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क्या है रोशनी एक्ट, इसके खत्म होने के बाद जम्मू-कश्मीर के लोगों पर क्या होगा असर, यहां पढ़ें सबकुछ

Sun, 01 Nov 2020 12:38 PM IST
प्राची प्रियम अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: प्राची प्रियम Updated Sun, 01 Nov 2020 12:38 PM IST
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What is Roshni act and how is its withdrawal going to affect locals of Jammu Kashmir
जम्मू-कश्मीर - फोटो : अमर उजाला
उच्च न्यायालय द्वारा जम्मू-कश्मीर के चर्चित रोशनी एक्ट को असंवैधानिक बताते हुए खारिज करने के बाद राज्य सरकार ने इसके तहत बांटी गई सारी जमीनों का दाखिल-खारिज यानी नामांतरण रद्द कर छह महीने में जमीनें वापस लेने का फैसला किया है। सरकार ने एक्ट के तहत की गई अब तक की सभी कार्रवाई को रद्द करने का आदेश जारी किया है। इसके साथ ही रोशनी एक्ट के तहत जमीनें लेने वाले प्रभावी लोगों समेत सभी लाभार्थियों के नाम सार्वजनिक करने को कहा गया है। उप राज्यपाल की सहमति से कानून और संसदीय कार्य विभाग ने शनिवार को यह आदेश जारी किया। 
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साप्ताहिक समीक्षा होगी
आदेश में कहा गया है कि उच्च न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए यह जरूरी है कि आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। इसके तहत राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव की ओर से रोशनी एक्ट के तहत समय-समय पर किए गए संशोधनों को रद्द करने का आदेश जारी होगा। 
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सरकारी जमीन पर कब्जाधारकों से जमीन छुड़ाने की कार्ययोजना बनाने के साथ ही छह महीने के भीतर ऐसी सभी भूमि को वापस हासिल किया जाएगा। आदेश में कहा गया है कि राजस्व विभाग साप्ताहिक आधार पर आदेश के तहत की गई कार्रवाई का ब्योरा सामान्य प्रशासन विभाग के साथ साझा करेगा। 
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सरकारी जमीन का ब्योरा जारी करने के आदेश
आदेश में कहा गया है कि प्रमुख सचिव राजस्व विभाग एक जनवरी 2001 के आधार पर सरकारी जमीन का ब्योरा एकत्र कर उसे वेबसाइट पर प्रदर्शित करेंगे। साथ ही जमीन पर अवैध कब्जाधारकों के नाम भी सार्वजनिक करेंगे। 

इसमें रोशनी एक्ट के तहत आवेदन प्राप्त होने, जमीन का मूल्यांकन, लाभार्थी की ओर से जमा धनराशि, एक्ट के तहत पारित आदेश का भी ब्योरा देना होगा। साथ ही यदि जमीन किसी के नाम हस्तांतरित की गई होगी तो उसका विवरण भी देने को कहा गया है। 

लाभ लेने वाले प्रभावी लोगों के नाम भी सार्वजनिक होंगे

आदेश में कहा गया है कि लाभ लेने वाले पूर्व मंत्रियों, विधायकों, ब्यूरोक्रेट, सरकारी कर्मचारी, पुलिस अफसरों, उद्योगपतियों, व्यापारियों समेत सभी प्रभावी लोगों के नाम भी सार्वजनिक करने को कहा गया है। इतना ही आदेश में यह भी कहा गया है कि ऐसे लोगों के रिश्तेदारों तथा परिवार से जुड़े अन्य लोगों के नाम पर बेनामी सरकारी भूमि को भी सार्वजनिक करने को कहा गया है। यह कार्रवाई एक महीने में पूरे करने को कहा गया है। 

मंडल आयुक्त कोर्ट में सौंपेंगे रिपोर्ट
जम्मू और कश्मीर के मंडल आयुक्त को रोशनी एक्ट के अलावा सरकारी जमीन पर जिलेवार कब्जे का ब्योरा सौंपने की हिदायत दी गई है। कब्जा करने वाले लोगों तथा जमीन का पूरा विवरण भी देने को कहा गया है। इस सूचना को भी वेबसाइट पर प्रदर्शित किया जाएगा। 

हाईकोर्ट ने दिया सीबीआई जांच का आदेश
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने तीन सप्ताह पहले 9 अक्तूबर को रोशनी एक्ट घोटाले की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायाधीश राजेश बिंदल ने जांच एजेंसी को प्रत्येक आठ सप्ताह में कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट पेश करने को कहा था। इस आदेश के बाद राज्य पुनर्गठन का एक साल पूरे होने पर सरकार ने शनिवार को आदेश को लागू करते हुए एक्ट के तहत की गई पूरी कार्रवाई को ही रद्द कर दिया। 

एक लाख हेक्टेयर जमीन बांट दी
बता दें, जम्मू-कश्मीर के विवादित रोशनी एक्ट के तहत 20.55 लाख कनाल (1,02,750 हेक्टेयर) सरकारी जमीन लोगों को औने-पौने दाम में बांट दी गई थी। इसमें से मात्र 15.58 प्रतिशत जमीन को ही मालिकाना हक के लिए मंजूरी दी गई। 
यह था योजना का उद्देश्य
योजना का उद्देश्य था कि जमीन के आवंटन से प्राप्त होने वाली राशि का इस्तेमाल राज्य में बिजली ढांचे को सुधारने में किया जाएगा। इस एक्ट के तहत रसूखदारों ने अपने तथा अपने रिश्तेदारों के नाम जमीन आवंटित करा ली।

क्या है रोशनी एक्ट

रोशनी एक्ट सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों को मालिकाना हक देने के लिए बनाया गया था। इसके बदले उनसे एक निश्चित रकम ली जाती थी, जो सरकार की ओर से तय की जाती थी। साल 2001 में फारूक अब्दुल्ला की सरकार ने जब यह कानून लागू किया तब सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वालों को मालिकाना हक देने के लिए 1990 को कट ऑफ वर्ष निर्धारित किया गया था। लेकिन, समय के साथ जम्मू-कश्मीर की आने वाली सभी सरकारों ने इस कट ऑफ साल को बदलना शुरू कर दिया।
योजना नाकाम, सत्यपाल मलिक ने रद्द की
योजना के तहत कम राजस्व प्राप्त होने तथा उद्देश्यों के नाकाम होने पर पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने 28 नवंबर 2018 को इस योजना को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट में एडवोकेट अंकुर शर्मा की ओर से इस संबंध में जनहित याचिका दायर की थी। 
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