कश्मीर के मैप में है बहुत गैप
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भारत के 'ग़लत नक्शे' का इस्तेमाल करने पर 100 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाने की बात चल रही है। जियो स्पेशल इनफॉर्मेशन रेगुलेशन बिल 2016 में प्रावधान है कि जो भी संस्था, प्रकाशक या व्यक्ति भारत के नक़्शे को 'ग़लत तरीक़े से' दिखाएगा, उसे सात साल की जेल भी हो सकती है।
भारत सरकार के हिसाब से ऐसा हर नक्शा ग़लत होगा जिसमें नियंत्रण रेखा यानी एलओसी और चीन के नियंत्रण में मौजूद अक्साई चिन को भारत के भीतर नहीं दिखाया गया है। यानी भारत में बच्चों को 1947 के कश्मीर युद्ध और 1962 के चीन के साथ युद्ध के बारे में पढ़ाया जा सकता है, लेकिन इसे नक्शे पर दिखाना जुर्म होगा।
जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा सरकार के प्रवक्ता और शिक्षा मंत्री नईम अख़्तर इस प्रस्तावित क़ानून पर कुछ भी कहने से बचते रहे।इस प्रस्तावित क़ानून पर उनकी सरकार की प्रतिक्रिया पूछे जाने पर उन्होंने कहा, 'मुझे इस पर कुछ भी नहीं कहना है कि प्रस्तावित क़ानून ग़लत है या सही। आप कैमरा बंद करें और चले जाएं।'
'भारत के नक़्शे में दिखाया जा रहा है कि मुजफ़्फ़राबाद भी जम्मू-कश्मीर में है
विपक्षी दल नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता जुनैद मट्टू कहते हैं, 'अगर केंद्र सरकार को लगता है कि ये क़ानून लागू हो सकता है तो फिर ठीक है। लेकिन कश्मीर एक विवादित मसला माना जाता है और इसका हल ज़रूरी है।'
भारत सरकार के हिसाब से भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर राज्य का जो सही नक़्शा है, उसमें पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजधानी मुज़फ़्फ़राबाद को भारतीय शहर के तौर पर दिखाया गया है। जम्मू-कश्मीर के ज़्यादातर निजी और सरकारी स्कूली किताबों में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर और अक्साई चिन को भारत के नक़्शे में दिखाया गया है।
कश्मीर घाटी में सरकारी और निजी स्कूलों में कश्मीर मसले के बारे में कुछ भी नहीं पढ़ाया जाता है। गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, उड़ी में बीए की पढ़ाई कर रहे छात्र तारिक़ अहमद कहते हैं, 'भारत के नक़्शे में दिखाया जा रहा है कि मुजफ़्फ़राबाद भी जम्मू-कश्मीर में है। अगर ऐसा है तो हम वहां क्यों नहीं जा सकते हैं?'
वो कहते हैं, 'भारत ने जो नक़्शा जारी किया है, उसके हिसाब से मुज़फ़्फ़राबाद हमारा है। मैं इस समय जहाँ खड़ा हूँ, वहाँ से नियंत्रण रेखा 12 किलोमीटर दूर है। लेकिन जब हम वहाँ पहुँचते हैं तो हमें आगे जाने नहीं दिया जाता है।'
जम्मू-कश्मीर के 1947 के बाद के इतिहास से हर छात्र बेख़बर है
तारिक़ कहते हैं, 'मेरे कई रिश्तेदार मुज़फ़्फ़राबाद में रहते हैं। अगर नक़्शे पर इलाक़ा हमारा है तो वहाँ जाने से रोकते क्यों हैं? आख़िर सच्चाई क्या है?'उनका कहना है कि कश्मीर के इतिहास के बारे में भी स्कूली किताबों में सिर्फ़ ये बताया जाता है कि जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ विलय कैसे हुआ, इसके आगे किताबों में कुछ नहीं पढ़ाया जाता।
उड़ी के गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज में इतिहास पढ़ाने वाले शिक्षक सज्जाद अहमद कहते हैं कि जो कुछ भी पहली कक्षा से लेकर ग्रेजुएशन तक छात्रों को पढ़ाया जाता है, उससे ये साफ़ नहीं होता कि जम्मू-कश्मीर कैसे भारत के नियंत्रण में आया। अहमद कहते हैं, 'जम्मू-कश्मीर के 1947 के बाद के इतिहास से हर छात्र बेख़बर है।'
यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में भी 1957 तक के कश्मीर का इतिहास पढ़ाया जाता है। पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के बारे में यहाँ की स्कूली किताबों में कुछ नहीं बताया जाता है।
दोनों देशों को ये मुद्दे बातचीत से हल करने होंगे
नक़्शे वाले प्रस्तावित क़ानून पर ख़ुर्शीद ने कहा कि ये फ़ैसला ग़लत है क्योंकि जम्मू-कश्मीर एक विवादित मुद्दा है। वहीं, शिक्षाविद् और राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर गुल मोहम्मद वानी कहते हैं, 'दोनों ही देशों, भारत और पाकिस्तान में नक़्शों की एक सियासत रही है। अब इतनी सज़ा की बात हो रही है लेकिन मुझे नहीं लगता कि ये क़ानून ज़िंदा रह पाएगा। दोनों देशों को ये मुद्दे बातचीत से हल करने होंगे।'