कारगिल विजय दिवस: पहाड़ों पर गोलियों की बौछार के बीच लिखी थी शौर्य गाथा, योद्धाओं ने बताई पराक्रम की कहानी
Kargil Vijay Diwas: द्रास स्थित लामोचन व्यू प्वाइंट पर कारगिल गाथा सुनाए जाने पर उपस्थित सभी की आंखों के आगे कारगिल युद्ध के जीवंत दृश्य तैरने लगे। उत्तरी कमान प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी की अध्यक्षता में कारगिल युद्ध के शहीदों की याद में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया।
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विस्तार
द्रास, कारगिल और बटालिक सेक्टर की चोटियों से गोलाबारी कर रहे दुश्मन से बेपरवाह भारतीय सेना के जांबाज आगे बढ़ रहे हैं। कुछ साथी वीरगति को प्राप्त हो रहे हैं, लेकिन रणबांकुरों में न खौफ है न अपनी जान की परवाह। पथरीले पहाड़ चढ़ने की चुनौती और गोलियों की बौछार के बीच कारगिल युद्ध के मोर्चे फतेह कर योद्धा इस तरह से साहस और पराक्रम की असाधारण नजीर बन गए।
द्रास स्थित लामोचन व्यू प्वाइंट पर कारगिल गाथा सुनाई
कारगिल के द्रास स्थित लामोचन व्यू प्वाइंट पर कारगिल गाथा सुनाए जाने पर उपस्थित हर किसी की आंखों के आगे कारगिल युद्ध के जीवंत दृश्य तैरने लगे। उत्तरी कमान प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी की अध्यक्षता में कारगिल युद्ध के शहीदों की याद में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया।
युद्ध की आंखों देखी दास्तां साझा
वीर नारियों, शहीदों के परिजन, वॉर हीरो समेत अन्य अतिथियों ने लामोचन व्यू प्वाइंट से कारगिल युद्ध की आंखों देखी दास्तां साझा की। द्रास, कारगिल और बटालिक सेक्टर में दुश्मन के कब्जे में चोटियों को छुड़ाने के लिए कैसे ऑपरेशन विजय को अंजाम दिया गया। दुनिया के सबसे मुश्किल युद्धों में से एक कारगिल युद्ध के मोर्चे कैसे फतेह किए गए।
- असंभव को संभव कर दिखाने वाले भारतीय जांबाजों की वीरगाथाएं सुन उपस्थिति के जेहन में जून-जुलाई 1999 में घनघोर युद्ध के दृश्य ताजा हो गए। कार्यक्रम में मौजूद 14 वीर नारियों, दो वीर माताओं, 10 वॉर हीरो ने असल जिंदगी से जुड़ी कहानियों ने सभी को भावुक कर दिया।
ऐसे खदेड़ा पाकिस्तानी घुसपैठियों को
कारगिल युद्ध दो माह चला था। इसमें भारतीय सेना ने 527 जांबाज खोए। 1300 से ज्यादा सैनिक जंग में घायल हुए। वहीं, पाकिस्तान को इससे कई गुना अधिक नुकसान उठाना पड़ा था। कसर संघर्ष: यह वही क्षेत्र है, जहां पहला भारतीय गश्त दल सर्दियों में खाली पड़ी चौकियों पर फिर से कब्जा करने गया था, जहां घुसपैठिए घात लगाए बैठे थे। इस क्षेत्र में भीषण युद्ध हुआ और भारतीय सेना ने पाकिस्तानियों को मार भगाने के लिए कई हमले किए।
टाइगर हिल का मोर्चा
टाइगर हिल द्रास (कारगिल) क्षेत्र की सबसे ऊंची चोटियों में से एक थी। कारगिल लड़ाई के दौरान इस अहम क्षेत्र से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने का काम भारतीय सेना के सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्यों में से एक था। इस चोटी पर चार जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने तिरंग फहरा दिया था।
बटालिक में कार्रवाई
इस क्षेत्र में ऑपरेशन विजय की पहली सफलता 9 जून 1999 को रॉकफाल इलाके में हासिल हुई। उसके बाद प्वाइंट 4878, गरही प्वाइंट 5000 और जुबार क्षेत्र पर हमले शुरू किए गए। सेना के वीर सैनिकों ने दुश्मनों से बटालिक क्षेत्र को 7 जुलाई 1999 तक मुक्त करवा लिया।
प्वाइंट 4875 का संघर्ष
मशकोह घाटी में स्थित प्वाइंट 4875 की चोटी से द्रास से मतायण तक राष्ट्रीय राजमार्ग निशाने पर था। भारतीय सेना के रणबांकुरों ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस चोटी पर फिर से कब्जा हासिल करने के लिए युद्ध लड़ा और जीत हासिल की।
तोलोलिंग का मोर्चा
भारतीय सेना ने मई 1999 के आखिरी सप्ताह में तोलोलिंग पर अपने हमले शुरू कर दिए। प्वाइंट 4590 चोटी पर 6 जून 1999 को कब्जा कर लिया गया। तोलोलिंग को भारतीय सेना के बहादुर सैनिकों ने 12 जून 1999 तक अपने कब्जे में ले लिया था।
खालूबार टॉप की लड़ाई
खालूबार टॉप की लड़ाई नियंत्रण रेखा के पास रणनीतिक रूप से एक बहुत ही महत्वपूर्ण इलाका था। इस इलाके पर कब्जे से पूरी लड़ाई का रुख बदल सकता था। भारतीय सेना के तोपखानों ने दुश्मन के संगरों को नष्ट करने के अलावा वहां की संचार और आपूर्ति लाइनों को बाधित कर दिया था। इस क्षेत्र में भारतीय सेना के जवानों ने वीरता की अविस्मरणीय गाथाएं रचीं।
कितने सैनिकों को मिले मेडल
परमवीर चक्र- 04
महावीर चक्र- 10
वीर चक्र - 49
सेना मेडल - 135
इन्हें मिला परमवीर चक्र
1. कैप्टन विक्रम बतरा (मरणोपरांत) 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स
2. राइफलमैन संजय कुमार, 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स
3. ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, 18 ग्रेनेडियर्स
4. लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय (मरणोपरांत) 111 गोरखा राइफल्स