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इन वजहों के चलते युवा करते हैं आत्महत्या
Updated Wed, 02 Dec 2015 12:31 AM IST
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बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बदलते लाइफ स्टाइल में युवा वर्ग सहनशक्ति खो रहा है। बेरोजगारी, पढ़ाई का बोझ, मां-बाप का दबाव और भविष्य की चिंता युवाओं के गले का फंदा बनने के तमाम कारण बन रहे हैं।
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शायद यही वजह है कि युवाओं के फंदा लगाकर जान देने के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। पिछले दस दिनों के भीतर ही शहर में आधा दर्जन युवाओं ने फंदा लगाकर जान दे दी। इसमें छात्र भी शामिल हैं। डाक्टरों की मानें तो इन घटनाओं पर अभिभावक ही अंकुश लगा सकते हैं।
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पिछले दस दिन के भीतर कई मामले फंदा लगाकर जान देने के सामने आ चुके हैं। 23 नवंबर को दो छात्राओं ने फंदा लगा लिया। झिड़ी में छात्रा ने फंदा लगाया और इसी दिन शक्ति नगर इलाके में ग्यारहवीं कक्षा के छात्र ने फंदा लगाकर जान दी।
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21 नवंबर को शहर के गांधी नगर में वेटरनरी की पढ़ाई कर चुकी डाक्टर ने फंदा लगा लिया। कुछ दिन पहले नानक नगर इलाके में सुनार की दुकान पर काम करने वाले युवक ने फंदा लगा लिया। सतवारी और आरएस पुरा क्षेत्र में भी दो युवाओं ने फंदा लगाकर जान दी।
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क्या कहते है डाक्टर आप भी जानें
क्या बन रहा कारण
मनोचिकित्सक विशेषज्ञ डाक्टर जगदीश थापा कहते हैं कि युवा वर्ग तनाव और प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी सहनशक्ति खो रहा है। युवाओं पर अपने भविष्य को लेकर दबाव है। नशे की गिरफ्त में आकर ऐसा करना भी एक कारण है। बच्चों पर मां-बाप का दबाव भी बन रहा है। यह तमाम कारण हैं, जो बच्चों को ऐसा करने पर मजबूर कर रहे हैं।
बच्चों का ख्याल रखें
यदि बच्चे घर में सहमे-सहमे रहते हैं, चुपचाप रहकर किसी से बात नहीं करते। खाना कम खाते हैं और चिड़चिड़े हो जाएं, तो यह सब बच्चों के तनाव में होने के लक्षण हैं। दो हफ्तों तक ऐसा होने पर अभिभावकों को चाहिए कि तुरंत मनोचिकित्सक की राय लें। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों पर दबाव न बनाएं और उनको वही करने दें, जहां उनका ध्यान हो। खासकर पढ़ाई के मामले में तो बिल्कुल दबाव न डालें।
मनोचिकित्सक विशेषज्ञ डाक्टर जगदीश थापा कहते हैं कि युवा वर्ग तनाव और प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी सहनशक्ति खो रहा है। युवाओं पर अपने भविष्य को लेकर दबाव है। नशे की गिरफ्त में आकर ऐसा करना भी एक कारण है। बच्चों पर मां-बाप का दबाव भी बन रहा है। यह तमाम कारण हैं, जो बच्चों को ऐसा करने पर मजबूर कर रहे हैं।
बच्चों का ख्याल रखें
यदि बच्चे घर में सहमे-सहमे रहते हैं, चुपचाप रहकर किसी से बात नहीं करते। खाना कम खाते हैं और चिड़चिड़े हो जाएं, तो यह सब बच्चों के तनाव में होने के लक्षण हैं। दो हफ्तों तक ऐसा होने पर अभिभावकों को चाहिए कि तुरंत मनोचिकित्सक की राय लें। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों पर दबाव न बनाएं और उनको वही करने दें, जहां उनका ध्यान हो। खासकर पढ़ाई के मामले में तो बिल्कुल दबाव न डालें।