभीर हो सकते हैं। हार्ट फेल के कारण अस्पताल में भर्ती किए गए मरीजों पर हुए एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के एक वर्ष के भीतर लगभग 30 प्रतिशत मरीजों को दोबारा हार्ट फेल के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। हार्ट फेल होने के कारण अस्पताल में भर्ती होने के बाद जान जाने का जोखिम उन मरीजों की तुलना में लगभग छह गुना अधिक पाया गया है, जिनमें हार्ट फेल की स्थिति बिगड़ी नहीं थी।
इन आंकड़ों से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है: अस्पताल से छुट्टी मिल जाने या लक्षणों में सुधार होने का यह मतलब नहीं है कि हार्ट फेल के लिए अब देखभाल की जरूरत नहीं रही।
आसानी से नजरअंदाज हो जाते हैं लक्षण
हार्ट फेल की स्थिति को पहचानने की शुरुआत इस बात को समझने से होती है कि किन लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए। सांस फूलना, थकान, टखनों में सूजन और शारीरिक गतिविधि करने की क्षमता में कमी इसके कुछ महत्वपूर्ण लक्षण हैं। इन बदलावों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। पहले जो काम आसानी से हो जाते थे, उनमें सांस फूलने लगे, तो लोग अक्सर इसे केवल फिटनेस का मामला मान लेते हैं। लगातार बनी रहने वाली थकान को भी अक्सर व्यस्त दिनचर्या का नतीजा मान लिया जाता है।
इसलिए सबसे जरूरी बात यह है कि व्यक्ति की सामान्य स्थिति में आए बदलावों पर ध्यान दिया जाए। अगर एक मंजिल सीढ़ी चढ़ते समय अचानक सांस लेने के लिए रुकना पड़े, रोजाना की सामान्य सैर पहले से अधिक थकाने लगे या टखनों में सूजन अधिक दिखाई देने लगे, तो इन बदलावों को केवल उम्र बढ़ने या थकान का कारण मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
जब ये लक्षण लगातार बने रहें या समय के साथ बढ़ने लगें, तो उन पर ध्यान देना जरूरी है। समय रहते लक्षणों को पहचानना और सही समय पर जांच एवं डायग्नोस कराना जरूरी है, क्योंकि हार्ट फेल की स्थिति की पहचान हो जाने के बाद इसे नियंत्रित किया जा सकता है और इसकी प्रगति को धीमा किया जा सकता है।
बेहतर महसूस करने का मतलब यह नहीं है कि जोखिम खत्म हो गया है
हार्ट फेल के ट्रीटमेंट में काफी सुधार हुआ है, लेकिन जब मरीज की स्थिति स्थिर लगने लगती है, तब भी जोखिम बना रह सकता है। क्रॉनिक हार्ट फेल की स्थिति के साथ जीवन जी रहे लोगों के लिए लक्षणों में सुधार निश्चित रूप से राहत देने वाला होता है, लेकिन नियमित देखभाल और निगरानी तब भी जरूरी होती है। नियमित फॉलो-अप से इलाज कर रहे डॉक्टर को यह समझने में मदद मिलती है कि मरीज की स्थिति स्थिर है या नहीं। इससे स्थिति बिगड़ने के शुरुआती संकेतों को पहचानना आसान होता है और यह आकलन करना संभव होता है कि मौजूदा उपचार अभी भी मरीज की जरूरतों के अनुरूप है या नहीं।
एक शोध के अनुसार, उपचार के बावजूद लगभग हर 7 में से 1 मरीज को 18 महीनों के भीतर अस्पताल में भर्ती होने या जान जाने का जोखिम बना रहता है। इससे यह बात सामने आती है कि जब स्थिति स्थिर दिखाई दे रही हो, तब भी लगातार देखभाल और निगरानी जरूरी है।
इसीलिए नियमित देखभाल और निगरानी जारी रखना महत्वपूर्ण है। उपयुक्त उपचार, जिसमें जरूरत के अनुसार नई थेरेपी भी शामिल हो सकती हैं, हार्ट फेल को नियंत्रित करने, अस्पताल में भर्ती होने तथा दिल की गंभीर जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
हार्ट अटैक और हार्ट फेल के बीच अंतर को समझना दिल की सेहत के बारे में सही जानकारी रखने के लिए जरूरी है। हार्ट फेल की स्थिति के साथ जीवन जी रहे लोगों के लिए यह समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि समय के साथ इस स्थिति में बदलाव आ सकता है। लक्षणों के बिगड़ने पर ध्यान देना, समय रहते डॉक्टर से सलाह लेना, नियमित फॉलो-अप जारी रखना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार लेते रहना हार्ट फेल को नियंत्रित करने और भविष्य में होने वाली जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।